US पायलट को दिखा 'एलियन', जांच में निकला तेहरान का जानलेवा 'जेलीफिश ड्रोन'...कितना खतरनाक है यह सिस्टम; Explainer
ईरान के ऊपर मार गिराए गए अमेरिकी F-15 पायलट ने आसमान में एक रहस्यमयी 'जेलीफिश ड्रोन' देखने का दावा किया, पायलट इसे एक एलियन बोल रहा था. जानिए क्या है पूरा मामला?
Jelly Fish Drone: ईरान के ऊपर एक सैन्य अभियान के दौरान मार गिराए गए अमेरिकी F-15 लड़ाकू विमान के पायलट ने एक ऐसा दावा किया है जिसने आधुनिक युद्ध तकनीक और ड्रोन क्षमताओं को लेकर नई बहस छेड़ दी है. पायलट के अनुसार, विमान से इजेक्ट करने और बचाव दल का इंतजार करने के दौरान उसने आसमान में एक असामान्य दृश्य देखा, जिस पर शुरुआत में उसे खुद भी विश्वास नहीं हुआ.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पायलट ने आसमान में ईरानी ड्रोन का एक ऐसा समूह देखा जो समन्वित तरीके से उड़ रहा था और जिसका आकार एक विशाल जेलीफिश जैसा दिखाई दे रहा था. यह घटना अप्रैल में हुई थी, जब लड़ाकू अभियान के दौरान अमेरिकी F-15 विमान को मार गिराया गया था. इस मामले में पायलट का बयान अब सामने आया है.
बाद में अमेरिकी विशेष बलों (US Special Forces) ने पायलट को सुरक्षित बाहर निकाला. इस बचाव अभियान को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने “अमेरिकी इतिहास के सबसे साहसी सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशनों में से एक” बताया था.
ईरान के ड्रोन के बारे में क्या जानकारी आई सामने?
रिपोर्ट्स के अनुसार, बचाव अभियान के बाद पायलट ने पूछताछ और डिब्रीफिंग के दौरान खुफिया अधिकारियों को अपने अनुभव के बारे में विस्तार से बताया. उसने कहा कि जो चीज उसने आसमान में देखी वह कोई एक विमान नहीं था, बल्कि आपस में जुड़े हुए कई ड्रोन का ग्रुप था, जो एक साथ मिलकर काम कर रहा था.
पायलट के बयान के बाद रक्षा विश्लेषकों ने इस प्रणाली को “जेलीफिश ड्रोन” नाम देना शुरू किया. इसकी वजह इसका आकार और संचालन का तरीका बताया जा रहा है. विश्लेषकों के अनुसार, छोटे-छोटे ड्रोन एक केंद्रीय कमांड यूनिट के आसपास इस तरह से संचालित होते दिखाई दिए जैसे किसी जेलीफिश के आसपास उसके तंतु मौजूद हों.
इस घटना ने आधुनिक युद्ध में ड्रोन तकनीक के तेजी से बदलते स्वरूप और स्वायत्त प्रणालियों (Autonomous Systems) के बढ़ते उपयोग की ओर ध्यान आकर्षित किया है.
पायलट को क्यों लगी एलियन जैसी चीज?
बचाव अभियान से जुड़े विवरणों के अनुसार, जब पायलट ने पहली बार इस संरचना को देखा तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि वह वास्तव में क्या देख रहा है. ड्रोन हवा में स्थिर होकर और फिर एक साथ अपनी स्थिति बदलते दिखाई दे रहे थे. उनका संचालन पारंपरिक विमानों से बिल्कुल अलग था.
पायलट के मुताबिक, यह दृश्य पानी में तैरती हुई जेलीफिश जैसा लग रहा था. वहीं बाद में फुटेज का विश्लेषण करने वाले कुछ लोगों ने इसकी तुलना साइंस फिक्शन फिल्मों में दिखाई जाने वाली तकनीकों से की.
विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे असामान्य बात यह थी कि ये ड्रोन अलग-अलग मशीनों की तरह नहीं बल्कि एक ही जीवित इकाई की तरह व्यवहार करते नजर आ रहे थे. उनकी गतिविधियां इतनी समन्वित थीं कि ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरा ग्रुप एक ही दिमाग से संचालित हो रहा हो.
क्या है जेली फिश ड्रोन?
अमेरिकी पायलट ने जो देखा उसे स्वॉर्म टेक्नोलॉजी (Swarm Technology) कहते हैं. ये ऐसे नेटवर्क पर आधारित होती है जिसमें सभी ड्रोन लगातार एक-दूसरे के साथ जानकारी साझा करते रहते हैं. इस सिस्टम में ऑपरेशन केवल एक कंट्रोलर पर निर्भर नहीं होता, बल्कि हर एक ड्रोन पूरे समूह की सामूहिक समझ और निर्णय क्षमता में योगदान देता है.
कुछ ड्रोन खुफिया जानकारी जुटाने का काम करते हैं, जबकि अन्य संभावित खतरों की निगरानी करते हैं. कुछ ड्रोन संचार प्रणालियों को बाधित करने यानी जैमिंग का काम कर सकते हैं, जबकि कुछ हथियारों से लैस भी हो सकते हैं.
किसी एक ड्रोन द्वारा इकट्ठा की गई जानकारी तुरंत पूरे नेटवर्क में साझा हो जाती है. इससे पूरा समूह बहुत तेजी से प्रतिक्रिया देने में सक्षम हो जाता है और बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीति में तत्काल बदलाव कर सकता है.
कई डिजाइनों में एक बड़ा ड्रोन कमांड सेंटर या कमांड हब की भूमिका निभाता है, जबकि उसके आसपास कई छोटे ड्रोन काम करते हैं. अगर मिशन के दौरान कोई एक ड्रोन नष्ट भी हो जाए तो बाकी ड्रोन अपनी स्थिति बदलकर मिशन को जारी रख सकते हैं.
यही विशेषता स्वॉर्म टेक्नोलॉजी को पारंपरिक मानव रहित विमानों (Unmanned Aircraft) से अलग बनाती है. यहां प्रत्येक ड्रोन केवल एक स्वतंत्र मशीन नहीं होता, बल्कि पूरे नेटवर्क का सक्रिय हिस्सा होता है.
क्या और देश भी कर रहे हैं इस तकनीक में इनवेस्ट?
दुनिया की कई सैन्य शक्तियां ड्रोन स्वॉर्म तकनीक में भारी निवेश कर रही हैं क्योंकि इससे युद्धक्षेत्र में कई रणनीतिक लाभ मिलते हैं. भारत भी उन देशों में से एक है. पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम आमतौर पर सीमित संख्या में आने वाले बड़े और महंगे लक्ष्यों को रोकने के लिए बनाए गए थे, लेकिन बड़ी संख्या में आने वाले ड्रोन के समूह को रोकना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है. इसके अलावा, ड्रोन स्वॉर्म व्यापक क्षेत्र में निगरानी अभियान चला सकते हैं और ऐसे मिशन पूरे कर सकते हैं जिनमें मानव पायलटों को जोखिम में डालने की आवश्यकता न पड़े.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में हो रहा लगातार डेवलपमेंट ने भी इन प्रणालियों की क्षमता को काफी बढ़ा दिया है. ज्यादा इंडीपेंडेंसी और तेज फैसला लेने की क्षमता के कारण ऐसे सिस्टम पहले की तुलना में अधिक प्रभावी होते जा रहे हैं. जानकारों का मानना है कि अमेरिकी F-15 पायलट द्वारा देखा गया दृश्य इस बात का संकेत है कि ऐसी तकनीकें अब केवल प्रयोगशालाओं और परीक्षण कार्यक्रमों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वास्तविक सैन्य अभियानों में भी दिखाई देने लगी हैं.
क्या भविष्य के युद्धों की झलक है ‘जेलीफिश ड्रोन’?
जानकारों की मानें तो आने वाले सालों में ड्रोन स्वॉर्म तकनीक भविष्य के युद्धों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक बन सकती है. जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और संचार तकनीक में सुधार होगा, वैसे-वैसे ड्रोन समूह ऐसे मिशन भी पूरा कर सकेंगे जिनके लिए आज कई विमानों, सैनिकों और कमांड सेंटरों की जरूरत पड़ती है.




