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एक तरफ यूएस सीनेट ने घेरा, दूसरी तरफ ईरान ने पलटा खेल....ये किस मुश्किल में फंस गए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप: Detail

ईरान को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं,. अमेरिकी सीनेट ने सैन्य कार्रवाई सीमित करने वाला प्रस्ताव पारित किया, जबकि ईरान ने न्यूक्लियर सर्वे के दावों को खारिज कर दिया है.

एक तरफ यूएस सीनेट ने घेरा, दूसरी तरफ ईरान ने पलटा खेल....ये किस मुश्किल में फंस गए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप: Detail
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अमेरिका में ईरान नीति को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ता नजर आ रहा है. मंगलवार को अमेरिकी सीनेट ने एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया, जिसमें राष्ट्रपति ट्रंप की ईरान के खिलाफ सैन्य गतिविधियों में अमेरिकी भागीदारी को समाप्त करने की मांग की गई है. यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब व्हाइट हाउस तेहरान के साथ एक दीर्घकालिक समझौते की दिशा में बातचीत करने की कोशिश कर रहा है. उधर ईरान ने न्यूक्लियर सर्वे कराने को लेकर हाथ खड़े कर दिए हैं. जिसके बाद ट्रंप अलग खीजे हुए नजर आ रहे हैं.

सीनेट में यह प्रस्ताव 50-48 वोटों से पारित हुआ. प्रस्ताव में राष्ट्रपति को निर्देश दिया गया है कि यदि कांग्रेस विशेष रूप से सैन्य बल के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देती है, तो अमेरिका को ईरान से जुड़े सैन्य संघर्षों से अपनी सेनाओं को वापस बुला लेना चाहिए. यह कदम ट्रंप प्रशासन की ईरान नीति को लेकर बढ़ती राजनीतिक चिंता और कांग्रेस की भूमिका को लेकर चल रही बहस को दर्शाता है.

क्या असरदार है कानून?

हालांकि इस प्रस्ताव की कानूनी शक्ति सीमित है. यह 1973 के वॉर पॉवर्स एक्ट (War Powers Act) के तहत पारित एक समवर्ती प्रस्ताव (Concurrent Resolution) है. ऐसे प्रस्तावों के लिए राष्ट्रपति के हस्ताक्षर आवश्यक नहीं होते और इन्हें कानून का दर्जा भी प्राप्त नहीं होता. इसी वजह से यह प्रस्ताव सीधे तौर पर ट्रंप प्रशासन की सैन्य रणनीति को बदलने की स्थिति में नहीं है.

क्या बिना कांग्रेस की इजाजत के ट्रंप कर सकते हैं कोई ऑपरेशन?

व्हाइट हाउस पहले ही इस प्रस्ताव का विरोध कर चुका है. प्रशासन का कहना है कि यह प्रस्ताव असंवैधानिक है और कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है. ट्रंप प्रशासन लगातार यह दावा करता रहा है कि राष्ट्रपति के पास ऐसी परिस्थितियों में कांग्रेस की अतिरिक्त मंजूरी के बिना भी अमेरिकी सैन्य अभियानों को निर्देशित करने का संवैधानिक अधिकार है.

यह प्रस्ताव इससे पहले इसी महीने अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) से भी पारित हो चुका है. दोनों सदनों में इसे मिली मंजूरी इस बात का संकेत है कि ईरान से जुड़े संघर्ष में अमेरिका की सैन्य भूमिका को लेकर डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों दलों के कुछ सांसदों के बीच चिंता बढ़ रही है.

सांसदों ने क्या कहा?

प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसदों का कहना है कि यदि अमेरिका किसी लंबे सैन्य अभियान में शामिल होता है तो उसके लिए कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी आवश्यक होनी चाहिए. उनका तर्क है कि युद्ध और सैन्य हस्तक्षेप जैसे बड़े फैसले केवल राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में नहीं होने चाहिए, बल्कि संविधान के अनुसार कांग्रेस को भी इसमें निर्णायक भूमिका निभानी चाहिए.

क्या है इस प्रस्ताव का मतलब?

प्रस्ताव का पारित होना इस बात का भी संकेत माना जा रहा है कि व्हाइट हाउस पर केवल सैन्य रणनीति पर निर्भर रहने के बजाय कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देने का दबाव बढ़ रहा है. कई सांसदों का मानना है कि ईरान के साथ किसी भी विवाद का स्थायी समाधान बातचीत और समझौते के जरिए ही संभव है.

न्यूक्लियर निरक्षण पर क्यों छिड़ा है बवाल?

दूसरी ओर, परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच मतभेद भी खुलकर सामने आ गए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को ईरान के उस दावे को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों की किसी यात्रा का कार्यक्रम तय नहीं किया गया है. पेनसिल्वेनिया पहुंचने के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरानी अधिकारी गलत बयान दे रहे हैं और वास्तव में तेहरान निरीक्षण को लेकर सहमत हो चुका है.

ट्रंप ने ईरान के हाथ खड़े करने पर क्या कहा?

जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि ईरानी अधिकारियों ने IAEA निरीक्षकों की किसी निर्धारित यात्रा से इनकार किया है और क्या निरीक्षण दोनों देशों के बीच हुए समझौते का हिस्सा है, तो ट्रंप ने जवाब दिया, “वे गलत हैं, वे गलत हैं, और वे जानते हैं कि वे गलत हैं." उन्होंने आगे कहा, “उन्होंने हमें अंदर से बताया है और हमारे पास इसकी 100 प्रतिशत पुष्टि है. अगर वे सही होते तो मैं अभी इन बैठकों को रद्द कर देता.”

हालांकि जब ट्रंप से पूछा गया कि IAEA निरीक्षक आखिर ईरान कब पहुंचेंगे, तो उन्होंने कोई स्पष्ट समयसीमा बताने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि निरीक्षक “उचित समय पर” भेजे जाएंगे और इस मामले में “कोई जल्दबाजी नहीं है.”

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में लिखा, “ईरान ने भविष्य में लंबे समय तक सर्वोच्च स्तर के परमाणु निरीक्षणों को पूरी तरह और पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया है. इससे ‘न्यूक्लियर ईमानदारी’ सुनिश्चित होगी.” ट्रंप ने अपनी पोस्ट में आगे दावा किया कि ईरान की ओर से किए जा रहे अन्य महत्वपूर्ण समझौतों और रियायतों को देखते हुए अमेरिका ने होर्मुज (Strait of Hormuz) को खुला रखने का फैसला किया है.

ईरान ने क्या कहा?

ईरानी अधिकारियों ने विशेष रूप से इस बात से इनकार किया है कि उन्होंने IAEA निरीक्षकों की किसी निर्धारित यात्रा या लंबे समय तक चलने वाले परमाणु निरीक्षण कार्यक्रम पर सहमति दी है. उनका कहना है कि सप्ताहांत में स्विट्जरलैंड में हुई वार्ताओं के दौरान ऐसी कोई बात तय नहीं हुई.

इस तरह अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत के बीच दोनों देशों के दावों में स्पष्ट विरोधाभास दिखाई दे रहा है. जहां ट्रंप प्रशासन यह दावा कर रहा है कि तेहरान ने व्यापक परमाणु निरीक्षणों और अन्य महत्वपूर्ण शर्तों को स्वीकार कर लिया है, वहीं ईरान इन दावों को खारिज कर रहा है.

किस असमंजस में फंसे ट्रंप?

एक तरफ अमेरिकी कांग्रेस ट्रंप प्रशासन की सैन्य नीति पर सवाल उठा रही है, वहीं दूसरी तरफ परमाणु निरीक्षणों और संभावित समझौतों को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच सार्वजनिक स्तर पर मतभेद सामने आ रहे हैं. ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देशों के बीच चल रही कूटनीतिक बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या किसी व्यापक समझौते पर सहमति बन पाती है या नहीं.

डोनाल्ड ट्रंप
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