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अब मिसाइल या बमबारी से नहीं, महंगाई की मार से दुनिया को परेशान करेगा ईरान!

ईरान की रणनीति अब मिसाइलों से आगे बढ़कर आर्थिक मोर्चे पर आ गई है, जहां तेल सप्लाई और होर्मुज स्ट्रेट को निशाना बनाया जा रहा है. इसका असर सीधे महंगाई, ग्लोबल सप्लाई और आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है.

Iran Economic War Strait of Hormuz Impact Global Inflation
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मिडिल ईस्ट में पिछले 21 दिनों से जारी तनाव ने युद्ध की परिभाषा ही बदल दी है. अब लड़ाई सिर्फ मिसाइलों और बमबारी तक सीमित नहीं रही, बल्कि आर्थिक हथियारों के जरिए भी लड़ी जा रही है. ईरान जिस तरह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) और तेल-गैस इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना रहा है, उसका सीधा असर वैश्विक महंगाई पर पड़ सकता है. सवाल यह है कि आखिर ईरान कैसे बिना सीधे युद्ध के दुनिया को महंगाई के जरिए परेशान कर सकता है? समझें कि इसके जवाब में डीयू में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार ने क्या कहा.

दिल्ली विश्वविद्यालय एआरएसडी कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार ने​ मिडिल ईस्ट वॉर के लंबा खिंचने को लेकर एक डरावनी तस्वीर पेश की है. उनका कहना है कि अगर युद्ध कुछ दिनों में समाप्त नहीं हुआ तो लोगों के घर में चूल्हे कैसे जलेंगे? इसका असर एशिया या फिर दक्षिण एशिया तक ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व पर होना तय होगा. दुनिया अभी कोविड 19 की मार से ही नहीं उबर पाई थी. यह वॉर विश्व अर्थव्यवस्था की बैकबोन को हिलाकर रख देगी. सूई से लेकर हवाई जहाज, रोजगार, बच्चों की पढ़ाई, हर क्षेत्र में परेशानियों से लोगों को रूबरू होना पड़ेगा.

प्रोफेसर राकेश कुमार का कहना है कि ऐसा इसलिए होगा कि एनर्जी के मामले में पूरी दुनिया फोसिल फ्यूल पर निर्भर है. अभी तक केवल 20 प्रतिशत तेल उत्पादन रुकने पर ये हाल है. अब जब गैस का उत्पादन भी ठप होगा तो, स्थिति अकल्पनीय होंगी. अभी ताक 20 दिनों की लड़ाई में कच्चा तेल 67 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 140 डॉलर प्रति बैरल हो गया है. यानी दोगुना से भी ज्यादा तेल की कीमती हो गई हैं. इजरायल की ओर से ईरान की तेल रिफायनरी पर हमले और उसके बाद कतर, कुर्वत, यूएई और सऊदी अरब की बड़ी रिफायनरी पर हमले से एलपीजी और पीएनजी का उत्पादन रुक गया है. आप अंदाजा नहीं लगा सकते कि आगे आने वाले दिनों में और क्या होगा. जानें, इसके अलावा प्रोफेसर राकेश कुमार ने और क्या कहा?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्यों इतना अहम है?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल ट्रांजिट रूट है. दुनिया की करीब 20% तेल सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है. खाड़ी देशों (सऊदी अरब, UAE, कुवैत, इराक) का ज्यादातर निर्यात इसी पर निर्भर है. अगर ईरान इस रास्ते को बाधित करता है या बंद करने की धमकी देता है, तो वैश्विक सप्लाई तुरंत प्रभावित होती है.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से महंगाई कैसे बढ़ेगी?

अगर यह जलडमरूमध्य बंद होता है तो तेल की सप्लाई अचानक घटेगी. मांग बनी रहेगी या बढ़ेगी. इससे कीमतें तेजी से बढ़ेंगी. तेल की कीमतें $120 प्रति बैरल तक जा सकती हैं. तेल महंगा होते ही पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे. ट्रांसपोर्ट महंगा होगा. हर चीज की कीमत बढ़ेगी (खाद्य, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स). यानी तेल महंगाई का “मल्टीप्लायर” बन जाता है.

रिफाइनरियों पर हमले से सप्लाई चेन कैसे टूटती है?

ईरान अगर तेल रिफाइनरी और LNG प्लांट्स पर हमला करता है तो कच्चे तेल को प्रोसेस करने की क्षमता घटती है. तैयार पेट्रोल, डीजल, गैस की सप्लाई कम हो जाती है. इससे बाजार में कमी (Shortage) पैदा होती है और कीमतें तेजी से ऊपर जाती हैं. खासकर अगर सऊदी, कतर या UAE जैसे बड़े उत्पादकों की सुविधाएं प्रभावित होती हैं, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है.

LNG संकट से घरेलू और इंडस्ट्रियल महंगाई कैसे बढ़ती है?

LNG (Liquefied Natural Gas) सिर्फ किचन गैस नहीं है. यह उद्योगों की रीढ़ है. अगर सप्लाई बाधित होती है तो बिजली उत्पादन महंगा हो जाता है. उर्वरक (Fertilizer) महंगे होते हैं. स्टील, सीमेंट, केमिकल इंडस्ट्री की लागत बढ़ती है. इसका असर खेती महंगी होंगी. खेती महंगी होंगी तो खाद्य वस्तुओं की कीमतों में उछाल आएगा. इसी तरह उद्योगों के प्रोडक्ट महंगे हो जाएंगे. यानी LNG संकट सीधे घर और बाजार दोनों पर असर डालता है.

शिपिंग और लॉजिस्टिक्स महंगे होने से क्या असर होगा?

ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच तनाव बढ़ने पर जहाजों का रूट बदलना पड़ता है. इंश्योरेंस (बीमा) प्रीमियम बढ़ जाता है. फ्रेट कॉस्ट 20 से 40% तक बढ़ सकती है. इसका असर यह होगा कि सामान की डिलीवरी महंगी हो जाएंगी. आयात-निर्यात लागत बढ़ेगी. ग्लोबल सप्लाई चेन धीरे-धीरे और महंगी हो जाएगी. यानी हर प्रोडक्ट की कीमत में “लॉजिस्टिक्स कॉस्ट” जुड़ जाएगी.

क्या सिर्फ तेल ही नहीं, बाकी सेक्टर भी प्रभावित होंगे?

बिल्कुल सही, तेल महंगा होने का असर हर सेक्टर पर पड़ता है. एविएशन क्षेत्र में हवाई किराए, खेती किसानी में डीजल महंगा होने खेती की लागत बढ़ेगी, मैन्युफैक्चरिंग में वस्तुओं का उत्पादन महंगा होगा, रिटेल में सामान महंगा हो जाएगा. यानी महंगाई सिर्फ एक सेक्टर नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है.

भारत जैसे देशों पर असर ज्यादा क्यों?

भारत जैसे देश अपनी जरूरत का 85% तेल आयात करते हैं. बड़ी मात्रा में LNG भी आयात करते हैं. इसलिए तेल महंगा और आयात बिल बढ़ेगा. रुपये पर दबाव पड़ेगा. महंगाई बढ़ेगी. चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ेगा.आम आदमी के लिए इसका मतलब है, पेट्रोल-डीजल महंगा तो गैस सिलेंडर भी महंगा. रोजमर्रा के खर्च में बढ़ोतरी.

क्या यह 'आर्थिक युद्ध' है?

विशेषज्ञ इसे Economic Warfare मानते हैं. ईरान सीधे बड़े युद्ध में उलझे बिना सप्लाई चेन बाधित कर रहा है. ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर रहा है. वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहा है. इससे बिना गोली चलाए भी बड़े देशों पर असर डाला जा सकता है.

वॉर लंबा खिंचा तो आगे क्या हो सकता है?

अगर तनाव लंबा चला तो तेल सप्लाई में 2 से 5% कमी भी कीमतों को 10 से 20% बढ़ा सकती है. बड़े संकट में कीमतें $120 से भी ज्यादा तक जा सकती हैं. गैस की कीमतें 15 से 30% तक बढ़ सकती हैं. यानी महंगाई का दबाव लंबे समय तक बना रह सकता है.

मिसाइल नहीं, महंगाई बनेगी सबसे बड़ा हथियार?

मिडिल ईस्ट का यह संघर्ष दिखाता है कि आधुनिक युद्ध सिर्फ सैन्य ताकत से नहीं, बल्कि आर्थिक दबाव से भी लड़ा जा रहा है. ईरान अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाता है, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है. खासतौर पर महंगाई के रूप में. यानी आने वाले समय में सबसे बड़ा खतरा सिर्फ बम और मिसाइल नहीं, बल्कि तेल, गैस और सप्लाई चेन से पैदा होने वाली महंगाई हो सकती है.

ईरान इजरायल युद्धवर्ल्‍ड न्‍यूजडोनाल्ड ट्रंप
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