भारत की न्यूक्लियर ताकत को ऑस्ट्रेलिया का साथ, यूरेनियम बेचने वाला 9वां देश बनने में लगे 12 साल, क्या होगा फायदा?
2014 के समझौते के 12 साल बाद ऑस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम सप्लाई करने वाला 9वां देश बना. जानिए भारत की परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक हितों को क्या फायदा होगा.
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच सिविल न्यूक्लियर सहयोग अब एक नए चरण में पहुंच गया है. करीब 12 साल पहले 2014 में दोनों देशों ने असैन्य परमाणु सहयोग (Civil Nuclear Cooperation Agreement) पर हस्ताक्षर हुए थे. इसके बाद कानूनी प्रक्रियाओं, व्यावसायिक बातचीत और नियामकीय मंजूरियों में समय लगा. अब ऑस्ट्रेलिया से भारत को व्यावसायिक स्तर पर यूरेनियम की आपूर्ति का रास्ता साफ हो गया है. इसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम सप्लाई करने वाला 9वां देश बन गया है.
यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब भारत 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य हासिल करने और 2047 तक विकसित भारत के विजन के तहत परमाणु ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रहा है. ऐसे में विश्व के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार वाले देशों में शामिल ऑस्ट्रेलिया का भारत के ऊर्जा सुरक्षा ढांचे से जुड़ना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
भारत अभी किन देशों से खरीदता है यूरेनियम?
भारत अपनी जरूरत का पूरा यूरेनियम घरेलू उत्पादन से नहीं जुटा पाता. झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और राजस्थान में यूरेनियम का उत्पादन होता है, लेकिन यह देश की बढ़ती परमाणु ऊर्जा जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं है. इसलिए भारत कई देशों से यूरेनियम आयात करता है.
वर्तमान में भारत के प्रमुख यूरेनियम आपूर्तिकर्ता देशों में कजाकिस्तान, कनाडा, रूस, फ्रांस, उज़्बेकिस्तान, नामीबिया, मंगोलिया, अर्जेंटीना और अब ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं. इनमें कजाकिस्तान लंबे समय से भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता रहा है, जबकि रूस परमाणु ईंधन के साथ-साथ रिएक्टर सहयोग भी देता है.
ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम कब से मिलने लगा?
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच सितंबर 2014 में Civil Nuclear Cooperation Agreement हुआ था. इससे पहले ऑस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम बेचने के पक्ष में नहीं था क्योंकि भारत परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का सदस्य देश नहीं है.
हालांकि, 2008 में भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) से विशेष छूट मिलने और दोनों देशों के बीच रणनीतिक संबंध मजबूत होने के बाद स्थिति बदली. 2014 के समझौते ने कानूनी आधार तैयार किया. इसके बाद ऑस्ट्रेलियाई संसद में मंजूरी, सुरक्षा प्रोटोकॉल, IAEA की निगरानी व्यवस्था और व्यावसायिक अनुबंधों की प्रक्रिया पूरी होने में वर्षों लगे. अब कमर्शियल सप्लाई का रास्ता पूरी तरह खुल गया है.
भारत को इससे क्या फायदा होगा?
सबसे बड़ा फायदा भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा. भारत सरकार ने 2032 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को तेजी से बढ़ाने का लक्ष्य रखा है. नए परमाणु संयंत्रों को लगातार ईंधन की जरूरत होगी, जिसे केवल घरेलू उत्पादन से पूरा करना संभव नहीं है.
ऑस्ट्रेलिया के जुड़ने से भारत किसी एक या दो देशों पर निर्भर नहीं रहेगा. यदि किसी क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव, प्रतिबंध या आपूर्ति बाधित होती है, तो भारत के पास वैकल्पिक स्रोत मौजूद रहेंगे. इससे परमाणु बिजली उत्पादन बिना रुकावट जारी रखने में मदद मिलेगी.
दूसरा बड़ा लाभ यह है कि ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार वाले देशों में शामिल है. लंबे समय तक स्थिर आपूर्ति मिलने से भारत भविष्य की परमाणु परियोजनाओं की बेहतर योजना बना सकेगा.
सिर्फ यूरेनियम नहीं, रणनीतिक साझेदारी भी मजबूत
यह समझौता केवल यूरेनियम तक सीमित नहीं है. भारत और ऑस्ट्रेलिया ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन और क्रिटिकल मिनरल्स (जैसे लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स) में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई है.
आज दुनिया में ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) और इलेक्ट्रिक वाहनों की दौड़ के बीच क्रिटिकल मिनरल्स का महत्व लगातार बढ़ रहा है. ऑस्ट्रेलिया इन खनिजों का बड़ा उत्पादक है, जबकि भारत बैटरी निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स और ग्रीन एनर्जी सेक्टर में निवेश बढ़ा रहा है. ऐसे में यह साझेदारी केवल परमाणु ऊर्जा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भविष्य की तकनीकी अर्थव्यवस्था में भी दोनों देशों को करीब लाएगी.
इंडो-पैसिफिक रणनीति में भी बढ़ेगी भारत की भूमिका
भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों QUAD (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) के सदस्य हैं. चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षित सप्लाई चेन, समुद्री सुरक्षा और भरोसेमंद रणनीतिक साझेदारी दोनों देशों की साझा प्राथमिकता है. ऐसे में यूरेनियम व्यापार केवल ऊर्जा का सौदा नहीं, बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक सहयोग का भी प्रतीक है.
ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की कमर्शियल सप्लाई शुरू होना भारत के लिए सिर्फ एक ऊर्जा समझौता नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक निवेश है. इससे भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता, ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को मजबूती मिलेगी. साथ ही रक्षा, क्रिटिकल मिनरल्स और हाई-टेक सेक्टर में सहयोग बढ़ने से भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंध नई ऊंचाइयों पर पहुंच सकते हैं. आने वाले वर्षों में यह साझेदारी भारत के ऊर्जा, आर्थिक और सामरिक हितों के लिए महत्वपूर्ण आधार साबित हो सकती है.
बता दें कि भारत ने 2047 तक 100 गीगावॉट (GW) न्यूक्लियर क्षमता हासिल करने का लक्ष्य तय कर रखा है. अब उस लक्ष्य को हासिल करना भी आसान हो जाएगा.




