Ajit Doval से उड़ी पाकिस्तान की नींद, क्यों रो रही 'मुनीर सेना', Doval Doctrine बोल दुनिया के सामने रख दी अपने ही मुल्क की बदतर तस्वीर
पाकिस्तान के रिटायर्ड जनरल मजहर जमील ने डोभाल डॉक्ट्रिन, ऑपरेशन सिंदूर, ब्रह्मोस और भारत की परमाणु नीति पर सवाल उठाए. जानिए उनके आरोपों की पूरी कहानी.
भारत की रक्षा तैयारियों से मुनीर सेना की सेना पूरी तरह से बेचैन है. खासकर अजीत डोभाल का खौफ वहां पर इतना है कि उसके एक पूर्व सैन्य अधिकारी ने अपने देश में आतंकवादी हिंसा, गृह युद्ध के खतरे और सैन्य चुनौतियों को भारत की कथित ‘डोभाल डॉक्ट्रिन’ को जिम्मेदार ठहराने से बाज नहीं आया. लंदन में 13 अक्टूबर को इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज में बोलते हुए सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल मजहर जमील ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) से लेकर बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) तक का जिक्र किया. इंडिया टुडे, डॉन और गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक लंदन में बैठे लेफ्टिनेंट जनरल रिटायर्ड मजहर जमील ने ब्रह्मोस मिसाइल, ऑपरेशन सिंदूर और भारत की परमाणु नीति पर भी सवाल उठाए.
मजहर जमील के आरोप है कि अजीत डोभाल कथित तौर पर पाकिस्तान को भीतर से कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रहा है. ऐसे में सवाल यह है कि ‘डोभाल डॉक्ट्रिन’ क्या है, जिससे पूरा पाकिस्तान खौफ में है.
अननोन गनमैन से PAK को डर क्यों?
यहां पर अहम सवाल यह है कि पाकिस्तान में भारत-विरोधी आतंकियों की रहस्यमयी हत्याओं से लेकर देश में जारी हिंसा तक, मजहर जमील ने कई घटनाओं को कथित ‘डोभाल डॉक्ट्रिन’ से जोड़ने की कोशिश की. 2020 के बाद लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन से जुड़े कई चर्चित आतंकियों की मौत की खबरें सामने आईं.
2023 में बशीर अहमद पीर, रियाज अहमद और पठानकोट हमले के आरोपी शाहिद लतीफ की हत्याओं ने भी सुर्खियां बटोरीं. पाकिस्तान में कुछ लोग इन घटनाओं के पीछे अज्ञात हमलावरों के साथ भारतीय रणनीति का हाथ होने का आरोप लगाते रहे हैं.
हालांकि, इन हत्याओं के पीछे भारत या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की भूमिका साबित करने वाला कोई निर्णायक सबूत अभी तक सामने नहीं आया है. फिर भी पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसियां रहस्यमयी हत्याओं को भारत की आधिकारिक रणनीति का हिस्सा बताने से नहीं चूकता.
पाकिस्तान की बदहाली के लिए डोभाल कैसे जिम्मेदार?
मजहर जमील ने आरोप लगाया कि भारत पाकिस्तान में अस्थिरता फैलाने के लिए आतंकवाद को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है. अपने दावे के समर्थन में उन्होंने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) का नाम लिया. TTP पाकिस्तान में सक्रिय प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन है, जो पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमलों के लिए जिम्मेदार रहा है.
वहीं, BLA बलूचिस्तान में सक्रिय सशस्त्र अलगाववादी संगठन है, जिसे पाकिस्तान और कई अन्य देशों ने आतंकवादी संगठन घोषित किया है. इन संगठनों की गतिविधियां पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई हैं. जमील का आरोप है कि भारत इन समूहों को समर्थन देकर पाकिस्तान को कमजोर कर रहा है.
मुक्ति वाहिनी और LTTE का उदाहरण क्यों?
अपने आरोपों को ऐतिहासिक आधार देने के लिए मजहर जमील ने 1971 की मुक्ति वाहिनी और 1980 के दशक में सक्रिय रहे लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) का हवाला दिया. उनका तर्क था कि भारत पहले भी दूसरे देशों में सक्रिय संगठनों को समर्थन देकर अपने रणनीतिक हित साधता रहा है. 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक संकट, पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई और बड़े पैमाने पर हिंसा के बाद बांग्लादेश मुक्ति संग्राम हुआ. मुक्ति वाहिनी ने पाकिस्तानी सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ी और भारत ने बांग्लादेश की स्वतंत्रता में निर्णायक भूमिका निभाई.
दूसरी ओर, श्रीलंका में तमिल अलग राज्य की मांग करने वाले LTTE के साथ भारत के संबंध भी समय के साथ बदले. 1980 के दशक में भारत ने तमिल उग्रवादी समूहों से जुड़ी गतिविधियां कीं, जबकि बाद में भारतीय शांति सेना श्रीलंका भेजी गई. LTTE ने 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी, जिसके बाद भारत ने संगठन पर प्रतिबंध लगाया.
अफगानिस्तान के छह वाणिज्य दूतावासों पर आरोप क्यों?
मजहर जमील ने अफगानिस्तान में 2001 से 2014 के बीच अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था के दौर का हवाला देते हुए दावा किया कि भारत ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा के आसपास छह वाणिज्य दूतावास चलाए. उन्होंने इन राजनयिक कार्यालयों को पाकिस्तान के खिलाफ कथित भारतीय गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश की.
इतना ही नहीं, तालिबान शासन के पतन के बाद भारत ने अफगानिस्तान में विकास परियोजनाओं, बुनियादी ढांचे और राजनयिक संबंधों पर निवेश किया था. भारत ने वहां दूतावास और वाणिज्य दूतावास स्थापित किए. लेकिन राजनयिक कार्यालयों की मौजूदगी अपने आप में किसी देश के खिलाफ गुप्त गतिविधियों का प्रमाण नहीं है. जमील के दावे को साबित करने के लिए ऐसे स्वतंत्र और सत्यापित साक्ष्य जरूरी हैं, जो कथित गतिविधियों और भारतीय सरकार के बीच सीधा संबंध दिखा सकें.
ब्रह्मोस को परमाणु मिसाइल बताना कितना सही?
मजहर जमील ने मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि भारत ने ऐसी ब्रह्मोस मिसाइलों का इस्तेमाल किया, जो पारंपरिक विस्फोटक के साथ परमाणु हथियार भी ले जा सकती हैं.
ऑपरेशन सिंदूर से परमाणु युद्ध का डर क्यों?
मजहर जमील ने ऑपरेशन सिंदूर का हवाला देकर दावा किया कि भारत ने दक्षिण एशिया को परमाणु तबाही के करीब पहुंचा दिया था. उनके मुताबिक, पाकिस्तान के रणनीतिक संयम के कारण हालात संभले. मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव बढ़ा था. दोनों देश परमाणु हथियार संपन्न हैं, इसलिए उनके बीच किसी बड़े सैन्य टकराव को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता स्वाभाविक है. इसी को जमील ने भारत की सैन्य कार्रवाई को परमाणु जोखिम से जोड़कर पेश किया.
भारत की नो फर्स्ट यूज नीति दिखावा क्यों?
मजहर जमील ने भारत की परमाणु नीति पर भी सवाल उठाते हुए नो फर्स्ट यूज यानी पहले परमाणु हमला न करने की घोषित नीति को महज राजनयिक चाल बताया. भारत ने 1999 में अपने परमाणु सिद्धांत का मसौदा सार्वजनिक किया था. इसके बाद 2003 में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने परमाणु सिद्धांत के प्रमुख प्रावधानों की घोषणा की. इनमें विश्वसनीय न्यूनतम परमाणु प्रतिरोधक क्षमता, पहले परमाणु हमला न करने की घोषित नीति और परमाणु हमले की स्थिति में जवाबी कार्रवाई शामिल है.
शिवशंकर मेनन की किताब का हवाला क्यों?
मजहर जमील ने अपने आरोपों को सही साबित करने के लिए भारत के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन की 2017 में प्रकाशित पुस्तक Choices: Inside the Making of India's Foreign Policy का हवाला दिया. उन्होंने मेनन की परमाणु नीति संबंधी व्याख्या को इस दावे के समर्थन में पेश किया कि भारत की घोषित नो फर्स्ट यूज नीति के बावजूद पहले हमला करने के विकल्पों पर विचार हो सकता है.
दरअसल, मेनन की पुस्तक में भारत के परमाणु सिद्धांत, भारी जवाबी कार्रवाई और पाकिस्तान की ओर से सामरिक परमाणु हथियारों के संभावित इस्तेमाल जैसे सवालों पर चर्चा की गई है. इसमें यह प्रश्न भी शामिल है कि अगर पाकिस्तान सीमित स्तर पर परमाणु हथियार इस्तेमाल करता है, तो भारत की जवाबी कार्रवाई का स्वरूप क्या हो सकता है.
2022 की ब्रह्मोस घटना को हमला क्यों बताया?
मजहर जमील ने मार्च 2022 में हुई उस घटना का भी जिक्र किया, जब भारत की एक ब्रह्मोस मिसाइल गलती से पाकिस्तान की सीमा में चली गई थी. उन्होंने इस घटना को पाकिस्तान पर जानबूझकर किए गए मिसाइल हमले के रूप में पेश किया. जबकि 9 मार्च 2022 को एक ब्रह्मोस मिसाइल अनजाने में दागी गई और पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में खानेवाल जिले के पास गिरी. भारत ने इसे तकनीकी खराबी के कारण हुई आकस्मिक फायरिंग बताया और घटना पर खेद जताया था. भारत सरकार ने मामले की जांच भी कराई.
भारत की NPT-NSG छूट पर सवाल क्यों?
मजहर जमील ने भारत को मिली परमाणु व्यापार संबंधी छूट पर भी सवाल उठाए. भारत ने परमाणु अप्रसार संधि यानी NPT पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. इसके बावजूद 2008 में भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह यानी NSG से विशेष छूट मिली, जिसने अंतरराष्ट्रीय परमाणु व्यापार और नागरिक परमाणु सहयोग का रास्ता खोला. इस व्यवस्था के तहत भारत को NPT पर हस्ताक्षर किए बिना नागरिक परमाणु सहयोग हासिल करने का अवसर मिला.
भारत की परमाणु पनडुब्बियों से पाकिस्तान क्यों चिंतित?
मजहर जमील ने स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के आकलन का हवाला देते हुए भारत की समुद्र आधारित परमाणु क्षमता पर भी सवाल उठाए. उन्होंने दावा किया कि भारत ने कुछ परमाणु हथियारों को पनडुब्बियों से दागी जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ जोड़ दिया है और समुद्र में परमाणु प्रतिरोधक गश्त की है. परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम पनडुब्बियों का रणनीतिक उद्देश्य जवाबी हमला करने की क्षमता बनाए रखना होता है. ऐसे में समुद्र में मौजूद पनडुब्बियों का पता लगाना कठिन हो सकता है, जिससे किसी देश की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है.
मजहर जमील के बयान का असली संदेश क्या?
- मजहर जमील के लंदन संबोधन में तीन प्रमुख बातें सामने आईं.
- पहली, उन्होंने TTP और BLA जैसे संगठनों की गतिविधियों को भारत की कथित रणनीति से जोड़कर पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया.
- दूसरी, उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर और ब्रह्मोस मिसाइल के संदर्भ में भारत की सैन्य कार्रवाई को परमाणु जोखिम से जोड़ने की कोशिश की.
- तीसरी, उन्होंने भारत की नो फर्स्ट यूज नीति, समुद्र आधारित परमाणु क्षमता और NSG छूट पर सवाल उठाए.
डोभाल डॉक्ट्रिन क्या है?
‘डोभाल डॉक्ट्रिन’ भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी उस रणनीतिक सोच के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला नाम है, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के विचारों और सार्वजनिक बयानों से जोड़ा जाता है. इसके तहत आतंकवाद से मुकाबला, राष्ट्रीय हितों की रक्षा, सुरक्षा खतरों के खिलाफ सक्रिय कदम और विरोधी पर रणनीतिक दबाव जैसी अवधारणाओं की चर्चा होती है. हालांकि, यह भारत सरकार की ओर से जारी कोई एक औपचारिक और विस्तृत नीति दस्तावेज नहीं है. अजीत डोभाल ने 2014 में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पद संभाला. मजहर जमील ने इसी नाम से चर्चित रणनीतिक सोच को पाकिस्तान में अस्थिरता पैदा करने की कथित भारतीय नीति से जोड़ते हुए TTP और BLA का उदाहरण दिया.




