स्टेट मिरर हिंदी के साथ बातचीत में इनसॉल्वेंसी एक्सपर्ट मनीष गुप्ता ने वरिष्ठ पत्रकार जीतेंद्र चौहान को बताया कि लोन लेने वाला आम आदमी हो या कोई बड़ा कारोबारी, बैंकिंग नियम सभी के लिए एक जैसे होते हैं. अगर किसी लोन में गारंटर है और मुख्य कर्जदार भुगतान नहीं कर पाता, तो कानून के तहत गारंटर से भी वसूली की जा सकती है. वक्ता ने सुभाष चंद्रा से जुड़े मामले का उदाहरण देते हुए समझाया कि लोन उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर नहीं लिया था, बल्कि कंपनी ने लिया था और वह उसके गारंटर बने थे. कंपनी की संपत्तियां पहले से लोन के बदले गिरवी होती हैं और उनसे रिकवरी की प्रक्रिया चलती है, जबकि गारंटर की अपनी संपत्ति से भी वसूली संभव है, हालांकि वह उसकी उपलब्ध संपत्ति की सीमा तक ही हो सकती है. उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में करीब 91% रिकवरी कंपनियों की संपत्तियों से हो चुकी है, जबकि गारंटर से वसूली को लेकर एनसीएलटी की पांच जजों वाली बेंच ने फिलहाल फैसले पर रोक लगाई है. बातचीत में यह भी समझाया गया कि इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) 2016 का उद्देश्य ऐसी कंपनियों की फंसी संपत्तियों से कर्ज की वसूली करना है और गारंटर से वसूली होना अपने आप में कोई असामान्य प्रक्रिया नहीं है.