भारत की न्याय व्यवस्था में जमानत, पैरोल और फरलो को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. एक तरफ डेरा सच्चा सौदा प्रमुख Gurmeet Ram Rahim Singh हैं, जो साल 2017 में दोषी करार दिए जाने के बाद मई 2026 तक 16 बार जेल से बाहर आ चुके हैं और करीब 430 दिन फरलो या पैरोल पर जेल से बाहर बिताए हैं. दूसरी तरफ Sharjeel Imam हैं, जिनका ट्रायल कई साल बाद भी पूरी तरह शुरू नहीं हो पाया, लेकिन उन्हें नियमित जमानत नहीं मिल सकी. इसी सवाल ने अब सोशल मीडिया से लेकर कानूनी गलियारों तक बहस छेड़ दी है कि आखिर एक ही देश और एक ही कानून के तहत इतनी अलग तस्वीर क्यों दिखाई देती है? क्या कानून सबके लिए बराबर है, या फिर कानूनी प्रक्रियाओं और धाराओं का फर्क ही इन मामलों को अलग बनाता है? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर क्राइम इन्वेस्टिगेशन संजीव चौहान ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ क्रिमिनल वकील Dr. A.P. Singh से खास बातचीत की. डॉ. एपी सिंह के मुताबिक, सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि 'फरलो', 'पैरोल' और 'बेल' तीनों अलग कानूनी व्यवस्थाएं हैं. उन्होंने बताया कि फरलो और पैरोल सजायाफ्ता कैदियों को दी जाती है, जबकि बेल ऐसे आरोपी को मिलती है जिसका ट्रायल चल रहा हो या फैसला बाकी हो. राम रहीम को जो राहत मिली, वह जेल नियमों और हरियाणा सरकार की नीतियों के तहत फरलो और पैरोल के रूप में मिली. कानून में यह प्रावधान है कि अच्छे व्यवहार, स्वास्थ्य, पारिवारिक कारण या सामाजिक पुनर्वास जैसे आधारों पर सजायाफ्ता कैदियों को सीमित समय के लिए बाहर आने की अनुमति दी जा सकती है. वहीं शरजील इमाम का मामला अलग कानूनी दायरे में आता है. उन पर गंभीर धाराएं लगाई गई हैं, जिनमें देशद्रोह और गैरकानूनी गतिविधियों से जुड़ी धाराएं शामिल रही हैं. ऐसे मामलों में अदालतें जमानत देने से पहले केस की गंभीरता, जांच की स्थिति और सार्वजनिक प्रभाव जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखती हैं.