किसी की निजी जिंदगी में जबरन घुसना, उसे अपमानित करना और फिर उसी बेबसी का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर देना. क्या अब यही नया तमाशा बन गया है? बिहार के जमुई में सामने आई घटना ने इसी सवाल को फिर खड़ा कर दिया है. रिपोर्टों के मुताबिक, एक नाबालिग लड़के-लड़की को कुछ लोगों ने रोका और उनके साथ कथित तौर पर बदसलूकी की. घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया. पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई भी की, लेकिन सवाल सिर्फ गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है. सवाल यह है कि अगर किसी को लगा कि दो लोग गलत कर रहे हैं, तो कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार किसने दिया? और अगर सच में कोई अपराध हो रहा था, तो मदद करने के बजाय वीडियो बनाना क्यों जरूरी समझा गया? किसी की गरिमा और निजता को कैमरे में कैद करके हजारों लोगों के सामने परोस देना आखिर किस तरह का कंटेंट है? इसी घटना के बहाने सवाल सिर्फ जमुई से नहीं, हम सब से है—क्या मोबाइल कैमरा इंसानियत से बड़ा हो गया है?