सोनम वांगचुक ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर 26 दिन तक चले अनशन के बाद सरकार के लिखित आश्वासन मिलने पर अपना आंदोलन समाप्त कर दिया. हालांकि, उनकी सार्वजनिक पहचान केवल इस आंदोलन तक सीमित नहीं है. पिछले लगभग चार दशकों से वह शिक्षा सुधार, पर्यावरण संरक्षण और लद्दाख के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहे हैं. 1988 में शुरू किया गया उनका SECMOL शिक्षा मॉडल और आइस स्तूप परियोजना पूरी तरह सफल मानी जाती है और इन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला. 2020 में चीन के सामान के बहिष्कार की उनकी मुहिम भी व्यापक स्तर पर चर्चा में रही. वहीं, लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने और राज्य का दर्जा दिलाने जैसे राजनीतिक मुद्दों पर उन्हें आंशिक सफलता मिली और सरकार को बातचीत की मेज तक लाने में कामयाबी मिली. NEET-UG 2026 आंदोलन में भी सरकार ने कई मांगों पर सकारात्मक कदम उठाए, लेकिन सभी मांगें पूरी नहीं हुईं. कुल मिलाकर सामाजिक और शैक्षणिक अभियानों में उनका सफलता प्रतिशत काफी मजबूत माना जाता है, जबकि राजनीतिक आंदोलनों में उन्हें लंबा संघर्ष करना पड़ा है.