बीजेपी पर आरोप लग रहे हैं कि वह मौजूदा सवालों का जवाब देने के बजाय बार-बार पुराने राजनीतिक विवादों को हवा दे रही है. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के दौर की गोलीबारी, बिहार में लालू यादव का शासन और दिल्ली में 1984 के सिख विरोधी दंगों का जिक्र कर पार्टी विपक्ष को घेरने की कोशिश कर रही है. लेकिन महंगाई, बेरोजगारी, एसआईआर और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर चर्चा क्यों नहीं हो रही? क्या बीजेपी के पास अपने कामकाज के आधार पर जवाब देने के लिए पर्याप्त मुद्दे नहीं हैं या यह विपक्ष को अपने एजेंडे में उलझाने की रणनीति है? चुनावी माहौल में पुराने मुद्दों की यह राजनीति कितनी असरदार होगी?