शाह बानो केस से लेकर मायावती के गेस्ट हाउस कांड तक, क्या हैं दोनों मामले, जिनको लेकर CM योगी ने सपा को सुनाया
उत्तर प्रदेश विधानसभा में महिला सशक्तिकरण पर स्पेशल सेशन के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर तीखा हमला किया. उन्होंने गेस्ट हाउस कांड और शाह बानो केस का जिक्र करते हुए विपक्ष को घेरा.
UP Special Session: उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने महिला सशक्तिकरण पर एक स्पेशल सेशन बुलाया. इस दौरान सीएम आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी पर जोरदार हमला किया. उन्होंने गेस्ट हाउस कांड का जिक्र किया और सपा को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि स्वर्गीय ब्रह्म दत्त द्विवेदी जी अपनी जान पर खेलकर सपा के गुंडों से भिड़े थे, तब जाकर सुश्री मायावती जी सुरक्षित हो पाई थीं.
इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस को लेकर कहा कि आखिर पार्टी के पतन का कारण क्या था? एक मुस्लिम महिला के साथ अत्याचार हुआ और कांग्रेस ने मौलवियों के सामने नाक रगड़ी. उन्होंने कहा कि अगर उस दौरान शाह बानों को न्याय मिला होता और पार्टी मौलवियों के दबाव में नहीं आती तो आज यह दुर्गति नहीं होती. आखिर ये दोनों-शाहबानों और गेस्ट हाउस केस क्या थे? आइये जानते हैं.
क्या था गेस्ट हाउस कांड?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 1993 में बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव और बहुजन समाज पार्टी प्रमुख कांशीराम ने बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए गठबंधन किया. उस समय उत्तर प्रदेश (जिसमें तब उत्तराखंड भी शामिल था) में कुल 422 विधानसभा सीटें थीं. सीट बंटवारे के तहत सपा ने 256 और बसपा ने 164 सीटों पर चुनाव लड़ा. चुनाव में गठबंधन को सफलता मिली, जिसमें सपा को 109 सीटें और बसपा को 67 सीटें प्राप्त हुईं. इसके बाद बसपा के समर्थन से मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने.
हालांकि यह गठबंधन लंबे समय तक नहीं चला. आपसी मतभेदों के चलते 2 जून 1995 को बसपा ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया, जिससे सपा सरकार अल्पमत में आ गई. सरकार को बचाने की कोशिशें शुरू हुईं, लेकिन जब कोई समाधान नहीं निकला, तो सपा के कुछ कार्यकर्ता और विधायक लखनऊ के मीराबाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्ट हाउस पहुंचे, जहां बसपा प्रमुख मायावती कमरा नंबर-1 में अपने विधायकों के साथ मौजूद थीं.
2 जून 1995 को मायावती स्टेट गेस्ट हाउस के कमरे में बैठक कर रही थीं, तभी दोपहर करीब 3 बजे कथित तौर पर समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं की भीड़ वहां पहुंची और माहौल तनावपूर्ण हो गया. इस घटना को बाद में “गेस्ट हाउस कांड” के नाम से जाना गया. इस दौरान लोगों से बचने के लिए खुदको मायावती ने एक कमरे में बंद कर लिया था.
मायावती को किसने बचाया?
इसी दौरान बीजेपी विधायक ब्रह्मदत्त द्विवेदी मौके पर पहुंचे और स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की. बताया जाता है कि उन्होंने वहां मौजूद भीड़ को पीछे हटाने और हालात को संभालने में अहम भूमिका निभाई. उनकी छवि उस समय एक दबंग और प्रभावशाली नेता की थी, और इस घटना में उनके हस्तक्षेप को मायावती की सुरक्षा सुनिश्चित करने के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाता है.
समाजवादी पार्टी की फज़ीहत?
इस दौरान मायावती ने खुद को कमरे में बंद कर कर लिया. बाद में यह भी उल्लेख मिलता है कि बीजेपी विधायक ब्रह्मदत्त द्विवेदी मौके पर पहुंचे और स्थिति को संभालने में भूमिका निभाई. उनकी पहचान एक मजबूत और दबंग नेता के रूप में होती थी. मायावती उस समय बसपा की दूसरी सबसे बड़ी नेता थीं, और यह घटना उनके राजनीतिक जीवन की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक बन गई.
क्या था शाह बानो मामला?
अप्रैल 1978 में मध्य प्रदेश के इंदौर की 62 वर्षीय मुस्लिम महिला शाह बानो ने अपने तलाकशुदा पति मोहम्मद अहमद खान के खिलाफ भरण-पोषण की मांग करते हुए अदालत का रुख किया. मोहम्मद अहमद खान एक प्रसिद्ध वकील थे. दोनों की शादी 1932 में हुई थी और उनके पांच बच्चे थे, तीन बेटे और दो बेटियां. शादी के 14 साल बाद मोहम्मद अहमद खान ने दूसरी शादी कर ली और कुछ समय दोनों पत्नियों के साथ रहने के बाद उन्होंने शाह बानो और उनके बच्चों को घर से निकाल दिया.
शाह बानो ने क्या की मांग?
शाह बानो ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 123 के तहत अपने और बच्चों के भरण-पोषण की मांग की. उनका कहना था कि तलाक के बाद भी पति को आर्थिक सहायता देनी चाहिए, अगर पत्नी खुद का खर्च नहीं उठा सकती. वहीं, मोहम्मद अहमद खान ने मुस्लिम पर्सनल लॉ का हवाला देते हुए इसका विरोध किया. उनके अनुसार, तलाक के बाद केवल इद्दत अवधि (लगभग तीन महीने) तक ही भरण-पोषण देना आवश्यक है. यदि महिला गर्भवती हो, तो यह अवधि बच्चे के जन्म तक बढ़ जाती है.
सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो के हक में फैसला सुनाया. इस फैसले के बाद यह मामला देशभर में चर्चा का विषय बन गया. कई मुस्लिम संगठनों ने इसे मुस्लिम पर्सनल लॉ के खिलाफ बताया, जबकि हिंदू संगठनों ने इसे समान नागरिक संहिता की मांग के समर्थन में इस्तेमाल किया.
क्यों हुई कांग्रेस की फज़ीहत?
इसके बाद राजनीतिक दबाव बढ़ा और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक पर संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया, जिसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने वाला कदम माना गया. इस कानून में कहा गया कि पति को भरण-पोषण का भुगतान इद्दत अवधि तक सीमित रहेगा, हालांकि जरूरत पड़ने पर वक्फ बोर्ड को सहायता देने का अधिकार भी दिया गया.
बाद में इस कानून की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. अदालत ने कानून को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि यह मुस्लिम महिलाओं को भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं करता, लेकिन इसकी अवधि को लेकर सीमाएं तय की जा सकती हैं.




