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65 साल बाद हुई 'पाग का दस्तूर', पहली बार बेटी को मिली राजगद्दी की विरासत, जानिए कौन हैं तेजस्वी कुमारी जोधा

राजस्थान के खेरवागढ़ राजपरिवार में करीब 65 साल बाद 'पाग का दस्तूर' आयोजित हुआ, लेकिन इस बार उत्तराधिकारी कोई बेटा नहीं बल्कि 13 वर्षीय तेजस्वी कुमारी जोधा बनीं. इस फैसले को परंपरा और बदलते सामाजिक सोच के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है.

65 साल बाद हुई पाग का दस्तूर, पहली बार बेटी को मिली राजगद्दी की विरासत, जानिए कौन हैं तेजस्वी कुमारी जोधा
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राजस्थान के पाली जिले का खेरवा गांव इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है. वजह कोई राजनीतिक फैसला या शाही विवाद नहीं, बल्कि एक ऐसा फैसला है जिसने राजपूत समाज की सदियों पुरानी परंपरा में बड़ा बदलाव दर्ज कर दिया. यहां 13 वर्षीय तेजस्वी कुमारी जोधा को उनके दिवंगत पिता हरीश चंद्र जोधा का उत्तराधिकारी घोषित किया गया.

परंपरा के अनुसार उनके सिर पर राजपगड़ी बांधी गई और पारंपरिक राजतिलक की रस्म निभाई गई. स्थानीय लोगों के अनुसार, इस रस्म में पहली बार किसी बेटी को परिवार की विरासत का आधिकारिक संरक्षक माना गया.

क्या होता है 'पाग का दस्तूर'?

मारवाड़ क्षेत्र में 'पाग का दस्तूर' केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उत्तराधिकार की सार्वजनिक घोषणा मानी जाती है. परिवार के मुखिया के निधन के बाद उत्तराधिकारी के सिर पर पगड़ी बांधी जाती है, जो जिम्मेदारियों के हस्तांतरण का प्रतीक होती है. अब तक यह सम्मान लगभग हमेशा पुरुष उत्तराधिकारी को ही दिया जाता रहा था. इसी वजह से तेजस्वी कुमारी का चयन इस परंपरा में एक ऐतिहासिक बदलाव माना जा रहा है.

65 साल बाद दोबारा हुई रस्म, लेकिन इस बार बदली कहानी

खेरवागढ़ राजपरिवार में लंबे समय से कोई पुरुष उत्तराधिकारी नहीं था. इसी कारण वर्षों तक यह रस्म आयोजित नहीं हुई. गांव के बुजुर्गों और समाज के लोगों ने विचार-विमर्श के बाद फैसला लिया कि परंपरा को समाप्त होने देने के बजाय परिवार की इकलौती संतान तेजस्वी कुमारी को ही उत्तराधिकारी स्वीकार किया जाए. यही निर्णय इस समारोह को खास बना गया.

400 साल पुरानी परंपरा और नई पीढ़ी का संदेश

समारोह में बड़ी संख्या में ग्रामीण और आसपास के इलाकों के लोग मौजूद रहे. वैदिक मंत्रों के बीच तेजस्वी को गुलाबी पगड़ी पहनाई गई, जिसे शोक समाप्त होने और नई जिम्मेदारी शुरू होने का प्रतीक माना जाता है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सिर्फ एक पारिवारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह संदेश भी था कि बदलते समय में बेटियां भी विरासत और नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाल सकती हैं.

खेरवागढ़ से जुड़ी वह लोककथा, जिसकी चर्चा आज भी होती है

खेरवागढ़ राजपरिवार से एक पुरानी लोककथा भी जुड़ी है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, कई दशक पहले जोरजी चंपावत नामक योद्धा की हत्या के बाद उन्होंने कथित तौर पर राजपरिवार को पुरुष उत्तराधिकारी न होने का श्राप दिया था. ग्रामीणों के बीच यह कथा आज भी लोकगीतों और मौखिक परंपराओं के जरिए सुनाई जाती है. हालांकि, इस कहानी का कोई प्रमाणित ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है और इसे स्थानीय लोकविश्वास के रूप में ही देखा जाता है.

तेजस्वी कुमारी ने क्या कहा?

समारोह के बाद तेजस्वी कुमारी ने कहा कि उनकी पहली प्राथमिकता पढ़ाई है. उन्होंने कहा कि वह अपने पिता के गांव के विकास के सपनों को आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगी और लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरना चाहेंगी.

यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है?

यह घटना केवल एक राजपरिवार की उत्तराधिकार परंपरा तक सीमित नहीं है. सामाजिक दृष्टि से यह उन बदलावों का संकेत भी मानी जा रही है, जहां परंपराओं को समय के साथ नए नजरिए से देखा जा रहा है. खेरवा गांव की यह घटना अब राजस्थान में महिला नेतृत्व, उत्तराधिकार और सामाजिक बदलाव पर नई चर्चा का कारण बन गई है.

5 बड़ी बातें एक नजर में

  1. पहली बार किसी बेटी को खेरवागढ़ का उत्तराधिकारी माना गया.
  2. 'पाग का दस्तूर' करीब 65 साल बाद आयोजित हुआ.
  3. तेजस्वी कुमारी परिवार की इकलौती संतान हैं.
  4. समारोह में बड़ी संख्या में ग्रामीण और समाज के लोग शामिल हुए.
  5. इस फैसले को परंपरा और महिला सशक्तिकरण के नए अध्याय के रूप में देखा जा रहा है.
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