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छात्रों को बचाव का मौका दिया जाए! नकल मामले में MBBS छात्रों को राहत, पंजाब और हरियाणा HC ने रद्द किया निष्कासन

चंडीगढ़ हाई कोर्ट ने MBBS छात्रों के निष्कासन को रद्द करते हुए कहा कि बिना उचित सुनवाई के सजा देना गलत है. अब यूनिवर्सिटी को दोनों पक्षों को सुनकर दोबारा फैसला लेना होगा.

MBBS student expulsion case
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( Image Source:  AI Sora )
रूपाली राय
Edited By: रूपाली राय3 Mins Read

Published on: 24 March 2026 9:17 AM

चंडीगढ़ में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक बहुत बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने परीक्षा में नकल करने के आरोप में दो MBBS छात्रों को निकाल दिए जाने का आदेश रद्द कर दिया है. कोर्ट ने साफ कहा कि भले ही नकल का आरोप कितना भी गंभीर क्यों न हो, लेकिन कॉलेज या यूनिवर्सिटी को किसी भी छात्र को सजा देने से पहले प्राकृतिक न्याय के नियमों का पालन करना जरूरी है. मतलब, छात्र को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका देना चाहिए.

मामला क्या था?

ये दोनों छात्र हैं खुशी सहरावत और विधि राणा. दोनों पंडित बी.डी. शर्मा स्वास्थ्य साइंस यूनिवर्सिटी, रोहतक में MBBS की पढ़ाई कर रही थीं. यूनिवर्सिटी ने उन्हें एग्जाम में नकल करने के आरोप में निकाल दिया था और उनकी परीक्षा भी रद्द कर दी थी. परीक्षा के दौरान बड़े स्तर पर गड़बड़ियां सामने आई थीं. कुछ छात्रों की आंसर शीट एक-दूसरे से मैच नहीं कर रही थी. कुछ जगहों पर शक हुआ कि किसी और व्यक्ति ने छात्रों की जगह परीक्षा दी है. प्रारंभिक जांच में करीब 30 छात्रों पर शक हुआ, जिसमें ये दोनों लड़कियां भी शामिल थी. यूनिवर्सिटी ने अनुशासन समिति बनाई. उस समिति ने फोरेंसिक जांच करवाई, यानी हैंडराइटिंग एक्सपर्ट से लिखावट की जांच कराई. रिपोर्ट में कहा गया कि कुछ आंसर शीट्स की लिखावट इन छात्रों की अपनी लिखावट से अलग है. इसी आधार पर यूनिवर्सिटी ने दोनों को निकाल दिया.

कोर्ट ने क्या कहा?

हाई कोर्ट के जस्टिस कुलदीप तिवारी ने कहा कि आरोप भले ही गंभीर हों, लेकिन यूनिवर्सिटी ने छात्रों के साथ उचित व्यवहार नहीं किया. मुख्य बातें जो कोर्ट ने बताईं:

कुलपति ने छात्रों को व्यक्तिगत सुनवाई का मौका नहीं दिया.

अनुशासन समिति की सिफारिशें और हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट छात्रों को दिखाई नहीं गई.

छात्रों को अपना बचाव करने के लिए जरूरी दस्तावेज नहीं दिए गए.

कोर्ट का कहना है कि बिना इन सब चीजों के किसी को भी सजा देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है. इसलिए निष्कासन का आदेश कानूनी रूप से सही नहीं है.

अब आगे क्या होगा?

कोर्ट ने दोनों छात्रों को 27 मार्च 2026 को यूनिवर्सिटी के कुलपति के सामने पेश होने का आदेश दिया है. यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया गया है कि सभी जरूरी डाक्यूमेंट्स (हैंडराइटिंग रिपोर्ट, अनुशासन समिति की सिफारिश आदि) दोनों छात्रों को पहले से ही दे दें. कुलपति दोनों पक्षों को सुनकर नया फैसला लेंगे. इस फैसले से साफ हो गया है कि शिक्षा संस्थान कितना भी गुस्सा या गंभीर मामला क्यों न हो, लेकिन छात्रों के अधिकारों और उचित प्रक्रिया का सम्मान करना बहुत जरूरी है. बिना सही प्रक्रिया के कोई भी सजा अमान्य मानी जाएगी।ये फैसला उन सभी छात्रों के लिए राहत भरा है जो ऐसे मामलों में बिना पूरी जांच और सुनवाई के सजा पा जाते हैं.

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