Begin typing your search...

सुबह लाल-रात में पीला... लगातार रंग बदल रहा था इंदौर का जहरीला पानी, पार्षद ने झाड़ा जिम्मेदारी से पल्ला - Latest Updates

इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पेयजल ने भयावह त्रासदी को जन्म दिया है. नलों से आ रहे पानी का रंग रात में पीला और सुबह लाल होने की शिकायतों के बावजूद समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, जिसका नतीजा 14 मौतों और हजारों बीमारों के रूप में सामने आया. लैब जांच में पानी में ई-कोलाई और शिगेला जैसे घातक बैक्टीरिया की पुष्टि हुई है. नगर निगम की लापरवाही, लंबित टेंडर और टूटी ड्रेनेज लाइनों ने इस संकट को और गहरा किया. अब यह मामला सिर्फ स्वास्थ्य आपदा नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन गया है.

सुबह लाल-रात में पीला... लगातार रंग बदल रहा था इंदौर का जहरीला पानी, पार्षद ने झाड़ा जिम्मेदारी से पल्ला - Latest Updates
X
( Image Source:  ANI )
नवनीत कुमार
Edited By: नवनीत कुमार

Published on: 2 Jan 2026 12:37 PM

देश के सबसे स्वच्छ शहर कहे जाने वाले इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में जो पानी नलों से निकला, वह सिर्फ दूषित नहीं था, वह मौत की चेतावनी थी. पीड़ितों का कहना है कि पानी का रंग रात में पीला और सुबह तक खून की तरह लाल हो जाता था, लेकिन सिस्टम ने इस बदलाव को समय रहते नहीं देखा.

वर्मा अस्पताल में भर्ती मरीज ने बताया कि उनके घर में केवल नर्मदा पाइपलाइन का पानी आता था. वही पानी पीने और खाना बनाने में इस्तेमाल हुआ, जिसने उन्हें उल्टी-दस्त और चक्कर की हालत में अस्पताल पहुंचा दिया. और कई महिलाएं कहती हैं कि उन्हें शक तो हुआ, लेकिन विकल्प न होने के कारण वही पानी इस्तेमाल करना पड़ा.

स्‍टेट मिरर अब WhatsApp पर भी, सब्‍सक्राइब करने के लिए क्लिक करें

खुदाई, ड्रेनेज और लापरवाही

स्थानीय लोगों के मुताबिक, इलाके में लंबे समय से सड़क खुदाई का काम चल रहा था. इसी दौरान ड्रेनेज लाइन फूटी और गटर का पानी नर्मदा लाइन में मिल गया. नेहा विश्वकर्मा जैसे मरीज, जो खुद बोरिंग का पानी पीती थीं, भी मोहल्ले की दुकानों पर इसी दूषित पानी से बनी चीजें खाने के बाद बीमार पड़ीं.

लैब रिपोर्ट ने लगाया अंतिम ठप्पा

जब मौतों के बाद पानी के सैंपल जांच के लिए भेजे गए, तो एमजीएम मेडिकल कॉलेज की लैब रिपोर्ट ने चौंकाने वाला सच सामने रखा. पानी में ई-कोलाई और शिगेला जैसे घातक बैक्टीरिया पाए गए, जो सीधे तौर पर मानव मल से जुड़े होते हैं. यह साफ हो गया कि मौतें किसी अफवाह से नहीं, बल्कि जहरीले पानी से हुईं.

शिकायतें थीं, कार्रवाई नहीं

भागीरथपुरा के रहवासियों का आरोप है कि वे सालों से गटर के पानी की शिकायत कर रहे थे. वार्ड पार्षद से लेकर नगर निगम की 311 ऐप और सीएम हेल्पलाइन तक, हर जगह शिकायत दर्ज कराई गई लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला. लोगों का सवाल है कि अगर तब जांच होती, तो क्या 14 जानें बच सकती थीं?

पार्षद ने जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा

वार्ड पार्षद कमल वाघेला ने माना कि इलाके का इंफ्रास्ट्रक्चर बुरी तरह जर्जर है, लेकिन जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि हालात पहले से ऐसे ही थे. उधर नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के शुरुआती बयानों और संभावनाओं पर की गई खुदाई भी किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी.

इलाज जारी, डर कायम

अब तक करीब 2800 मरीज सामने आ चुके हैं. 32 लोग ICU में भर्ती हैं और हर दिन नए मरीज सामने आ रहे हैं. स्वास्थ्य केंद्रों पर सुबह से रात तक मरीजों की लाइनें लगी हैं. कई परिवारों में बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक एक साथ बीमार पड़े हैं, जिससे इलाके में डर और गुस्सा दोनों चरम पर हैं.

सवाल वही, जवाब अधूरे

भागीरथपुरा का यह कांड अब सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि सिस्टम की जवाबदेही की कसौटी बन चुका है. लोग पूछ रहे हैं. जब शिकायतें पहले थीं, तो कार्रवाई मौतों के बाद ही क्यों? जब टेंडर छह महीने पहले निकले थे, तो पाइपलाइन बदली क्यों नहीं गई? रंग बदलते पानी ने सब कुछ बता दिया था, बस सुनने वाला कोई नहीं था.

टेंडर फाइलों में दबी रहीं जिंदगियां

इस पूरे मामले में सबसे गंभीर सवाल नगर निगम की कार्यप्रणाली पर उठता है. खुद इंदौर के मेयर द्वारा छह महीने पहले पाइपलाइन बदलने के लिए टेंडर जारी किए गए थे, लेकिन वे आज तक स्वीकृत नहीं हुए. आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया को जानबूझकर लटकाया गया ताकि “सेटिंग” के जरिए बड़े खेल किए जा सकें. अगर समय रहते पाइपलाइन बदल दी जाती, तो नर्मदा लाइन में ड्रेनेज का पानी मिल ही नहीं पाता और 14 परिवारों को अपनों की चिताएं नहीं सजानी पड़तीं.

आम नागरिक कितना सुरक्षित?

भागीरथपुरा की यह त्रासदी बताती है कि भारत के तथाकथित “स्मार्ट और स्वच्छ शहरों” में भी आम नागरिक कितना असुरक्षित है. एक तरफ प्रशासन आंकड़ों में मौतों की संख्या घटाने-बढ़ाने में उलझा है, दूसरी तरफ पीड़ित परिवार अपने बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को खो चुके हैं. सवाल सिर्फ इतना नहीं कि पानी कहां से गंदा हुआ, सवाल यह है कि जब नागरिक बार-बार चेतावनी दे रहे थे, तब सिस्टम क्यों बहरा बना रहा? अब यह मामला बीमारी का नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता और जवाबदेही तय करने की आखिरी परीक्षा बन चुका है.

MP news
अगला लेख