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Indore Water Crisis: स्वच्छ शहर का सिविक सिस्टम एक झटके में कैसे हो गया फेल? दूषित पानी से प्रेशर में हेल्थ सिस्टम, 250 लोग भर्ती

देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में दूषित पेयजल से फैली बीमारी ने सिविक और स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर कर दिया है. भागीरथपुरा इलाके में गटर का पानी पाइपलाइन में मिलने से 250 लोग बीमार पड़े और कई को ICU में भर्ती करना पड़ा. चेतावनियां पहले से मौजूद थीं, लेकिन समय पर कार्रवाई नहीं हुई. अचानक मरीजों की संख्या बढ़ने से अस्पतालों पर भारी दबाव पड़ा और प्रशासन को युद्धस्तर पर डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग शुरू करनी पड़ी. यह मामला सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता की भी कहानी है.

Indore Water Crisis: स्वच्छ शहर का सिविक सिस्टम एक झटके में कैसे हो गया फेल? दूषित पानी से प्रेशर में हेल्थ सिस्टम, 250 लोग भर्ती
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( Image Source:  sora ai )
नवनीत कुमार
Edited By: नवनीत कुमार

Updated on: 3 Jan 2026 8:32 AM IST

देश में स्वच्छता रैंकिंग का पोस्टर बॉय रहा इंदौर अचानक एक गंभीर स्वास्थ्य आपदा के केंद्र में आ गया. भागीरथपुरा इलाके में दूषित पेयजल से फैली बीमारी ने यह साफ कर दिया कि कागज़ों में मजबूत दिखने वाला सिविक सिस्टम ज़मीनी हकीकत में कितना नाज़ुक है. कुछ ही दिनों में मामूली उल्टी-दस्त का मामला जानलेवा संकट में बदल गया.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, भागीरथपुरा में दूषित पानी की शिकायतें अक्टूबर से ही सामने आने लगी थीं. लेकिन जब तक पहली मौतें नहीं हुईं, प्रशासन ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. 28 दिसंबर को जब सिर्फ छह मरीज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे थे, तब किसी ने अंदाजा नहीं लगाया था कि 48 घंटे के भीतर मरीजों की संख्या सैकड़ों में पहुंच जाएगी.

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अचानक टूटा स्वास्थ्य तंत्र पर बोझ

29 और 30 दिसंबर आते-आते हालात बेकाबू हो गए. एक ही दिन में OPD मरीजों की संख्या 129 से बढ़कर 300 के पार चली गई. स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र, जो सामान्य दिनों में सीमित मरीज संभालते थे, अचानक भारी दबाव में आ गए. डॉक्टरों और नर्सों को बिना किसी पूर्व तैयारी के इमरजेंसी मोड में काम करना पड़ा.

दूषित पानी कई दिन बहता रहा

सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि गंदा पानी कई दिनों तक पाइपलाइनों में बहता रहा, लेकिन किसी स्तर पर सप्लाई रोकी नहीं गई. जब तक प्रशासन हरकत में आया, संक्रमण पूरे इलाके में फैल चुका था. लोगों में दहशत फैल गई और अफरा-तफरी में मरीज निजी क्लीनिकों और नर्सिंग होम्स की ओर भागे.

प्राइवेट क्लीनिक बने कमजोर कड़ी

डॉक्टरों के मुताबिक, बड़ी संख्या में मरीज ऐसे निजी क्लीनिकों में पहुंचे जहां गंभीर डिहाइड्रेशन और किडनी फेल्योर जैसे मामलों से निपटने की क्षमता नहीं थी. IV फ्लूड, इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस और मल्टी-स्पेशियलिटी इलाज की जरूरत वाले मरीजों के लिए यह देरी जानलेवा साबित हुई, खासकर बुज़ुर्गों और पहले से बीमार लोगों के लिए.

महिलाओं और बुज़ुर्गों पर सबसे ज्यादा असर

स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि अस्पतालों में भर्ती मरीजों में करीब 95% महिलाएं थीं और उनमें से बड़ी संख्या गंभीर डिहाइड्रेशन और रीनल शटडाउन से जूझ रही थीं. कई मरीजों को ICU में भर्ती करना पड़ा. सबसे कम उम्र का पीड़ित सिर्फ छह महीने का बच्चा था, जिसने सिस्टम की असफलता की भयावह तस्वीर पेश की.

युद्धस्तर पर बचाव की कोशिश

स्थिति बिगड़ने के बाद प्रशासन ने बड़े पैमाने पर डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग शुरू की. 13 हजार से ज्यादा घरों में 66 हजार से अधिक लोगों की जांच की गई. ORS, दवाइयां और एंटीबायोटिक्स वितरित किए गए. स्वास्थ्य कर्मियों, ASHA और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने दिन-रात काम कर हालात को काबू में लाने की कोशिश की.

सबक जो अनदेखा नहीं होना चाहिए

भागीरथपुरा की त्रासदी सिर्फ दूषित पानी की कहानी नहीं है, बल्कि यह चेतावनी है कि स्वच्छता रैंकिंग और वास्तविक बुनियादी ढांचे के बीच गहरी खाई है. अगर शुरुआती चेतावनियों को गंभीरता से लिया जाता, पाइपलाइनों की समय पर जांच होती और स्वास्थ्य तंत्र को अलर्ट किया जाता, तो शायद कई जानें बचाई जा सकती थीं. अब यह संकट सिर्फ बीमारी का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और सिस्टम सुधार की निर्णायक परीक्षा बन चुका है.

प्रशासनिक समन्वय की देरी ने बढ़ाया नुकसान

इस पूरे संकट में एक और बड़ी चूक सामने आई. विभागों के बीच तालमेल की कमी. स्वास्थ्य विभाग, नगर निगम और जल आपूर्ति तंत्र के बीच शुरुआती दिनों में स्पष्ट समन्वय नहीं दिखा. जब तक वरिष्ठ अधिकारियों को स्पष्ट जिम्मेदारियां सौंपी गईं और डेटा-संचालित निगरानी शुरू हुई, तब तक संक्रमण व्यापक रूप ले चुका था. मरीज अलग-अलग अस्पतालों और क्लीनिकों में बिखरे रहे, जिससे सेंट्रलाइज्ड ट्रायेज और समय पर रेफरल में देरी हुई.

स्वच्छ शहर की छवि बनाम ज़मीनी सच्चाई

भागीरथपुरा का मामला इंदौर ही नहीं, बल्कि देश के तमाम “मॉडल शहरों” के लिए चेतावनी है. स्वच्छता सर्वेक्षणों की ट्रॉफियां तब तक अर्थहीन हैं, जब तक सुरक्षित पेयजल, मजबूत ड्रेनेज और जवाबदेह प्रशासन सुनिश्चित न हो. यह घटना बताती है कि अगर बुनियादी सेवाओं की निगरानी सिर्फ रैंकिंग और रिपोर्ट तक सीमित रही, तो अगला संकट किसी और शहर, किसी और मोहल्ले में दोहराया जा सकता है. अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि गलती कहां हुई, सवाल यह है कि क्या सिस्टम इससे सीख लेगा, या अगली त्रासदी का इंतजार करेगा?

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