देखते ही देखते ही धनबाद का ये गांव समा गया पाताल में, 30 दिन में तीसरी घटना, सोते हुए घरों से भागे लोग- देखिए दहशत के VIDEO
धनबाद के टंडाबाड़ी में एक महीने में तीसरी बार जमीन धंसने से 20+ घर जमींदोज हो गए और कई लोग घायल हुए. प्रशासन की चेतावनियों के बावजूद कार्रवाई न होने से 281 परिवार अब भी खतरे के साये में जी रहे हैं.
झारखंड के धनबाद जिले के सोनारडीह ओपी क्षेत्र के टंडाबाड़ी बस्ती में एक बार फिर धरती ने ऐसी करवट ली, जिसने सैकड़ों लोगों की नींद और भरोसा दोनों छीन लिए. बीती रात अचानक आई तेज आवाज के साथ जमीन धंस गई और देखते ही देखते 21 से ज्यादा घर 15 से 20 फीट गहरे गड्ढे में समा गए. लोग समझ ही नहीं पाए कि यह भूकंप है या कोई और आफत और फिर जान बचाने के लिए अंधेरे में ही घरों से बाहर भागते नजर आए.
यह पहली बार नहीं है जब टंडाबाड़ी की जमीन ने अपने ही लोगों को निगला हो. बीते एक महीने में यह तीसरी बड़ी घटना है, जिसने प्रशासन की तैयारियों और सुरक्षा इंतजामों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. इलाके में डर ऐसा है कि हर हल्की आवाज पर लोग सहम जाते हैं, मानो जमीन फिर से फट पड़ेगी.
क्या हुआ उस रात टंडाबाड़ी में?
बीती रात अचानक जोरदार धमाके जैसी आवाज आई और कुछ ही सेकंड में जमीन धंसने लगी. करीब 20 से ज्यादा मकान गहरे गड्ढे में समा गए. उस वक्त अधिकतर लोग अपने घरों में सो रहे थे, लेकिन आवाज सुनते ही किसी तरह बाहर भागकर अपनी जान बचाई. इस हादसे में चार लोग घायल हो गए, जिनमें एक की हालत गंभीर बताई जा रही है.
क्यों बार-बार हो रहा है भू-धंसान?
स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह इलाका लंबे समय से खतरे की जद में है. 31 मार्च को पहली बार हुए भू-धंसान में तीन लोगों की मौत हो गई थी. इसके बाद 22 अप्रैल को दूसरी घटना हुई, लेकिन इसके बावजूद न तो प्रशासन और न ही बीसीसीएल ने कोई ठोस कदम उठाया.
स्थानीय निवासी प्रभुल्ल कुमार साहनी का कहना है कि '31 मार्च को पहली बार भू-धंसान हुआ था, जिसमें तीन लोगों की जान चली गई थी. उस समय सभी को शिफ्ट करने की बात कही गई थी, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ.'
प्रशासन और बीसीसीएल ने क्या कदम उठाए?
घटना के बाद प्रशासन और बीसीसीएल के अधिकारी मौके पर पहुंच गए हैं और राहत कार्य शुरू कर दिया गया है. फिलहाल 27 परिवारों को बेलगड़िया में शिफ्ट किया जा रहा है, जहां उनके लिए फ्लैट उपलब्ध कराए गए हैं.
सीओ गिरजानंद किस्कू ने बताया कि 'तत्काल 27 परिवारों को बेलगड़िया शिफ्ट किया जा रहा है, जहां फ्लैट खाली हैं. इसके बाद जो भी लोग जाना चाहेंगे, उन्हें भी शिफ्ट किया जाएगा.' हालांकि, टंडाबाड़ी में कुल 281 परिवार रहते हैं, जो अब भी खतरे के साये में जी रहे हैं.
क्या पहले चेतावनी के बावजूद अनदेखी हुई?
प्रभावित परिवारों का आरोप है कि पहले से खतरे की जानकारी होने के बावजूद प्रशासन ने समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया. अगर समय पर लोगों को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट कर दिया जाता, तो शायद यह नुकसान टाला जा सकता था.
31 मार्च की घटना के पीड़ितों का क्या हुआ?
टंडाबाड़ी की मिट्टी सिर्फ घर नहीं निगल रही, बल्कि सपने और परिवार भी निगल रही है. 31 मार्च की घटना में मोनू उरांव और उनकी मासूम बेटी गीता कुमारी की मौत हो गई थी. उस हादसे के बाद उनके परिवार को आज तक स्थायी सहारा नहीं मिल पाया.
रिंकी कुमारी, जिसने अपने पिता और बहन को खो दिया, आज भी न्याय और मदद की तलाश में भटक रही है. वह कहती है कि हादसे के बाद हमें भरोसा दिया गया था कि घर मिलेगा, लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ. जब मदद मांगने जाते हैं, तो डांटकर भगा दिया जाता है.'
अब आगे क्या होगा?
प्रशासन का कहना है कि इस पूरे इलाके को खाली कराना जरूरी हो गया है. बीसीसीएल के साथ मिलकर पुनर्वास योजना पर काम किया जा रहा है. कुछ परिवार गांव में ही रहना चाहते हैं, जबकि बाकी को कॉलोनी में बसाने की प्रक्रिया जारी है.
क्या टंडाबाड़ी अब रहने लायक बचा है?
लगातार हो रहे भू-धंसान ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है. हर नई घटना के साथ लोगों का भरोसा कमजोर होता जा रहा है. अब यह सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और अधूरी योजनाओं की कहानी बन चुकी है.




