Republic Day Tableau Preparation: कर्तव्य पथ की चमक के पीछे कितनी मेहनत और कितना खर्च आता है?
गणतंत्र दिवस परेड की झांकियां कैसे बनती हैं? जानिए थीम चयन से लेकर कारीगरों की मेहनत, खर्च, डिजाइन प्रक्रिया और कर्तव्य पथ तक पहुंचने की पूरी कहानी.
26 जनवरी की सुबह जैसे ही कर्तव्य पथ पर झांकी आगे बढ़ती है, दर्शकों को कुछ सेकंड का भव्य दृश्य नजर आता है. लेकिन उस कुछ सेकंड के प्रदर्शन के पीछे महीनों की मेहनत, सैकड़ों हाथों की कारीगरी और अनगिनत बैठकों की कहानी छिपी होती है. हर झांकी सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि एक राज्य की पहचान, इतिहास और सोच को समेटे होती है. यही वजह है कि झांकी बनाना कला, तकनीक और धैर्य का अनोखा संगम बन चुका है.
इंडिया टीवी की रिपोर्ट के अनुसार, झांकी की यात्रा सबसे पहले उसकी थीम से शुरू होती है, और यही सबसे कठिन चरण होता है. उत्तर प्रदेश की इस बार की झांकी के लिए कई विचार सामने रखे गए थे, लेकिन आखिरकार ‘कालिंजर फोर्ट’ की थीम को चुना गया. यह फैसला यूं ही नहीं हुआ, बल्कि एक्सपर्ट कमेटी को कई डिजाइन, स्केच और कॉन्सेप्ट दिखाने के बाद सहमति बनी. थीम फाइनल होते ही टीम मौके पर गई, फोटोग्राफी की और इतिहास को एक चलते-फिरते मंच में ढालने की तैयारी शुरू हुई.
किले को झांकी में उतारना सबसे बड़ी चुनौती
कालिंजर जैसे विशाल और ऐतिहासिक किले को एक सीमित आकार की झांकी में उतारना आसान काम नहीं था. हर म्यूरल, हर स्तंभ और हर नक्काशी को इस तरह चुना गया कि वह दूर से भी अपनी कहानी कह सके. डिजाइन को बार-बार बदला गया, साइड और फ्रंट व्यू पर लंबी चर्चाएं हुईं और करीब छह बैठकों के बाद जाकर एक फाइनल डिजाइन को मंजूरी मिली. यह प्रक्रिया किसी मैराथन से कम नहीं थी.
कारीगरों की दुनिया, जहां कला सांस लेती है
झांकी निर्माण में करीब 100 कारीगर और तकनीशियन जुटे होते हैं. बंगाल के शांति निकेतन से पढ़े BFA और MFA कलाकार मिट्टी और फाइबर में जान डालते हैं, तो कारपेंटर, लोहे के कारीगर, LED और म्यूजिक एक्सपर्ट्स अलग-अलग मोर्चों पर काम करते हैं. हर मूर्ति, हर पिलर और हर डिटेल हाथ से गढ़ी जाती है. सबसे मुश्किल काम तब होता है, जब किसी विशाल मूर्ति में मूवमेंट देना हो, क्योंकि इसमें तकनीक और संतुलन दोनों की परीक्षा होती है.
संगीत और कलाकार: झांकी की आत्मा
झांकी सिर्फ देखने की चीज नहीं होती, वह सुनाई भी देती है. इसके लिए ओरिजिनल म्यूजिक तैयार किया जाता है, जिसमें तबला, डमरू और मंत्रों के संतुलन पर एक्सपर्ट कमेटी की बारीक नजर रहती है. कलाकारों का चयन भी थीम से जुड़ा होता है, ताकि नृत्य, वेशभूषा और भाव सब एक कहानी कहें. कोशिश यही रहती है कि लोकल कलाकारों को मंच मिले, ताकि प्रस्तुति में जमीन से जुड़ाव दिखे.
कहां बनती हैं झांकियां और क्या-क्या लगता है?
दिल्ली के परेड ग्राउंड के पास ‘राष्ट्रीय रंगशाला’ में एक साथ करीब 30 झांकियां बनती हैं. यहां लकड़ी, लोहा, फाइबर और पेंट का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है. कोई भी चीज रेडीमेड नहीं आती, सब कुछ वहीं फैब्रिकेट किया जाता है. ठंड, समय की कमी और सुरक्षा नियमों के बीच काम करना आसान नहीं, लेकिन अब शेड और बेहतर व्यवस्था से हालात पहले से सुधरे हैं.
कितना आता है खर्च?
एक झांकी को तैयार करने में औसतन 50 से 60 लाख रुपये तक खर्च आ जाता है. दिलचस्प बात यह है कि शुरुआती पिचिंग और रिसर्च का खर्च वेंडर खुद उठाता है, और दिसंबर के अंत में जाकर पता चलता है कि झांकी परेड में शामिल होगी या नहीं. जिन राज्यों की झांकियां लगातार पुरस्कार जीतती हैं, वहां वेंडर पर ‘फर्स्ट प्राइज’ लाने का दबाव भी उतना ही ज्यादा होता है.
कुछ सेकंड का दृश्य, लेकिन यादों में हमेशा के लिए
जब 26 जनवरी को झांकी राष्ट्रपति के सामने से गुजरती है, तो उसे सिर्फ दो-तीन सेकंड मिलते हैं अपनी बात कहने के लिए. इसी वजह से अब ‘सिंगल थीम’ और स्पष्ट विजुअल पर जोर दिया जाता है. पर्दे के पीछे काम करने वाले कारीगर भले ही मंच पर नजर न आएं, लेकिन उनकी कला हर दर्शक के मन में जगह बना लेती है. यही झांकी की असली जीत होती है—कुछ पलों में इतिहास, संस्कृति और मेहनत को अमर कर देना.





