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EXCLUSIVE: 77वें गणतंत्र दिवस तक भी “Constitution of India” से “भारत का संविधान” और उससे गांव, ग्रामीण, गांधी-हिंदी इसलिए गायब!

77वें गणतंत्र दिवस पर भी भारत का संविधान अंग्रेजी में “Constitution of India” के रूप में पढ़ा जाता है. पूर्व न्यायाधीश एस एन ढींगरा बताते हैं कि क्यों यह भारत का संविधान नहीं बन सका.

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संजीव चौहान
By: संजीव चौहान

Updated on: 26 Jan 2026 11:38 AM IST

26 जनवरी 2026 को भारत अपना 77वां गणतंत्रत दिवस मनाने में जुटा है. वही भारत जिसने कालांतर में अंग्रेजों की गुलामी की बेड़ियों (British Rule) से खुद को रिहा कराने की खातिर अपनी तब की पीढ़ियां उस दौर के भारतीयों के अरमान और खुशियां सब कुछ ‘होम’ कर दीं.

ऐसे खास मौके पर आजाद भारत की ‘नाक’ कहे जाने वाले “भारत के संविधान” पर बेबाक चर्चा करना बेहद जरूरी है. वही भारत का संविधान जिसे आज अधिकांश मौकापरस्त भारतीय ताकतें अपने-अपने हिसाब और जरूरत के हिसाब से खींचतान कर “जायज-नाजायज” तरीके से इस्तेमाल करने में नहीं हिचक रहे हैं.

77 साल बाद भी “Constitution of India”

आज भारत का वही सर्वोच्च कानून यानी भारत का संविधान जिसे आज 77 साल बाद भी आजाद भारत में “भारत का संविधान” की जगह “Constitution of India” ही कहा बोला और पढ़ा जाता है. आजाद भारत में “भारत का संविधान” आखिर अब भी भारत के राजकीय दफ्तरों- निचली अदालतों से लेकर देश के सर्वोच्च न्यायालय तक में Constitution of India क्यों बोला जाता है.. बेधड़क बेखौफ होकर? 26 जनवरी 1949 को यानी अब से 77 साल पहले अपनाए गए और 26 जनवरी 1950 से लागू “Constitution of India” की जगह 76-77 साल बाद भी आखिर अंग्रेजों की भाषा में दर्ज अंग्रेजों की ही मदद और नकल के रहम-ओ-करम पर तैयार Constitution of India को, आज 7 दशक बाद भी हम आजाद भारत में 77वें गणतंत्र दिवस के सुखद मौके पर भी क्यों “भारत का संविधान” नहीं बोल लिख और पढ़ पा रहे हैं, अपनी मात्र भाषा हिंदी में आजाद हिंदुस्तान में अपने ही भारत के संविधान को.

Constitution of India “भारत का संविधान” क्यों नहीं बन सका?

देश की ओछी या कहिए मतलबपरस्त घटिया राजनीति के नुकीले पालने में Constitution of India और “भारत का संविधान” के बीच झूलते हुए अपना दम घुटवाते ज्वलंत सवालों के जवाब के लिए स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर इनवेस्टीगेशन संजीव चौहान ने, 25 जनवरी 2026 को एक्सक्लूसिव बात की दिल्ली उच्च न्यायालय के रिटायर्ड न्यायाधीश एस एन ढींगरा (Justice SN Dhingra, Delhi High Court) से. संसद पर हमले के मुख्य षडयंत्रकारी आंतकवादी अफजल गुरु को फांसी की सजा मुकर्रर करने वाले और अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहिम के साथ कथित संबंधों के चलते भारत के पूर्व केंद्रीय उर्जा मंत्री कल्पनाथ राय को गिरफ्तार करवाकर पांच साल तिहाड़ जेल में बंद रखने वाले पूर्व न्यायाधीश शिव नारायण ढींगरा ने जो कुछ और जिस बेबाकी से इस इंटरव्यू में बयान किया है, उसे सुनकर आजाद भारत की आज की पीढ़ी के कान खड़े हो जाएंगे. Constitution of India 76-77 साल में “भारत का संविधान” क्यों नहीं बन सका? इस सवाल के बदले जस्टिस एस एन ढींगरा से हासिल जवाब हमारी मौजूदा पीढ़ी को अंदरखाने की कहानी बेहद आसान शब्दों में समझा रहे हैं.

कांग्रेस-मुस्लिम लीग ने ढेर किया

बकौल जस्टिस एस एन ढ़ींगरा, “दरअसल Constitution of India भारत का संविधान तो है ही नहीं. न ही इसमें कहीं भारत मौजूद दिखाई देता है. यह गुलाम भारत के समय के 1935 एक्ट में उलटफेर, जोड़तोड़ और नकल करके किसी दस्तावेज को तैयार करने का सबसे शर्मनाक नमूना है. जब अंग्रेज भारत को छोड़ने के वक्त अपनी मर्जी से भारत का संविधान बनवाने में जुटे थे. तब उस वक्त के कांग्रेसी नेताओं को सत्ता-कुर्सी हड़पने की जल्दी थी. जबकि मुस्लिम लीग अपना अलग ही राग अलाप रही थी. मुस्लिम लीग और तब के कांग्रेसी नेताओं ने अगर देश और देश के संविधान, देश के गांव, ग्रामीण, गांधी, भारतीयों के मौलिक अधिकारों के बारे में जरा भी ईमानदारी से सोच लिया होता तो, 77 साल से भारत के ऊपर भारतीय संविधान के नाम पर थोपा चला आ रहा Constitution of India 77 साल पहले ही भारत का संविधान बन चुका होता.”

आज भी भारत का संविधान नहीं बन सका

Constitution of India और भारत का संविधान के बीच मौजूद गहरी खाई पर स्टेट मिरर हिंदी के एक सवाल के जवाब में दिल्ली उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश शिव नारायण ढींगरा कहते हैं, “शुरूआत में जब कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया बनाने की प्रक्रिया शैशव काल में ही थी. तभी उस वक्त की मौका परस्त और अलग देश की जिद पर अड़ी मुस्लिम लीग ने देश की गरिमा को एक ओर पटक कर जिद पकड़ ली कि उसे तो संविधान में कोई खास जगह ही नहीं मिल रही है. साथ ही तब मुस्लिम लीग अपना अलग देश (आज का पाकिस्तान) लेने की जिद पर भी अड़ गई थी. उधर तब के कांग्रेसी नेता देश और देश के संविधान से ज्यादा सत्ता और सत्ता की कुर्सियों के ऊपर अपनी हकदारी के लिए ज्यादा सिर फोड़ रहे थे. अंग्रेजों ने इस भारतीय बंदरबांट का जाते-जाते भी पूरा पूरा फायदा उठाया. नतीजा सामने है कि कांस्टीट्यूशन ऑफ आज भी भारत का संविधान नहीं बन सका है.”

कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया “भारत का संविधान” कैसे

अपनी बात की पुष्टि में पूर्व जस्टिस एस एन ढींगरा कहते हैं, “अरे भाई जिस देश के संविधान में उसकी सामाजिक संस्कृति, देवता, किसान, गांव भाषा ही शामिल न हो. वह कैसे किसी देश का संविधान हो सकता है. हमारे संविधान में कहां लिखा है हिंदी में कि यह भारत का संविधान है. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आज जैसे ही कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया को हिंदी में बदलकर ‘भारत का संविधान’ किए जाने की कवायद के शुरुआती दौर में ही सबसे पहले दिल्ली (जहां से देश की हुकूमत चलती है) और उसके बाद दक्षिण में विरोध का बिगुल बज जाएगा. अगर 1947 में हमारे कांग्रेसी नेताओं और मुस्लिम लीग ने देश के हित में सोचा होता तो आज हमारे पास भारत का संविधान ही मौजूद होता. न कि हम 77 साल बाद भी कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया को ढोने के लिए मजबूर किए जाते. बेशक भारत को काटकर पाकिस्तान बनवाने में ब्रिटिश हुकूमत की अहम भूमिका रही हो. मगर इसके लिए मुस्लिम लीग और तब के हमारे नेता भी कम जिम्मेदार नहीं है भारत से काटकर पाकिस्तान बनवाने के लिए.”

वकीलों और अदालतों का स्वर्ग

“जिस देश के संविधान से उसके वह सर्वशक्तिमान भगवान ही गायब कर दिए जाएं जिससे समस्त मानवता का जन्म हुआ हो. तब फिर ऐसे संविधान और ऐसे देश की रक्षा भला कौन और कैसे कर सकता है? देख लीजिए आज के भारत का हाल सामने है. नीचे से लेकर ऊपर तक करप्शन, लूटमार मची है. जब कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया बना तभी उस वक्त से समझदार भारतीय चीख चीख कर कह रहे थे कि आने वाले वक्त में यही कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया वकीलों और अदालतों का स्वर्ग होगा. संविधान की भाषा इतनी क्लिष्ठ है कि आम आदमी की समझ से वह कोसों दूर है. भारत के संविधान के नाम पर तैयार कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया अंग्रेजी में है. जोकि हमारी मात्र भाषा हिंदी का स्थान कैसे ले सकती है. जब हमारे संविधान में हमारी भाषा, भारतीयों के भाव का कोई वजन ही नहीं है. तो फिर यह कैसे भारत का संविधान हो सकता है? दरअसल 1947 में मौजूद देश के चंद चुनिंदा वकीलों की बहुतायत की मदद से बनाया गया कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया आजाद भारत में वकीलों और अदालतों के लिए खेलने की चीज था सो आज भी है. यह भारत का संविधान नहीं इंडिया एक्ट 1935 का तोड़ा-मरोड़ा गया कुरुप और उसकी नकल है.”

भारतीय साहित्य-इतिहास से दूर के लोग

एक सवाल के जवाब में पूर्व न्यायाधीश शिव नारायण ढींगरा बोले-“अब से करीब 76-77 साल पहले कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया को बनाने वालों की जमात में शामिल वकीलों में से 90 फीसदी ने तो कभी भारतीय साहित्य भारतीय इतिहास पढ़ा छुआ तक नहीं था. फिर हिंदी के बजाए अंग्रेजी में तैयार कांस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया में भारत और भारत का संविधान कैसे मौजूद या दिखाई दे सकता है. जिस संविधान से हमारे देवता, समाज संस्कृति, खेती-किसान, गरीब, आम आदमी, गांधी हिंदी गायब हो. तो समझिए उस संविधान की तो आत्मा ही मरी हुई है. और जब जिस संविधान की आत्मा मरी हुई हो तो फिर वह कैसे और काहे का भारत का संविधान?”

स्टेट मिरर स्पेशल
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