INSIDE STORY: दिल्ली विधानसभा में जो ‘फांसी-घर’ है ही नहीं उसके ऊपर खर्च 1 करोड़ अब केजरीवाल-सिसोदिया से वसूला जाएगा?
दिल्ली विधानसभा परिसर में कथित ‘फर्जी फांसी-घर’ के नाम पर करीब 1 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का मामला अब राजनीतिक और कानूनी तूफान बन गया है. विशेषाधिकार समिति ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को तलब किया है.
दिल्ली विधानसभा परिसर में ‘फर्जी फांसी-घर’ का शर्मनाक मामला क्या पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया एंड कंपनी के लिए बवाल-ए-जान बनकर ही रहेगा? इस मामले की जांच के लिए गठित विशेषाधिकार समिति की टेढ़ी चाल से तो ऐसा ही लगने लगा है. विशेषकर सोमवार (16 फरवरी 2026) से तो और भी ज्यादा. क्योंकि अब इस मामले में केजरीवाल एंड कंपनी को अपना पक्ष रखने के लिए 6 मार्च 2026 की अंतिम तारीख भी मुकर्रर कर दी गई है.
ऐसे में कुछ सवाल आमजन के जेहन में कौंधना लाजिमी हैं. मसलन, दिल्ली विधानसभा द्वारा इस मामले की जांच के लिए गठित विशेषाधिकार-समिति के द्वारा, अब तय अंतिम तारीख (6 मार्च 2026) को भी अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी (मय पूर्व उप-मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री, पूर्व दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष राम निवास गोयल, पूर्व दिल्ली विधानसभा उपाध्यक्ष राखी बिड़लान) अगर पेश नहीं हुए तो विशेषाधिकार समिति का अगला कदम क्या होगा?
कौन हैं एस के शर्मा?
दूसरा अहम सवाल, मान लो अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगी तथा फर्जी फांसी घर कांड में फंसे लोग निर्धारत तारीख पर विशेषाधिकार समिति के सामने पेश हो भी जाते हैं. तब फिर ऐसे में विशेषाधिकार समिति का अगला कानूनी-संवैधानिक कदम क्या होगा? इन्हीं तमाम सवालों के जवाब के लिए स्टेट मिरर हिंदी के एडिटर क्राइम इनवेस्टीगेशन संजीव चौहान ने एक्सक्लूसिव बात की एस के शर्मा से. एस के शर्मा भारत की लोसकभा में लंबे समय तक सचिव रह चुके हैं. साथ ही उन्हें दिल्ली विधानसभा में लंबे समय तक बहैसियत सचिव-विधानसभा काम करने का अनुभव भी है.
क्या टिफिन रूम को बता दिया फांसी घर?
दिल्ली विधानसभा में चार-चार मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना, शीला दीक्षित, साहिब सिंह वर्मा और शीला दीक्षित के कार्यकाल के अनुभव पर बात करते हुए एस के शर्मा कहते हैं, “दिल्ली विधानसभा परिसर में जिसे अंग्रेजों के जमाने का फांसी-घर बताकर उसकी मरम्मत पर भी सरकारी खजाने की मोटी रकम खर्च कर डाले जाने के मुद्दे पर आज बवाल मचा है. वह फांसी घर तो कभी था ही नहीं. यह बे-सिर-पैर की बातें पता नहीं क्यों और कब अरविंद केजरीवाल की सरकार ने उछाल डालीं. जिस जगह को फांसी घर-फांसी घर का शोर मचाया जा रहा है, वह तो अंग्रेजों के जमाने की लोकसभा परिसर का टिफिन-रूम है. इसके दस्तावेज भी मौजूद हैं.”
ऐतिहासिक दस्तावेजों में क्या निकला?
जिसे अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्रित्वकाल में अंग्रेजों के जमाने का एतिहासिक फांसी घर बताकर उसके रेनेवेशन (जीर्णोद्वार) पर करीब एक करोड़ सरकारी बजट खर्च कर डाले जाने की खबरें मैं मीडिया में देख पढ़ सुन रहा हूं, उसमें मैं दो बार खुद उतरकर झांकने की कोशिश कर चुका हूं. मगर नाकाम रहा हूं. इसके अंदर तो लोहे की सड़ी-गली सीढ़ियों का जीना है. फांसी घर होने की बातें तो 1990 के दशक में भी खूब उड़ी थीं. जब विधानसभा परिसर में निचल स्तर/तबके पर काम करने वाले छोटे कर्मचारियों ने शोर मचाना शुरू कर दिया था कि यह फांसी-घर है. मैंने भी दिल्ली विधानसभा सचिव होने के नाते उन अफवाहों की पुष्टि के लिए खुद उस जगह पर जाकर देखा तो पता चला फांसीघर की बातें-चर्चाएं बकवास हैं. कुछ लोग अक्सर यह भी कहते सुने गए कि यह अंग्रेजों के जमाने की सुरंग है जो दिल्ली विधानसभा से शुरू होकर (पूर्व में भारत की संसद) लाल किला तक जाती है. यह बात भी सरासर झूठ और अफवाह से ज्यादा कुछ नहीं है. मैंने इसकी पुष्टि के लिए अपने स्तर पर भी जब एतिहासिक दस्तावेजों का अध्ययन किया तो भी फांसी घर का जिक्र उनमें भी दूर-दूर तक नहीं मिला. हां, इस जगह पर अंग्रेजों के जमाने का टिफिन-रूम मौजूद होने के दस्तावेज जरूर मौजूद हैं. यह फांसी घर का सुर्रा अरविंद केजरीवाल ने कहां से छोड़ा क्यों छोड़ा? इन सवालों का ही तो उन्हें जवाब देने के लिए अबकी मौजूदा हुकूमत द्वारा गठित विशेषाधिकार समिति ने तलब किया है. अब मनीष सिसौदिया और अरविंद केजरीवाल इसका जवाब दें.
हैरत में हूं कि एक करोड़ खर्च हो गया
भारत की लोसकभा और दिल्ली विधानसभा के पूर्व सचिव एस के शर्मा के मुताबिक, “मेरे तो यह खबरें सुनकर पढ़कर कान खड़े हो गए कि जिस जगह पर फांसी घर होने का कोई एतिहासिक पुख्ता प्रमाण ही नहीं है, उसके जीर्णोद्धार पर एक करोड़ का सरकारी बजट-फंड तक फूंक डाला गया है. यह कैसे हो गया कि फांसी घर जब था ही नहीं तब फिर उसके जीर्णोद्धार पर क्यों कैसे 1 करोड़ फूंक डाला गया? इस सवाल का जवाब भी विशेषाधिकार समिति के सामने इस मामले में चौतरफा फंसे दिखाई दे रहे दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उप-मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया को ही देना है.
अगर आरोपियों ने फांसी-घर न होने की बात स्वीकार कर ली तो?
अगर इस मामले की जांच सही से हो गई, तो इसमें न केवल दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्री फसंगे इसमें उन अधिकारियों की भी गर्दन फंसेगी जिन्होंने सरकारी फंड खर्च करने की अनुमित दी होगी, या जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से भी इस शर्मनाक कांड में शामिल रहे होंगे.” मान लीजिए विशेषाधिकार समिति के समक्ष पेश होकर आरोपियों ने फांसी-घर न होने की बात स्वीकार कर ली. तब आगे उनके खिलाफ क्या संवैधानिक-कानूनी कार्यवाही हो सकती है? पूछे जाने पर दिल्ली विधानसभा के पूर्व सचिव एस के शर्मा बोले, “देखिए विशेषाधिकार समिति के संवैधानिक अधिकार असीमित हैं. अगर आरोपी फांसी घर न होने की बात खुद कबूल लेते हैं तो भी वे खुद को बचा नहीं पाएंगे. क्योंकि तब उनसे पूछा जाएगा कि आपने 1 करोड़ फांसी घर के नाम पर सरकारी फंड फिर खर्च कैसे कर दिया?”
तो क्या केजरीवाल से वसूली होगी?
मान लीजिए यह साबित हो जाए कि जो फांसी घर था ही नहीं उसकी मरम्मत-रख-रखाव पर भी एक करोड़ सरकारी फंड फूंक डाला गया, तब क्या होगा? सवाल के जवाब में दिल्ली विधानसभा के पूर्व सचिव एस के शर्मा बोले, “विशेषाधिकार समिति चाहे तो आरोपियों से उस 1 करोड़ सरकारी फंड की वसूली तक का आदेश पारित कर सकती है. और अगर जो फांसी घर था ही नहीं उसकी मरम्मत रख-रखाव पर एक करोड़ सरकारी फंड फूंके जाने की बात पुष्ट हो चाती है. तो मेरे हिसाब से तो आरोपियों से उस फंड की वसूली भी की जानी चाहिए. अगर ऐसा होता है तो आजाद भारत में किसी राज्य के मुख्यमंत्री उप-मुख्यंत्री, विधानसभा अध्यक्ष और विधानसभा उपाध्यक्ष या इनमें से किसी से भी इतनी बड़ी रकम की वसूली किए जाने का यह अब तक का पहला और सबसे शर्मनाक मामला होगा.”
इस अहम मुद्दे पर पक्ष जानने के लिए विशेषाधिकार समिति के अध्यक्ष और दिल्ली में भाजपा विधायक प्रदुमन राजपूत से भी ‘स्टेट मिरर हिंदी’ ने कई बार उनका पक्ष और आगे की रणनीति क्या होगी? जानने के लिए संपर्क साधा. उनसे मगर खबर लिखे जाने तक उनकी तरफ से कोई जवाब न आने के चलते उनका पक्ष नहीं मिल सका है.





