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कभी दशग्रीव कहलाता था रावण, एक चीख से पड़ गया नया नाम, जानें महादेव से जुड़ी कहानी

रावण को दशग्रीव कहा जाता था. लेकिन अपने अहंकार के चलते जब लंकापति ने कैलाश पर्वत उठाने का साहस दिखाया, तो महादेव ने अपने अंगूठे से पूरे पर्वत को दबा दिया और रावण की चीख निकली, जिससे उसका नाम राव पड़ा.

कभी दशग्रीव कहलाता था रावण, एक चीख से पड़ गया नया नाम, जानें महादेव से जुड़ी कहानी
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हेमा पंत
Edited By:हेमा पंत4 Mins Read

Updated on: 5 Nov 2026 3:15 PM IST

रामायण की कहानी में रावण का नाम आते ही मन में दस सिर वाले उस शक्तिशाली राजा की तस्वीर उभरती है, जिसने माता सीता का हरण किया था. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रावण का नाम पहले से रावण नहीं था? आखिर लंका के इस राजा को यह नाम किसने दिया और इसके पीछे क्या कहानी है?

दरअसल, धार्मिक ग्रंथों में रावण के नाम को लेकर एक बेहद दिलचस्प प्रसंग मिलता है. मान्यता के अनुसार, रावण को यह नाम किसी इंसान या ऋषि ने नहीं, बल्कि स्वयं भगवान शिव ने दिया था. इस नाम के पीछे कैलाश पर्वत, रावण का घमंड और महादेव की एक लीला जुड़ी हुई है.

रावण का असली नाम क्या था?

रामायण के उत्तरकांड में मिलने वाले प्रसंग के अनुसार, रावण का शुरुआती नाम दशग्रीव या दशानन था. दशानन का मतलब होता है दस सिर वाला. रावण लंका का राजा होने के साथ-साथ बहुत बड़ा विद्वान, तपस्वी और शक्तिशाली योद्धा भी था. उसे अपनी ताकत पर बहुत घमंड था. यही घमंड एक दिन उसे भगवान शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत तक ले गया. उस समय शायद रावण को अंदाजा भी नहीं था कि वहां उसका सामना ऐसी शक्ति से होने वाला है, जिसके आगे उसका सारा बल छोटा पड़ जाएगा.

जब रावण ने उठाने की कोशिश की कैलाश पर्वत

कथा के मुताबिक, एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से यात्रा कर रहा था. रास्ते में उसे कैलाश पर्वत दिखाई दिया. यह भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है. जब रावण वहां पहुंचा तो उसकी मुलाकात भगवान शिव के वाहन नंदी से हुई. कहा जाता है कि रावण ने नंदी के रूप का मजाक उड़ाया. नंदी ने उसे आगे बढ़ने से रोका, लेकिन रावण को यह बात पसंद नहीं आई. गुस्से में आकर उसने अपनी ताकत दिखाने का फैसला किया. उसने सोचा कि अगर वह कैलाश पर्वत को ही उठा लेगा तो उसकी शक्ति के सामने कौन टिक पाएगा. इसके बाद उसने अपने विशाल हाथ पर्वत के नीचे लगाए और उसे उठाने लगा.

भगवान शिव ने पैर के अंगूठे से दबा दिया पर्वत

रावण अपनी पूरी ताकत लगा रहा था, लेकिन कैलाश पर्वत अपनी जगह से नहीं हिला. दरअसल, भगवान शिव उस समय पर्वत पर ही विराजमान थे. उन्होंने रावण के इस घमंड को खत्म करने के लिए अपने पैर का अंगूठा हल्का सा दबाया. इसके बाद पूरा पर्वत नीचे की ओर दब गया और रावण की भुजाएं उसके नीचे फंस गईं. लाख कोशिशों के बाद भी वह खुद को छुड़ा नहीं पाया.

दर्द से निकली ऐसी चीख कि तीनों लोक गूंज उठे

कैलाश पर्वत के नीचे फंसे रावण को असहनीय दर्द होने लगा. उसने खुद को छुड़ाने के लिए बहुत कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुआ. आखिरकार उसके मुंह से इतनी तेज चीख निकली कि उसकी आवाज तीनों लोकों तक सुनाई देने लगी. संस्कृत में तेज आवाज या चीख को 'रव' कहा जाता है. इसी आवाज से जुड़कर दशानन का नाम रावण पड़ गया. यानी अपनी ही ताकत दिखाने की कोशिश में निकली चीख ने उसे एक नया नाम दे दिया.

रावण ने भगवान शिव को खुश करने के लिए की स्तुति

कथा के अनुसार, जब रावण को समझ आया कि वह अपनी ताकत से भगवान शिव का सामना नहीं कर सकता, तो उसने अपना घमंड छोड़ दिया. वह महादेव की भक्ति में लीन हो गया और उनकी स्तुति करने लगा. मान्यता है कि इसी दौरान उसने भगवान शिव की महिमा में शिव तांडव स्तोत्र की रचना की. इस स्तोत्र में भगवान शिव के स्वरूप और उनके तांडव का सुंदर वर्णन मिलता है. शिव की भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने आखिरकार रावण को पर्वत के नीचे से मुक्त कर दिया. इतना ही नहीं, धार्मिक कथाओं के एक प्रचलित वर्णन के मुताबिक, भगवान शिव ने उसे चंद्रहास नाम की दिव्य तलवार भी भेंट की.

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