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अहोई अष्टमी में आठ अंक का क्या महत्व, क्यों बनती है 8 कोनों वाली अहोई माता की तस्वीर?

अहोई अष्टमी का व्रत इस बार 1 नवंबर को रखा जाएगा. संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए रखे जाने वाले इस व्रत में 8 अंक का विशेष महत्व है. अहोई माता के चित्र में बने आठ कोष्ठक क्या दर्शाते हैं? इनका आठ दिशाओं, अष्टलक्ष्मी और आठ सिद्धियों से क्या संबंध है? जानिए इस खास परंपरा का धार्मिक महत्व.

अहोई अष्टमी में आठ अंक का क्या महत्व, क्यों बनती है 8 कोनों वाली अहोई माता की तस्वीर?
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( Image Source:  Image Source : Google gemini )

अहोई अष्टमी का त्योहार इस बार 1 नवंबर को मनाया जाएगा लेकिन क्या आपको पता है कि इस त्योहार में 8 अंक का विशेष महत्व है, यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है.'अष्टमी' यानी आठवें दिन का पर्व होने के कारण इसमें 'आठ' अंक का विशेष धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व है.

अहोई माता की तस्वीर या दीवार पर बनाए जाने वाले चित्र में 8 कोष्ठक (खाने या कोने) बनाए जाते हैं, जो अष्टलक्ष्मी, अष्टवसू या प्रकृति के आठ रूपों के प्रति श्रद्धा दर्शाते हैं. इस व्रत को कई क्षेत्रों में 'अहोई आठें' के नाम से भी जाना जाता है, जो इन्हीं आठ कोष्ठकों या अष्टम स्वरूप से जुड़ा है. इस तस्वीर में माता अहोई के साथ सेई (एक कांटेदार जानवर) और उसके बच्चों का चित्र बनाना अनिवार्य माना जाता है. परंपरा के अनुसार तस्वीर में सात पुत्रों और उनकी बहुओं का भी अंकन होता है, जो वंश वृद्धि और संतान के सुखी जीवन का प्रतीक है.

चित्र में बनाए जाने वाले ये आठ कोष्ठक (खाने या बॉक्स) अहोई माता के स्वरूप, उनके परिवार या अष्ट-प्रकृति/अष्ट-रूपों के प्रतीक माने जाते हैं. पारंपरिक रूप से इस चित्र में अहोई माता के साथ-साथ 'सेई' (साही) और उसके बच्चों के चित्र भी बनाए जाते हैं. यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, सुखमय जीवन और स्वास्थ्य के लिए रखती हैं. आठ कोष्ठक वाली यह आकृतियां और उनके पास बने सेई के बच्चे संतान की वृद्धि और परिवार की पूर्णता का संकेत देते हैं.

किसकी ओर संकेट करते हैं 8 कोष्ठक?

ये आठ कोष्ठक ब्रह्मांड की 8 दिशाओं 4 दिशाओं उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम और चारों कोने - ईशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य के लिए होते हैं.जो महिलाएं व्रत करती हैं वो अपने बच्चों के लिए आठों दिशाओं से आने वाले संकटों से रक्षा करतने की प्रार्थना करती हैं. अहोई माता को कई क्षेत्रों में मां लक्ष्मी और मां पार्वती का ही स्वरूप माना जाता है. ये आठ कोष्ठक अष्ट लक्ष्मी धन, धान्य, धैर्य, शौर्य, विद्या, कीर्ति, संतान और विजय और जीवन के आठ प्रकार के ऐश्वर्य व सुखों के प्रतीक हैं.

क्या हैं 8 सिद्धियां?

पारंपरिक अहोई माता की कथा में एक साहूकार की बहू से गलती से साही के बच्चों की मृत्यु हो जाती है, जिसके बाद उसके सात बेटे एक-एक करके मर जाते हैं. बाद में वह पश्चाताप करती है और अहोई अष्टमी का व्रत रखकर साही और उसके बच्चों का चित्र बनाती है. इन आठ कोष्ठकों में से सात कोष्ठक साहूकार की बहू के सात बेटों की दीर्घायु और समृद्धि को दर्शाते हैं. आठवां कोष्ठक साही (स्याऊ माता) और उसके बच्चों के प्रति दया, क्षमा याचना और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है. शास्त्रों में आठ प्रकार की सिद्धियां (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) बताई गई हैं। चित्र के आठ कोने इस बात के प्रतीक हैं कि संतान को जीवन में हर प्रकार की बुद्धि, सिद्धि और सफलता प्राप्त हो.

नोट: यह जानकारी सामान्य मान्यताओं पर आधारित है. स्टेट मिरर हिंदी इसकी पूर्ण सत्यता या प्रमाणिकता का दावा नहीं करता है. किसी भी उपाय या जानकारी को अपनाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें

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