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अहोई अष्टमी की पूजा में क्यों जरूरी हैं स्याहू और उसके बच्चों की तस्वीर, ये है पूरी व्रत कथा

अहोई अष्टमी का व्रत संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाल भविष्य की कामना के लिए रखा जाता है. इस दिन माताएं अहोई माता की पूजा करती हैं और स्याहू माता की कथा सुनती हैं. मान्यता है कि सच्चे मन से व्रत और पूजा करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं. जानिए स्याहू माता की कथा, पूजा सामग्री और विधि.

अहोई अष्टमी की पूजा में क्यों जरूरी हैं स्याहू और उसके बच्चों की तस्वीर, ये है पूरी व्रत कथा
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( Image Source:  Image Source : Google gemini )

अहोई अष्टमी का त्योहार मुख्य रूप से संतान की लंबी आयु,अच्छे स्वास्थ्य,सुख-समृद्धि और उज्जवल भविष्य की कामना के लिए मनाया जाता है. इस दिन माताएं निर्जला या पूरे दिन का व्रत रखती हैं और शाम को तारे निकलने पर या चांद देखकर अपना व्रत खोलती हैं. अहोई माता को पार्वती जी का स्वरूप माना गया है और इस दिन उन्ही की पूजा की जाती है. इस दिन स्याहू माती की कथा पढ़ने का विशेष महत्व है.

इस साल अहोई अष्टमी की तिथि 1 नवंबर 2026 को दोपहर 02:51 बजे से शुरू होगी जबकि 2 नवंबर 2026 को दोपहर 01:10 बजे खत्म होगी. इसके बीच आप पूजा कर सकते हैं. पूजा की शुभ मुहूर्त शाम 05:36 बजे से शाम 06:54 बजे तक है. तारों को देखना का समय शाम 06:00 बजे है और चन्द्रोदय का समय: रात 11:40 बजे है.

पूजा में स्याहू (साही/सेही) और उसके बच्चों की तस्वीर या आकृति बनाना अनिवार्य है,स्याहू (सेही) को बच्चों से बहुत अधिक प्रेम करने वाली माना गया है. उसकी आकृति बनाकर पूजा करने से माता अहोई प्रसन्न होती हैं और व्रती की संतान की रक्षा करती हैं. आइए सुनते है स्याहू माता की कथा.

एक साहुकार था जिसके सात बेटे और सात बहुएं थीं. दिवाली से ठीक पहले कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी को सातों बहुएं अपनी इकलौती ननद के साथ जंगल में मिट्टी खोदने गई थीं,जहां वे मिट्टी खोद रही थीं, वहां 'स्याहू' (सेही) नामक जीव की मांद थी. मिट्टी खोदते समय ननद के हाथ से खुरपी (या कुदाल) की चोट लगकर स्याहू का एक बच्चा मर गया.अपने बच्चे की मृत्यु से क्रोधित होकर स्याहू माता ने ननद से कहा— "जिस तरह तूने मेरा बच्चा मारा है, उसी तरह मैं भी तेरी कोख बांधूंगी (यानी तेरी संतान जीवित नहीं रहेगी).

स्याहू की बात सुनकर ननद ने अपनी सातों भाभियों से विनती की कि वह उसके बदले अपनी कोख बंधवा लें. तब सबसे छोटी भाभी ने ननद के प्रति प्रेम और त्याग दिखाते हुए अपनी कोख बंधवाने की हामी भर ली. इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे होते, वे जन्म के कुछ ही दिनों (सात दिन) के भीतर मर जाते। इस बात से वह बेहद दुखी रहने लगी, परेशान होकर छोटी भाभी ने एक सिद्ध पंडित से सलाह ली.

पंडित ने उसे बताया कि सुरही गाय स्याहू माता की बहन (भएली) है। तुम सुरही गाय की सेवा करो और कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन माता अहोई की शरण लेकर स्याहू तथा उसके बच्चों का चित्र बनाकर उनकी विधि-विधान से पूजा करो और माफी मांगो, छोटी भाभी ने श्रद्धापूर्वक सुरही गाय की सेवा की और कार्तिक अष्टमी का व्रत रखकर स्याहू व उसके बच्चों का चित्र बनाकर सच्ची निष्ठा से पूजा एवं क्षमा-याचना की. उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर स्याहू माता और अहोई माता ने उसे कोख का बंधन मुक्त कर दिया और उसे स्वस्थ व दीर्घायु संतानों का आशीर्वाद मिला.

क्या है पूजा सामग्री?

इसी पौराणिक प्रसंग के बाद से संतान की लंबी उम्र और सुखद भविष्य के लिए माताएं अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं और दीवार पर या कागज पर स्याहू व उसके बच्चों का चित्र बनाकर पूजन करती हैं. पूजा करते समय सबसे पहले अहोई माता का चित्र या कलैंडर दीवार पर लगाएं, पूजा के लिए चौकी और लाल या पीला वस्त्र रखें. रोली, अक्षत (चावल) और हल्दी, पुष्प और फूलों की माला, दीपक, घी और रुई की बत्ती, धूप और अगरबत्ती, दूध और चावल, फल-मिठाई और भोग के लिए 14 पूरी, 8 पुए, हलवा, मूली और सिंघाड़ा लेलें.

कैसे करें पूजा?

इसके बाद सूर्योदय से पहले स्नान करें, साफ वस्त्र पहनें और संतान के कल्याण का संकल्प लेते हुए निर्जला व्रत आरंभ करें. घर के साफ स्थान की दीवार पर गेरू से अहोई माता, उनके सात पुत्रों और स्याहू (सेही) का चित्र बनाएं या बाजार से लाई हुई तस्वीर लगाएं. अहोई माता के चित्र के पास जल से भरा हुआ करवा या कलश स्थापित करें. शाम के समय पूजा के स्थान पर दीया जलाएं और विधि-विधान से मां अहोई का आह्वान करें, अहोई माता को रोली, अक्षत, पुष्प और माला अर्पित करें, माता को दूध-भात (दूध और चावल), पूरी, पुए, हलवा, मूली और सिंघाड़े का भोग लगाएं. हाथ में थोड़े से गेहूं या चावल लेकर अहोई माता की व्रत कथा सुनें या पढ़ें. रात में तारे निकलने का इंतजार करें. तारे दिखने के बाद करवे के जल या शुद्ध जल से तारों को अर्घ्य दें,अर्घ्य देने के बाद घर के बड़ों का आशीर्वाद लें और फिर भोजन या प्रसाद ग्रहण करके अपना व्रत खोलें.

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