अगर आपके बच्चे भी चलाते हैं ज्यादा फोन तो ये बीमारी! दिल्ली-NCR में बढ़ते डिप्रेशन और सुसाइड मामलों पर एक्सपर्ट का क्या कहना
आत्महत्या, डिप्रेशन और अकेलेपन पर मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. पद्मिनी पाणिग्रही ने बताया कि बड़े पद पर काम करने वाले लोग क्यों मानसिक तनाव का शिकार हो सकते हैं और इससे कैसे बचा जा सकता है.
दिल्ली-NCR में हाल के दिनों में आत्महत्या के कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिन्होंने मानसिक स्वास्थ्य, अकेलेपन और बढ़ते तनाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. खास बात यह है कि इनमें कई लोग ऐसे भी रहे, जो प्रतिष्ठित पदों पर कार्यरत थे और पेशेवर रूप से सफल माने जाते थे. ऐसे मामलों के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या आधुनिक जीवनशैली, बढ़ता काम का दबाव और सामाजिक दूरी लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रहे हैं.
आखिर क्यों ऊंचे पदों पर बैठे लोग भी भीतर से अकेलापन महसूस करने लगते हैं और इससे कैसे बचा जा सकता है? इन्हीं सवालों पर स्टेट मिरर ने मेंटल हेल्थ कोच, मेडिटेशन कोच और मोटिवेशनल स्पीकर डॉ. पद्मिनी पाणिग्रही से खास बातचीत की है.
आत्महत्या के पीछे हर बार एक ही वजह नहीं
मेंटल हेल्थ कोच, मेडिटेशन कोच और मोटिवेशनल स्पीकर डॉ. पद्मिनी पाणिग्रही का कहना है कि आत्महत्या के हर मामले के पीछे अलग-अलग परिस्थितियां और कई कारण हो सकते हैं. हालांकि, उनके अनुभव के अनुसार उच्च पदों पर काम करने वाले कई लोग समय के साथ सामाजिक और व्यक्तिगत रिश्तों से दूर हो जाते हैं, जिससे वे अकेलेपन (लोनलीनेस) का अनुभव करने लगते हैं.
ऊंचे पद के साथ बढ़ सकता है सामाजिक अलगाव
डॉ. पद्मिनी के मुताबिक, किसी भी बड़े पद पर पहुंचने के बाद व्यक्ति अक्सर अपनी पुरानी मित्र मंडली और सामान्य सामाजिक जीवन से कट जाता है. सामाजिक छवि और पेशेगत जिम्मेदारियों के कारण कई लोग अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते. यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो मानसिक तनाव बढ़ सकता है और व्यक्ति डिप्रेशन जैसी समस्याओं का सामना कर सकता है.
परिवार और दोस्तों से जुड़े रहना मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी
उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी है कि व्यक्ति अपने परिवार, दोस्तों और भरोसेमंद लोगों के संपर्क में रहे. अपने मन की बात साझा करना, रिश्तों को समय देना और सामाजिक रूप से जुड़े रहना मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाने में मददगार हो सकता है. डॉ. पद्मिनी का मानना है कि संयुक्त परिवार (जॉइंट फैमिली) की व्यवस्था कई बार मानसिक स्वास्थ्य के लिए सकारात्मक भूमिका निभाती है. परिवार के सदस्य यदि किसी व्यक्ति के व्यवहार में अचानक बदलाव, अत्यधिक चुप्पी, चिड़चिड़ापन या उदासी जैसे संकेत देखें तो समय रहते उससे बातचीत कर सकते हैं और उसे भावनात्मक सहयोग दे सकते हैं.
उन्होंने महानगरों में काम करने वाले युवाओं को भी सलाह दी कि वे अपने परिवार, दोस्तों और आसपास के लोगों से जुड़े रहें. नई जगह पर रहने के दौरान अकेलापन महसूस होने पर अपनी भावनाओं को साझा करना और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहद जरूरी है.
लंबे समय तक बच्चों को मोबाइल करने से क्या होता है?
डॉ. पद्मिनी ने बच्चों में बढ़ते स्मार्टफोन इस्तेमाल पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि लंबे समय तक मोबाइल स्क्रीन पर स्क्रॉल करते रहने से बच्चों के मानसिक और बौद्धिक विकास पर असर पड़ सकता है. उनका कहना है कि बच्चे प्रकृति, खेलकूद और सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से बेहतर सीखते और विकसित होते हैं. ऐसे में अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित रखें और उन्हें बाहर खेलने तथा प्रकृति के बीच समय बिताने के लिए प्रोत्साहित करें.
डिप्रेशन वाले लोगों के साथ कैसा करें व्यवहार?
डॉ. पद्मिनी का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को लगातार उदासी, तनाव, अकेलापन या डिप्रेशन जैसे लक्षण महसूस हों तो उसे खुद को अकेला नहीं करना चाहिए. परिवार, दोस्तों या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से खुलकर बात करनी चाहिए. यदि समस्या लंबे समय तक बनी रहे या गंभीर लगे तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना सबसे बेहतर कदम है.




