Friendship Day: क्या आपके साथ भी हुआ ऐसा, अब कितनी होती है दोस्तों से मुलाकात, Dil Chahta hai का ये सीन वायरल
साल 2001 में रिलीज हुई 'दिल चाहता है' तीन पक्के दोस्तों आकाश, समीर और सिद्धार्थ की कहानी है. समय के साथ तीनों की जिंदगी अलग-अलग रास्तों पर चल पड़ती है. इसी वजह से तीनों दोस्तों के बीच दूरियां आने लगती हैं.
हर साल अगस्त के पहले रविवार में फ्रेंडशिप डे मनाया जाता है. कहते हैं, जिंदगी में रिश्ते बहुत बनते हैं, लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें न खून का रिश्ता चाहिए, न कोई वादा. दोस्ती भी ऐसा ही रिश्ता है. यह वक्त के साथ पुरानी जरूर हो जाती है, लेकिन कभी कमजोर नहीं पड़ती. बस अफसोस इतना होता है कि जिन दोस्तों के साथ कभी हर शाम गुजरती थी, आज उनसे मिलने के लिए कैलेंडर देखना पड़ता है.
शायद इसलिए साल 2001 में आई फिल्म 'दिल चाहता है' का वह सीन जिसमें अक्षय खन्ना कहते हैं कि दस साल में एक बार मिलना मुश्किल हो जाए, आज भी लोगों को रूला देता है. यह सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि दोस्ती की सबसे खूबसूरत कहानियों में से एक थी.
क्या है दिल चाहता का वायरल सीन?
इस सीन में गोवा के समुद्र किनारे तीन दोस्त आकाश, समीर और सिद्धार्थ बैठे होते हैं. आकाश कहता है कि हर साल हम यहीं मिलेंगे. सब कुछ हमेशा ऐसा ही रहेगा. तभी सिद्धार्थ समुद्र में दूर जाते एक जहाज को देखता है और कहता है "देखो, कुछ देर बाद यह जहाज दिखाई नहीं देगा. शायद हम भी इसी जहाज की तरह हैं. आज नहीं तो कल अपनी-अपनी मंजिलों की तरफ निकल जाएंगे. हो सकता है, हमारी राहें अलग हो जाएं. लेकिन सिद्धार्थ की अगली बात शायद हर बड़े होते इंसान की सच्चाई है.
जब मिलना हो जाएगा मुश्किल
सिद्धार्थ कहता है "दोस्त तो रहेंगे... लेकिन हो सकता है दस साल में एक बार भी मिलना मुश्किल हो जाए." उस वक्त यह सिर्फ एक डायलॉग लगता है. लेकिन कुछ साल बाद जब स्कूल के दोस्त अलग हो जाते हैं. कॉलेज की ग्रुप फोटो सिर्फ मोबाइल गैलरी में रह जाती है और "चल मिलते हैं" वाला मैसेज महीनों तक अधूरा रह जाता है, तब समझ आता है कि सिद्धार्थ गलत नहीं था.
बड़े होने की सबसे बड़ी कीमत
बचपन में दोस्त घर बुलाने के लिए दरवाजा खटखटाते थे. आज मिलने के लिए पहले व्हाट्सऐप पर पूछा जाता है. "भाई, इस महीने फ्री है क्या?" पहले हर खुशी साथ मनती थी. आज दोस्त की शादी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर देखकर ही खुश होना पड़ता है. पहले बिना वजह मिलने के बहाने ढूंढ़े जाते थे. अब मिलने के लिए वजह ढूंढ़नी पड़ती है. यही शायद बड़े होने की सबसे बड़ी कीमत है.
जब सपने और जिम्मेदारियां थाम लेती हैं दामन
फिल्म की यह बातचीत सिर्फ एक डायलॉग नहीं, बल्कि जिंदगी की सच्चाई है. पढ़ाई पूरी होने के बाद किसी को नौकरी मिल जाती है, कोई दूसरे शहर या देश चला जाता है, कोई अपने परिवार की जिम्मेदारियों में बिजी हो जाता है. धीरे-धीरे मिलने का समय कम होने लगता है. पहले जहां बिना वजह घंटों साथ बैठना होता था, अब मिलने के लिए तारीख तय करनी पड़ती है. कई बार ऐसा भी होता है कि सबसे अच्छे दोस्त से महीनों बात नहीं होती. लेकिन जब अचानक फोन आता है या मुलाकात होती है, तो ऐसा लगता है जैसे समय कभी बदला ही नहीं. यही दोस्ती की सबसे बड़ी खूबसूरती है.
न मिलना दोस्ती खत्म होना नहीं है
बस यादों की उम्र आज भी वहीं ठहरी है." दोस्ती की खूबसूरती यही है कि उसे रोज साबित नहीं करना पड़ता सच्ची दोस्ती की सबसे बड़ी पहचान यही है कि उसमें शिकायतें कम और अपनापन ज्यादा होता है. हो सकता है महीनों बात न हो. हो सकता है सालों मुलाकात न हो. लेकिन एक फोन आते ही बातचीत वहीं से शुरू होती है, जहां पिछली बार खत्म हुई थी. न कोई फॉर्मैलिटी... न कोई हिसाब... न कोई गिला. यही दोस्ती है. दोस्त वह नहीं जो हर दिन साथ बैठे. दोस्त वह है, जो मुश्किल वक्त में बिना बुलाए आपके दरवाजे पर खड़ा मिले.




