FAQ: रूस में Pneumonic Plague से महिला की मौत, कैसे फैलती है बीमारी, क्या है इलाज और भारत में कब आया था प्रकोप?
रूस में एक लैब टेक्नीशियन की मौत के बाद Pneumonic Plague एक बार फिर चर्चा में है. यह Yersinia pestis बैक्टीरिया से होने वाला संक्रमण है, जो सीधे फेफड़ों को प्रभावित करता है.
रूस के साइबेरिया में एक लैब टेक्नीशियन की मौत के बाद Pneumonic Plague को लेकर चिंता बढ़ गई है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इरकुत्स्क के एंटी-प्लेग इंस्टीट्यूट में काम करने वाली 28 साल की दार्या शिपिलोवा की तबीयत अचानक खराब हुई और निमोनिया जैसे गंभीर लक्षणों के बाद उनकी मौत हो गई. बताया गया कि लैब में काम करते समय एक टेस्ट ट्यूब टूट गई थी और महिला के संक्रमित बैक्टीरिया के संपर्क में आने की आशंका जताई गई. हालांकि, उनकी मौत Pneumonic Plague से ही हुई थी, इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है. घटना के बाद उनके कॉन्टैक्ट में आए करीब 200 लोगों को निगरानी में रखा गया.
इस घटना के बाद एक बार फिर Pneumonic Plague चर्चा में आ गया है. यह Yersinia pestis नाम के बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है, जो फेफड़ों को इंफेक्ट करती है. संक्रमित व्यक्ति की खांसी या सांस से निकले पार्टिकल्स के जरिए यह दूसरे लोगों तक भी पहुंच सकती है. भारत में भी इसका प्रकोप सामने आ चुका है. साल 2002 में हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के हटकोटी गांव में Pneumonic Plague के 16 मामले मिले थे, जिनमें 4 लोगों की मौत हुई थी. जांच में इन मरीजों में Yersinia pestis बैक्टीरिया की मौजूदगी की पुष्टि हुई थी.
प्लेग तीन तरह का होता है- ब्यूबोनिक, सेप्टीसीमिक और न्यूमोनिक. Pneumonic Plague तब होता है, जब Yersinia pestis बैक्टीरिया फेफड़ों में संक्रमण कर देता है और खांसने या सांस के जरिए यह दूसरों तक भी फैल सकता है.
प्लेग संक्रमित पिस्सू के काटने या बीमार जानवर के संपर्क में आने से फैल सकता है. वहीं Pneumonic Plague में संक्रमित व्यक्ति की खांसी और सांस से निकले कणों के जरिए भी करीबी लोगों तक संक्रमण पहुंच सकता है.
इस बीमारी के लक्षण तेजी से दिख सकते हैं. तेज बुखार, सिरदर्द, कमजोरी, सांस लेने में दिक्कत, सीने में दर्द और खांसी इसके आम लक्षण हैं, जबकि कुछ मामलों में खांसी के साथ खून वाला बलगम भी आ सकता है.
Pneumonic Plague को गंभीर बीमारी माना जाता है क्योंकि इलाज में देरी होने पर मरीज की हालत तेजी से बिगड़ सकती है. समय पर इलाज न मिलने पर यह जानलेवा भी हो सकता है, इसलिए शुरुआत में ही इलाज शुरू करना बेहद जरूरी है.
प्लेग बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है, इसलिए इसका इलाज एंटीबायोटिक दवाओं से किया जाता है. कौन-सी दवा और कितनी मात्रा देनी है, यह डॉक्टर तय करते हैं और समय पर इलाज शुरू होने से मरीज के ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है.
Pneumonic Plague का शक होने पर मरीज को दूसरों से अलग रखना जरूरी हो सकता है, ताकि संक्रमण आगे न फैले. उसके कॉन्टैक्ट में आए लोगों की पहचान कर उनकी सेहत पर भी नजर रखी जाती है.
भारत में प्लेग का बड़ा प्रकोप 1994 में गुजरात के सूरत में सामने आया था, जिसके बाद देशभर में डर का माहौल बन गया था. इसके बाद 2002 में हिमाचल के हटकोटी में Pneumonic Plague के 16 मामले मिले, जिनमें 4 लोगों की मौत हुई थी.
हां, प्लेग गंभीर बीमारी है, लेकिन आज इसके इलाज के लिए असरदार एंटीबायोटिक दवाएं मौजूद हैं. बीमारी की जल्दी पहचान, समय पर इलाज, मरीज को अलग रखना और उसके संपर्क में आए लोगों पर नजर रखना संक्रमण को फैलने से रोकने में मदद करता है.




