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पुराने महिला आरक्षण बिल पर विवाद क्यों, नए में क्या है खास? FAQ से समझें पूरी ABCD

केंद्र सरकार गुरुवार 16 अप्रैल को संसद में महिला आरक्षण से संबंधित संविधान संसोधन विधेयक पेश करने वाली है. लंबे समय से महिला आरक्षण बिल को लेकर बहस देखने को मिली है.

Women Reservation Bill
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Women Reservation Bill

( Image Source:  AI: Sora )
विशाल पुंडीर
Edited By: विशाल पुंडीर4 Mins Read

Updated on: 16 April 2026 8:23 AM IST

Women Reservation Bill: भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की मांग दशकों से उठती रही है. देश की आधी आबादी होने के बावजूद संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या अब तक बेहद सीमित रहा है. इसी असंतुलन को दूर करने के उद्देश्य से महिला आरक्षण का मुद्दा बार-बार राष्ट्रीय बहस का केंद्र बनता रहा है.

अब ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के रूप में इस दिशा में एक नई उम्मीद जगी है. यह प्रस्ताव महिलाओं को राजनीति में मजबूत उपस्थिति देने का दावा करता है, लेकिन इसके लागू होने की प्रक्रिया और समय-सीमा को लेकर कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं.

सवाल: पहली बार कब हुआ पेश?

जवाब: महिला आरक्षण विधेयक पहली बार 1996 में पेश किया गया था, जिसे 81वां संविधान संशोधन विधेयक कहा गया. इस बिल में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव रखा गया था. उस समय केंद्र में संयुक्त मोर्चा सरकार थी. इसके बाद यह बिल कई बार संसद में पेश हुआ, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से पारित नहीं हो सका. साल 2010 में यह राज्यसभा से पास जरूर हुआ, लेकिन लोकसभा में मंजूरी नहीं मिल पाई और मामला अधर में लटक गया.

सवाल: पुराने बिल पर क्यों हुआ विरोध?

जवाब: महिला आरक्षण बिल को लेकर कई राजनीतिक दलों के बीच मतभेद देखने को मिले. कुछ दलों का कहना था कि इसमें पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान नहीं है, जिससे इसका लाभ सीमित वर्ग तक ही रह जाएगा. इसके अलावा, कुछ नेताओं ने यह भी तर्क दिया कि राजनीतिक दलों को खुद ही महिलाओं को अधिक टिकट देना चाहिए, इसके लिए कानून बनाने की जरूरत नहीं है. सीटों के रोटेशन को लेकर भी विरोध हुआ, क्योंकि इससे नेताओं का अपने क्षेत्र से जुड़ाव प्रभावित होने की आशंका जताई गई.

सवाल: कहां लागू है बिल?

जवाब: भारत में पंचायत और नगर निकाय स्तर पर पहले से ही महिला आरक्षण लागू है. 73वें और 74वें संविधान संशोधन के तहत एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गई थीं. कई राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया है. इस पहल के सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं. लाखों महिलाओं ने स्थानीय राजनीति में भागीदारी निभाई और शिक्षा, स्वच्छता व स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर प्रभावी काम किया. इसी अनुभव के आधार पर संसद और विधानसभाओं में भी आरक्षण की मांग मजबूत हुई.

सवाल: क्या है नए बिल की प्रमुख बातें?

जवाब: नारी शक्ति वंदन अधिनियम में भी 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा गया है. यह लोकसभा और राज्य विधानसभाओं दोनों में लागू होगा. इसके तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं को भी आरक्षण का लाभ मिलेगा. इस आरक्षण की अवधि 15 साल तय की गई है, जिसे आवश्यकता पड़ने पर आगे बढ़ाया जा सकता है.

सवाल: क्यों छिड़ा बिल की देरी पर विवाद?

जवाब: पुराने और नए बिल के बीच सबसे बड़ा अंतर इसके लागू होने के तरीके में है। नया कानून तुरंत लागू नहीं होगा. इसके लिए पहले देश में जनगणना कराई जाएगी और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया पूरी की जाएगी. परिसीमन के तहत लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों का पुनर्निर्धारण होगा, जिससे सीटों की संख्या भी बढ़ सकती है. इन दोनों प्रक्रियाओं के बाद ही आरक्षण लागू किया जाएगा. यही देरी इस बिल की आलोचना का एक बड़ा कारण भी बन रही है.

सवाल: क्यों अहम है ये बिल?

जवाब: इस विधेयक को महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है. वर्तमान में लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 14 प्रतिशत है, जो इस कानून के लागू होने के बाद बढ़कर 33 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. रिपोर्ट्स की माने तो महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से नीति निर्माण में सामाजिक मुद्दों को अधिक प्राथमिकता मिलेगी, जिससे आम लोगों को सीधे तौर पर फायदा होगा.

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