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Delimitation Row : कैसे होगा परिसीमन, UP में होंगी 120 लोकसभा सीटें तो तमिलनाडु में 59, विवाद की जड़ क्या?

2026 के बाद परिसीमन से लोकसभा सीटों का नया बंटवारा होगा. UP में 120 तक सीटें बढ़ सकती हैं, जबकि तमिलनाडु की हिस्सेदारी घटने की आशंका है, जिससे उत्तर-दक्षिण के बीच नया राजनीतिक विवाद उभर रहा है.

Delimitation Row : कैसे होगा परिसीमन, UP में होंगी 120 लोकसभा सीटें तो तमिलनाडु में 59, विवाद की जड़ क्या?
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( Image Source:  Sora AI )

भारत में लोकसभा सीटों का परिसीमन (Delimitation) एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसका मकसद जनसंख्या के आधार पर संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों की संख्या को संतुलित करना होता है. यह काम डिलिमिटेशन कमिशन आफ इंडिया करती है, जिसे संसद के कानून के तहत गठित किया जाता है. परिसीमन का मूल आधार जनगणना है, लेकिन अभी तक 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों का बंटवारा स्थिर रखा गया है, जिसे 2026 तक के लिए फ्रीज किया गया है.

1. परिसीमन क्या है और यह कैसे काम करता है?

परिसीमन का मतलब है लोकसभा और विधानसभा के चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों की संख्या का नए सिरे से तय करना है. संविधान के अनुच्छेद 82 और आर्टिकल 170 के अनुसार, हर जनगणना के बाद यह प्रक्रिया होनी चाहिए. इसमें देश की कुल आबादी को लोकसभा की कुल सीटों से विभाजित कर एक औसत प्रतिनिधित्व तय किया जाता है, फिर उसी अनुपात में राज्यों को सीटें दी जाती हैं. इस प्रक्रिया का मकसद है कि हर सांसद लगभग समान संख्या के नागरिकों का प्रतिनिधित्व करे.

2. 2026 के बाद परिसीमन क्यों?

साल 1976 में संवैधानिक संशोधन के जरिए परिसीमन को रोक दिया गया था. ताकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को नुकसान न हो. बाद में इस रोक को 2026 तक बढ़ा दिया गया. अब 2026 के बाद पहली बार नई जनगणना के आधार पर परिसीमन होने की संभावना है. इसका मतलब है कि करीब 50 साल बाद सीटों का असली पुनर्वितरण होगा, जिससे देश की राजनीतिक संरचना में बड़ा बदलाव आ सकता है.

3. UP में 120 और तमिलनाडु में 59 सीटों की चर्चा क्यों?

अभी तक के अनुमानों के अनुसार अगर नई जनसंख्या के आधार पर सीटों का बंटवारा होता है, तो उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 110 से 120 तक पहुंच सकती हैं. वहीं बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों को भी बड़ा फायदा हो सकता है. दूसरी ओर तमिल नाडु की सीटें 39 से बढ़कर 50–59 तक जा सकती हैं, लेकिन कुल हिस्सेदारी घटेगी. यही वजह है कि इन आंकड़ों को लेकर बहस तेज है, क्योंकि यह सिर्फ संख्या नहीं बल्कि राजनीतिक प्रभाव का सवाल है.

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4. Delimitation के बाद किस राज्य में कितनी सीटें हो सकती हैं?

अगर लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़ाकर 750 से 800 के आसपास की जाती हैं, तो लगभग सभी राज्यों की सीटें बढ़ेंगी, लेकिन अनुपात अलग होगा. यूपी में 110 से 120, बिहार में 60 से 70, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल 70 से 80 के बीच पहुंच सकते हैं. वहीं, तमिलनाडु 50 से 59, केरला में 20 से 25 और आंध्र प्रदेश में सीमित बढ़ोतरी मिल सकती है. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि संख्या बढ़ने के बावजूद दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी घट सकती है.

दरअसल, परिसीमन (Delimitation) सिर्फ सीटों का गणित नहीं, बल्कि भारत की संघीय राजनीति का बड़ा मुद्दा है. यह तय करेगा कि संसद में किस राज्य की आवाज कितनी मजबूत होगी. 2026 के बाद होने वाला परिसीमन देश की राजनीतिक दिशा और शक्ति संतुलन को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है, इसलिए इसे लेकर बहस और संवेदनशीलता दोनों लगातार बढ़ रही हैं.

5. विवाद की जड़ क्या है?

परिसीमन विवाद की जड़ पिछले 50 वर्षों में जनसंख्या वृद्धि के असंतुलन में छिपी है. दक्षिणी राज्यों केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ने परिवार नियोजन को सफलतापूर्वक लागू कर जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित की. जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी. यदि लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण पूरी तरह जनसंख्या के आधार पर होता है, तो दक्षिणी राज्यों की सीटें घट सकती हैं, जिससे उनकी राजनीतिक ताकत कम होगी. वहीं “एक व्यक्ति-एक वोट” सिद्धांत लागू करने से उत्तर भारत का प्रभाव बढ़ेगा, जिससे उत्तर-दक्षिण संतुलन और प्रतिनिधित्व पर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है.

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