सोमनाथ जाने से पहले पूर्व राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को क्यों रोक रहे थे नेहरू? पीएम मोदी ने याद दिलाया वो दौर
सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और उद्घाटन को लेकर एक कहानी जो आज भी चर्चा में है, उसे पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने ब्लॉग में सामने रखा है. मोदी ने बताया कि स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस आयोजन को लेकर सहज नहीं थे और वे पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ जाने से रोकना चाहते थे.
सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले आक्रमण को इस साल पूरे एक हजार साल हो गए हैं. इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ब्लॉग ने इतिहास के साथ-साथ राजनीति की पुरानी बहस को भी एक बार फिर सामने ला दिया है. पीएम मोदी ने जहां सोमनाथ मंदिर को भारतीय आस्था, आत्मबल और पुनर्जागरण का प्रतीक बताया.
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वहीं, आज़ादी के बाद मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर तत्कालीन सत्ता के भीतर मौजूद मतभेदों की ओर भी इशारा किया. खास तौर पर उनका यह दावा कि देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को जवाहर लाल नेहरू द्वारा सोमनाथ उद्घाटन में जाने से रोकने की कोशिश हुई थी.
सोमनाथ: आस्था, इतिहास और संघर्ष का प्रतीक
गुजरात के सागर किनारे बना सोमनाथ मंदिर हिंदुओं के सबसे पवित्र बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान पर माना जाता है. इतिहास बताता है कि वर्ष 1026 में महमूद गजनी ने इस मंदिर पर आक्रमण किया था. इसके बाद अलग-अलग दौर में इसे कई बार तोड़ा गया, लेकिन हर विनाश के बाद यह फिर से खड़ा हुआ. इसी वजह से सोमनाथ सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की अटूट आस्था, साहस और निरंतर आगे बढ़ते रहने की शक्ति का प्रतीक बन गया है.
आज़ादी के बाद पुनर्निर्माण और सरदार पटेल की भूमिका
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ब्लॉग में लिखा कि भारत की आज़ादी के बाद सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करने की जिम्मेदारी सरदार वल्लभभाई पटेल के कंधों पर आई. 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया. उसी समय उन्होंने फैसला लिया कि यह मंदिर फिर से बनाया जाएगा. यह कदम सिर्फ धार्मिक उद्देश्य के लिए नहीं था, बल्कि भारतीय संस्कृति और आत्मसम्मान को मजबूत करने वाला भी था. आखिरकार 11 मई 1951 को नया सोमनाथ मंदिर श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया.
नेहरू बनाम राजेंद्र प्रसाद: सत्ता के भीतर टकराव
पीएम मोदी ने जिस राजनीतिक पहलू को उजागर किया, वह यहीं से शुरू होता है. उनके अनुसार, उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस सोमनाथ समारोह को लेकर सहज नहीं थे. वे नहीं चाहते थे कि राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद इस आयोजन में औपचारिक रूप से शामिल हों. नेहरू का कहना था कि इससे नव स्वतंत्र भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को दुनिया के सामने नुकसान हो सकता है. इसके विपरीत, राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने फैसले पर अडिग रहे. उन्होंने उद्घाटन समारोह में हिस्सा लिया और साफ संदेश दिया कि भारत की संस्कृति और आस्था को अलग या नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यह घटना सत्ता के उच्चतम स्तर पर विचारों और नीतियों में मतभेद का बड़ा उदाहरण बन गई.
के.एम. मुंशी और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
सोमनाथ मंदिर के दोबारा निर्माण की बात के.एम. मुंशी का जिक्र किए बिना पूरी नहीं मानी जा सकती. उन्होंने इस काम में सरदार वल्लभभाई पटेल का मजबूती से साथ दिया और पूरे अभियान को वैचारिक दिशा दी. मुंशी ने अपनी किताब ‘सोमनाथ: द श्राइन इटरनल’ में साफ लिखा कि सोमनाथ सिर्फ पत्थरों से बना ढांचा नहीं है, बल्कि यह सदियों से जीवित आस्था और चेतना का प्रतीक है. यही सोच आगे चलकर राजनीति में सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रवाद से जुड़े विचारों की मजबूत नींव बनी.
पीएम मोदी का संदेश
अपने ब्लॉग में पीएम मोदी ने अतीत और वर्तमान को जोड़ते हुए कहा कि आक्रमणकारी इतिहास के पन्नों में सिमट गए हैं, जबकि सोमनाथ आज भी खड़ा है. उनके शब्दों में यह संदेश भी छिपा है कि आस्था और संस्कृति को दबाने की कोशिशें अस्थायी होती हैं. राजनीतिक तौर पर यह बयान कांग्रेस और नेहरू युग की नीतियों पर अप्रत्यक्ष सवाल खड़े करता है, वहीं सरदार पटेल की विरासत को मजबूत रूप में सामने रखता है. सोमनाथ का मुद्दा एक बार फिर इतिहास, आस्था और राजनीति के संगम के रूप में राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है.





