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Exclusive: JNU में उमर खालिद की किताब पर घमासान! पिता बोले- ‘जितना दबाएंगे, उतना बिकेगी’...बताई बुक के पीछे की पूरी कहानी

JNU में उमर खालिद की किताब ‘Fractured Communities’ को लेकर विवाद के बीच उनके पिता सैयद कासिम रसूल ने इंटरव्यू में कई अहम बातें कहीं. उन्होंने किताब, JNU कार्यक्रम पर रोक, उमर खालिद की लंबी जेल, जमानत और 900 गवाहों व 3,000 पन्नों की चार्जशीट को लेकर अपनी बात रखी.

Exclusive: JNU में उमर खालिद की किताब पर घमासान! पिता बोले- ‘जितना दबाएंगे, उतना बिकेगी’...बताई बुक के पीछे की पूरी कहानी
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समी सिद्दीकी
By: समी सिद्दीकी10 Mins Read

Updated on: 11 Aug 2026 12:39 PM IST

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी JNU में उमर खालिद की किताब पर लगातार विवाद जारी है. अब इस मामले में उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल ने स्टेट मिरर से बातचीत में खुलकर बात की है. दरअसल, दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में सोमवार को स्कॉलर उमर खालिद की किताब ‘Fractured Communities: Adivasi History and Politics of Power’ पर चर्चा को लेकर माहौल गरमा गया था. कार्यक्रम के दौरान छात्रों के बीच जमकर नारेबाजी हुई और विरोध-समर्थन के चलते टकराव की स्थिति बन गईय बताया गया कि कार्यक्रम के लिए तय जगह की बुकिंग विश्वविद्यालय प्रशासन ने शुरू होने से कुछ समय पहले ही रद्द कर दी थी.

आरोप लग रहे हैं कि ये किताब बांटने का काम कर रही है. हालांकि इस मसले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. इंटरव्यू में खालिद के पिता ने किताब को लेकर JNU प्रशासन के फैसले पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि जिस किताब को पढ़ने के कार्यक्रम पर रोक लगाई गई, वह उमर खालिद की पीएचडी थीसिस पर आधारित है, जिसे उन्होंने JNU में ही जमा किया था और जिसके आधार पर उन्हें पीएचडी की डिग्री मिली थी.

क्या जेल में रहकर लिखी उमर खालिद ने किताब?

सैयद कासिम रसूल ने दावा किया कि किताब जेल में रहते हुए नहीं लिखी गई थी. उनके मुताबिक, उमर खालिद के जेल जाने से पहले ही उनकी पीएचडी थीसिस जमा हो चुकी थी और बाद में उसी रिसर्च पर आधारित किताब प्रकाशित हुई. उन्होंने कहा कि किताब के अब तक तीन संस्करण आ चुके हैं और चौथा संस्करण भी आने वाला है. उनके अनुसार, कार्यक्रम रोकने की कोशिशों से किताब की लोकप्रियता कम होने के बजाय और बढ़ रही है.

किस किताब को लेकर है विवाद?

इंटरव्यू में सैयद कासिम रसूल ने किताब का नाम “Fractured Communities” बताया. उनके मुताबिक, यह किताब उमर खालिद की JNU में की गई पीएचडी रिसर्च पर आधारित है. उन्होंने कहा कि उमर खालिद JNU के छात्र रहे हैं और उन्होंने वहीं अपनी पीएचडी की थीसिस जमा की थी. उसी संस्थान में उन्हें पीएचडी की डिग्री दी गई. बाद में इसी रिसर्च को किताब के रूप में प्रकाशित किया गया. उन्होंने यह भी कहा कि किताब में रामचंद्र गुहा का फॉरवर्ड शामिल है, जबकि बाकी सामग्री उनकी पीएचडी थीसिस पर आधारित है.

JNU में कार्यक्रम की अनुमति पहले मिली, फिर रद्द हुई

इंटरव्यू में बताया गया कि किताब को पढ़ने के लिए JNU में एक कार्यक्रम आयोजित किया जाना था. इसके लिए पहले ऑडिटोरियम में कार्यक्रम की अनुमति मिली थी, लेकिन बाद में इसे रद्द कर दिया गया. इसके बाद छात्रों ने कैंपस के बाहर कार्यक्रम आयोजित करने की कोशिश की. इंटरव्यू में दावा किया गया कि वहां भी उन्हें अनुमति नहीं दी गई.

इंटरव्यू में जब उमर खालिद के पिता सस प्रशासन के उस पक्ष का जिक्र किया, जिसके मुताबिक जिस सामग्री को पढ़े जाने की योजना थी, उससे कैंपस का माहौल प्रभावित हो सकता था और कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती थी. इस पर सैयद कासिम रसूल ने असहमति जताई. उन्होंने कहा कि यह वही किताब है जो पीएचडी थीसिस पर आधारित है और जिसे JNU में जमा किया गया था, और यह किताब आदिवासी मूवमेंट पर आधारित है.

क्या जेल में रहकर उमर खालिद ने लिखी कोई किताब?

इंटरव्यू में एक अहम सवाल यह भी उठा कि क्या उमर खालिद ने जेल में रहते हुए अपने अनुभवों पर कोई किताब लिखी है. इस पर उनके पिता ने स्पष्ट रूप से कहा कि ऐसी कोई किताब नहीं है. उन्होंने कहा कि जिस किताब को लेकर विवाद हो रहा है, वह जेल में रहते हुए नहीं लिखी गई.

किताब में किस विषय पर रिसर्च है?

सैयद कासिम रसूल ने बताया कि किताब सिंहभूम क्षेत्र के आदिवासियों और उनके आंदोलनों से जुड़ी है. उनके अनुसार, किताब में आदिवासी समुदाय की स्थिति, उनके आंदोलनों, विरोध करने के तरीकों और अपनी बात रखने के तरीकों को दिखाया गया है.

उन्होंने कहा कि इसमें अंग्रेजों के दौर में सिंहभूम इलाके की स्थिति और आदिवासी आंदोलनों से जुड़े पहलुओं को भी दर्शाया गया है. उनके मुताबिक, यह किताब देश के आदिवासी वर्ग को समझने में मदद कर सकती है.

क्यों फेमस हो रही है किताब?

किताब के कार्यक्रम को रोके जाने पर सैयद कासिम रसूल ने कहा कि इससे उनके परिवार का नुकसान नहीं हो रहा है. उनका कहना था कि किताब को रोकने की कोशिश से उसकी लोकप्रियता और बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि जितनी कोशिश किताब को रोकने की होगी, उतनी ही ज्यादा उसकी चर्चा होगी और वह लोगों के बीच पहुंचेगी. उनके मुताबिक, कार्यक्रम रोकने से JNU प्रशासन को जिस तरह का फायदा मिलने की उम्मीद रही होगी, उसका उल्टा असर हुआ है और किताब ज्यादा चर्चा में आ गई है.

जेएनयू को क्या दी सलाह?

सैयद कासिम रसूल ने कहा कि जिस किताब को लेकर विवाद है, वह JNU के ही एक पूर्व छात्र की रिसर्च पर आधारित है. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय को इस बात पर खुशी होनी चाहिए थी कि उसके यहां जमा की गई पीएचडी थीसिस बाद में किताब के रूप में प्रकाशित हुई. उनका कहना था कि विश्वविद्यालय के लिए यह सराहना की बात होनी चाहिए थी कि उसके एक छात्र की रिसर्च किताब के रूप में सामने आई और उसे लोगों के बीच लोकप्रियता मिल रही है.

उमर खालिद की लंबी जेल पर क्या बोले पिता?

इंटरव्यू में उमर खालिद के लंबे समय से जेल में रहने और जमानत नहीं मिलने पर भी सवाल किया गया. सैयद कासिम रसूल ने कहा कि परिवार के सामने जब कोई कानूनी समस्या आती है तो न्यायपालिका ही आखिरी सहारा होती है. उन्होंने कहा कि अगर न्यायपालिका से भी उम्मीद खत्म हो जाए तो कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता.

क्यों शुरू नहीं हुआ अभी ट्रायल?

उन्होंने कहा कि परिवार को अब भी उम्मीद है कि उमर खालिद को जमानत मिलेगी. उनके मुताबिक, पिछली कानूनी कार्यवाही में ट्रायल शुरू होने और गवाहों की क्रॉस-एग्जामिनेशन शुरू होने से जुड़े पहलुओं पर बात हुई थी. उन्होंने यह भी कहा कि बाद में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने इस फैसले पर आपत्ति जताई थी और मामला बड़ी बेंच के पास चला गया.

सैयद कासिम रसूल ने बताया कि जमानत का मामला हाई कोर्ट में भी डाला गया है और 27 अगस्त को सुनवाई की तारीख बताई गई है. उन्होंने कहा कि अगर वहां से राहत नहीं मिलती है तो परिवार दोबारा सुप्रीम कोर्ट जाएगा.

900 गवाह और करीब 3,000 पन्नों की चार्जशीट

उमर खालिद की कानूनी स्थिति पर बात करते हुए सैयद कासिम रसूल ने कहा कि कानून के मुताबिक अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है तो उसके मामले की सुनवाई होनी चाहिए और यह तय होना चाहिए कि वह दोषी है या नहीं. उनका कहना था कि करीब छह साल बीत जाने के बावजूद ट्रायल शुरू नहीं हुआ है. उन्होंने कहा कि ट्रायल शुरू होने में देरी के कारण आगे की प्रक्रिया भी लंबी हो सकती है. उन्होंने चार्जशीट और गवाहों की संख्या का भी जिक्र किया.

सैयद कासिम रसूल के मुताबिक, मामले में करीब 900 गवाह और करीब 3,000 पन्नों की चार्जशीट है. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर चार्ज फ्रेम होने में ही देरी होती रहेगी तो ट्रायल कब शुरू होगा और गवाह कब पेश होंगे.

उमर खालिद की पॉप्यूलैरिटी पर क्या बोले पिता?

सैयद कासिम रसूल ने कहा कि उमर खालिद का नाम अब देश में काफी जाना-पहचाना हो गया है. उनके मुताबिक, चाहे उनका विरोध कितना भी किया जाए, उनका नाम अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक चर्चाओं में आता रहता है. उन्होंने कहा कि उमर खालिद बाहर आने के बाद अपनी राजनीतिक सक्रियता जारी रखेंगे.

इंटरव्यू में उन्होंने झारखंड और दिल्ली में सीजेपी प्रोटेस्ट का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा दोनों की प्रोटेस्ट में उमर खालिद के नाम का जिक्र हुआ था. जहां उमर खालिद का नाम लिए जाने को लेकर विरोध की बात सामने आई थी. उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों के बावजूद उमर खालिद का नाम चर्चा में बना हुआ है.

उमर खालिद जेल में, परिवार पर कितना असर?

इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि इतने लंबे समय से उमर खालिद के जेल में रहने का परिवार पर क्या असर पड़ा है, तो उन्होंने कहा कि यह परिवार के लिए बेहद कठिन समय है. उन्होंने बताया कि उमर खालिद के भांजे-भतीजे जब छोटे थे, तब से अब तक करीब छह साल का समय बीत चुका है. उनके मुताबिक, जो बच्चे उस समय पैदा हुए थे, वे अब स्कूल जाने लगे हैं. उन्होंने कहा कि जब उमर खालिद बाहर आएंगे तो उनके लिए भी ऐसा लग सकता है कि दुनिया काफी बदल चुकी है. उन्होंने माना कि यह परिवार के लिए कठिन दौर है. खास तौर पर उनकी मां और बहनों के लिए यह समय बहुत मुश्किल रहा है.

UAPA और जमानत को लेकर क्या बोले?

जमानत नहीं मिलने के सवाल पर सैयद कासिम रसूल ने UAPA का भी जिक्र किया. उन्होंने कानून की आलोचना करते हुए इसे कठोर कानून बताया. उनका कहना था कि सिर्फ UAPA के तहत मामला दर्ज होने के आधार पर जमानत से इनकार करना उचित नहीं माना जाना चाहिए. उन्होंने UAPA से जुड़े एक अन्य मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी मामले में ट्रायल लंबा चलने की संभावना है तो ऐसी स्थिति में जमानत पर विचार किया जाना चाहिए.

स्टेट मिरर स्पेशल
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