कौन थे लुटियंस-बेकर, जिनकी बनाई राष्ट्रपति भवन से नॉर्थ और साउथ ब्लॉक तक की विरासत पर चढ़ाई जा रही विकास की नई परत?
रायसीना हिल्स और सेंट्रल विस्टा का चेहरा बदल रहा है। जानिए लुटियंस-बेकर की विरासत, नए केंद्रीय सचिवालय और पुरानी ऐतिहासिक इमारतों के भविष्य की पूरी कहानी।
Creराष्ट्रपति भवन की सीढ़ियों से लेकर नॉर्थ और साउथ ब्लॉक की लाल-भूरी दीवारों तक, दिल्ली का रायसीना हिल्स करीब एक सदी से ज्यादा समय से सत्ता की धड़कन रहा है. इसी परिसर को ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने ऐसी क्लासिकल शक्ल दी थी, जो आज भी देश की शासन-प्रशासन की ताकत और इतिहास की पहचान है. लेकिन अब इस विरासत पर 'विकास' की नई परत चढ़ रही है. नया संसद भवन, कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट और बदली हुई सरकारी व्यवस्था धीरे-धीरे सेंट्रल विस्टा का चेहरा बदल रहे हैं. आखिर क्या बदल रहा है, क्या बचाया जाएगा और लुटियंस-बेकर की विरासत का भविष्य क्या होगा?
दरअसल, नई दिल्ली की सत्ता का सबसे बड़ा पता है रायसीना हिल्स. एक तरफ राष्ट्रपति भवन की भव्य सीढ़ियां, दूसरी तरफ संसद, बीच में कर्तव्य पथ और सामने इंडिया गेट. इसी इलाके में देश के राष्ट्रपति का भवन है, संसद है और केंद्र सरकार के सबसे अहम मंत्रालयों के दफ्तर हैं. जिस सेंट्रल विस्टा को ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश भारत की नई राजधानी के प्रशासनिक केंद्र के रूप में डिजाइन किया था, उसका मूल प्रशासनिक ढांचा अब बदल रहा है.
बावजूद इसके यह कहना सही नहीं होगा कि लुटियंस-बेकर का पूरा सेंट्रल विस्टा खत्म हो रहा है. राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक और नेशनल आर्काइव्स जैसी विरासत इमारतों को संरक्षित और पुनर्विकसित किया जा रहा है. असली बदलाव उन कार्यालयी इमारतों में हो रहा है, जो आजादी के बाद बढ़ती सरकारी जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाई गई थीं.
कौन थे एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर?
नई दिल्ली की पहचान को समझने के लिए पहले इन दोनों वास्तुकारों को समझना जरूरी है. ब्रिटिश सरकार ने 1913 में सर एडविन लुटियंस और सर हर्बर्ट बेकर को नई राजधानी के महत्वपूर्ण भवनों की डिजाइनिंग की जिम्मेदारी दी. दिल्ली टाउन प्लानिंग कमेटी 1912 में बनाई गई थी और लुटियंस मार्च 1912 में इसके सदस्य बने थे.
लुटियंस को नई दिल्ली की शहरी योजना और प्रमुख इमारतों की वास्तुकला में सबसे प्रमुख नाम माना जाता है. उन्होंने पश्चिमी वास्तुकला को भारतीय और खासकर मुगल वास्तु तत्वों के साथ मिलाने की कोशिश की. उनकी शैली में यूरोपीय ज्यामिति, विशाल गुंबद, स्तंभ और भारतीय सजावटी रूप दिखाई देते हैं.
दूसरी ओर हर्बर्ट बेकर ने भी नई दिल्ली के सत्ता-केंद्र की कई महत्वपूर्ण इमारतों को आकार दिया. नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक तथा संसद भवन उनकी नई दिल्ली परियोजना से प्रमुख रूप से जुड़े हैं. यानी आज जिस रायसीना हिल्स को भारत के सत्ता-केंद्र के रूप में देखा जाता है, उसकी वास्तुकला में लुटियंस और बेकर दोनों की निर्णायक भूमिका थी.
लुटियंस और बेकर ने क्या-क्या बनाया?
साल 1911 से 1931 के बीच नई दिल्ली के निर्माण का बड़ा चरण चला. मूल सेंट्रल विस्टा में राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, रिकॉर्ड ऑफिस यानी आज का नेशनल आर्काइव्स, इंडिया गेट और उसके आसपास के हरे क्षेत्र शामिल थे. नई राजधानी का औपचारिक उद्घाटन 1931 में हुआ.
राष्ट्रपति भवन मूल रूप से वायसराय हाउस था. लुटियंस और बेकर की परिकल्पना से जुड़े इस भवन में 340 कमरे, लगभग 2.5 किलोमीटर लंबे गलियारे और करीब 190 एकड़ के बगीचे हैं. 1929 में इसका निर्माण पूरा हुआ और आज वही भवन स्वतंत्र भारत के राष्ट्रपति का आधिकारिक निवास है.
संसद भवन भी इसी वास्तु विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है. पुराने संसद भवन का निर्माण 1920 के दशक में हुआ और 1927 में इसका उद्घाटन किया गया. इसे हर्बर्ट बेकर से जोड़ा जाता है. स्वतंत्र भारत में इसी भवन में संविधान निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया आगे बढ़ी और दशकों तक देश की संसद की कार्यवाही चली.
फिर सेंट्रल विस्टा का पुराना स्वरूप क्यों बदला जा रहा है?
इसका सबसे बड़ा कारण है बढ़ती सरकारी जरूरतें और पुराना कार्यालयी ढांचा. आजादी के बाद केंद्र सरकार का विस्तार हुआ. मंत्रालयों और विभागों की संख्या बढ़ी तो नए कार्यालयों की जरूरत पड़ी. इसी जरूरत के चलते उद्योग भवन, निर्माण भवन, कृषि भवन, शास्त्री भवन और रेल भवन जैसी इमारतें 1956 से 1968 के बीच बनाई गईं. ये इमारतें लुटियंस-बेकर के मूल 1931 वाले सेंट्रल विस्टा का हिस्सा नहीं थीं.
सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, मौजूदा सेंट्रल विस्टा में 51 में से 39 मंत्रालय हैं, जबकि कई मंत्रालयों के दफ्तर बाहर अलग-अलग जगहों पर हैं. सरकार का तर्क है कि इससे समन्वय मुश्किल होता है और किराए तथा संचालन पर भी बड़ा खर्च होता है. सरकारी वेबसाइट के अनुसार सेंट्रल विस्टा के बाहर कार्यालयों के लिए करीब 1,000 करोड़ रुपये सालाना किराए पर खर्च होने का अनुमान बताया गया है.
यही वजह है कि अब कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट यानी CCS बनाया जा रहा है, जिसमें केंद्र सरकार के सभी 51 मंत्रालयों और विभागों को एक संगठित परिसर में लाने की योजना है.
कौन-कौन सी इमारतें हटेंगी और उनकी जगह क्या बनेगा?
यहां सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक को गिराया नहीं जाएगा. ये ग्रेड-I हेरिटेज इमारतें हैं. इनमें मौजूद मौजूदा मंत्रालयों को नए कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट में शिफ्ट करने के बाद इन दोनों इमारतों को संरक्षित और आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा. इन्हें भविष्य में राष्ट्रीय संग्रहालय के रूप में विकसित करने की योजना है.
दूसरी तरफ नए CCS परिसर के लिए मौजूदा कार्यालयी क्षेत्रों को नए सिरे से विकसित किया जा रहा है. प्रस्तावित व्यवस्था में 10 कार्यालय भवन और एक केंद्रीय कॉन्फ्रेंस सेंटर शामिल हैं. इन नए कार्यालयों में लगभग 54,000 कर्मचारियों की क्षमता रखने की योजना है. मंत्रालयों को जोड़ने के लिए भूमिगत स्वचालित पीपुल-मूवर, शटल और पैदल मार्ग जैसी सुविधाएं भी प्रस्तावित हैं.
समय के साथ कुछ पुरानी इमारतें वास्तव में हटाई भी जा चुकी हैं. संसद में दिए गए हालिया सरकारी जवाब के मुताबिक IGNCA, रक्षा भवन, पुराना उपराष्ट्रपति आवास और विज्ञान भवन एनेक्सी को ध्वस्त किया जा चुका है. वहीं CCS-1 और CCS-2 का निर्माण फरवरी 2026 में पूरा बताया गया है और CCS-3 अगस्त 2025 में पूरा हो चुका है. CCS-6 व 7, CCS-8 व 9 और CCS-10 समेत अन्य परियोजनाओं पर काम जारी है.
इसलिए सेंट्रल विस्टा के बदलाव को केवल 'पुरानी इमारतें तोड़ना' कहना अधूरा होगा. यह दरअसल पुराने बिखरे हुए सरकारी कार्यालयों से एक केंद्रीकृत आधुनिक प्रशासनिक परिसर की ओर जाने की प्रक्रिया है.
लुटियंस और बेकर की पहचान भी खत्म हो जाएगी?
नहीं. बल्कि उनकी सबसे महत्वपूर्ण वास्तु विरासत को बचाने की कोशिश की जा रही है. सरकार की योजना में राष्ट्रपति भवन, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, पुराना संसद भवन और नेशनल आर्काइव्स जैसी प्रमुख विरासत इमारतों को गिराने का प्रस्ताव नहीं है. पुराने संसद भवन को नए संसद भवन के साथ एकीकृत विधायी परिसर का हिस्सा बनाया गया है और उसे विरासत संरक्षण मानकों के अनुसार रेट्रोफिट किया जाना है.
नॉर्थ और साउथ ब्लॉक में भी मौजूदा मंत्रालयों के हटने के बाद संरक्षण और रेट्रोफिटिंग की योजना है. प्रस्ताव के मुताबिक यहां राष्ट्रीय संग्रहालय विकसित किया जाएगा. यानी इन इमारतों की भूमिका सत्ता के दफ्तरों से बदलकर राष्ट्रीय विरासत के संग्रहालय की हो सकती है.
केंद्रीय सचिवालय को सत्ता-केंद्र क्यों कहा जाता है?
केंद्रीय सचिवालय केवल कुछ सरकारी दफ्तरों का समूह नहीं है. यहां केंद्र सरकार के सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों और विभागों से जुड़े फैसलों की प्रशासनिक प्रक्रिया चलती है. नॉर्थ और साउथ ब्लॉक लंबे समय से भारत के प्रशासनिक तंत्र के प्रमुख केंद्र रहे हैं.
राष्ट्रपति भवन संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष का निवास है, संसद कानून बनाती है और केंद्रीय सचिवालय सरकार के नीतिगत फैसलों को प्रशासनिक रूप देता है. इसी व्यापक व्यवस्था के कारण रायसीना हिल्स और सेंट्रल विस्टा को भारत के पावर कॉरिडोर के रूप में देखा जाता है.
सेंट्रल विस्टा का महत्व सिर्फ सरकारी दफ्तरों तक सीमित नहीं है. यही वह धुरी है जिस पर गणतंत्र दिवस परेड जैसे राष्ट्रीय समारोह आयोजित होते हैं. 1955 से सेंट्रल विस्टा एवेन्यू गणतंत्र दिवस परेड का स्थायी स्थल रहा है.
Credit: State Mirror
तो क्या खत्म हो रहा है- लुटियंस का सेंट्रल विस्टा या उसका दौर?
असल कहानी यहीं है. लुटियंस और बेकर का बनाया सेंट्रल विस्टा पूरी तरह खत्म नहीं हो रहा, बल्कि उसका प्रशासनिक इस्तेमाल बदल रहा है. लगभग एक सदी पुराने सत्ता-परिसर में अब एक नई परत जुड़ रही है. जहां कभी ब्रिटिश साम्राज्य की सत्ता का प्रतीक खड़ा किया गया था, वही परिसर आज लोकतांत्रिक भारत की सत्ता और राष्ट्रीय स्मृति का केंद्र है.
नया संसद भवन बन चुका है, कर्तव्य पथ का पुनर्विकास हो चुका है और कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट आकार ले रहा है. दूसरी ओर नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, राष्ट्रपति भवन और पुराना संसद भवन जैसी ऐतिहासिक इमारतों को बचाकर उनके उपयोग को बदला जा रहा है.
इस हिसाब से अंग्रेजों के बनाए सेंट्रल विस्टा का 'अंत' नहीं, बल्कि एक सदी पुराने सत्ता-परिसर को जरूरत के हिसाब से नया शक्ल दिया जा रहा है. अब फर्क सिर्फ इतना है कि जिस वास्तुशिल्प यानी आर्किटेक्ट ने कभी ब्रिटिश राज की राजधानी को आकार दिया था, वही विरासत अब स्वतंत्र भारत के लोकतंत्र, प्रशासन और इतिहास को एक नए रूप में जगह देने जा रही है.




