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स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा, जिनकी ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में दिखाई गई कहानी...जिंदा इजेक्ट हुए, लेकिन पाक सेना ने पकड़ की थी बेहद क्रूरता

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की वीरगाथा, जिन्होंने साथी पायलट के. नचिकेता को बचाने के लिए खतरे के बावजूद उड़ान जारी रखी. जानें 27 मई 1999 के उस मिशन, शहादत और वीर चक्र से सम्मानित किए जाने की पूरी कहानी.

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा, जिनकी ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ में दिखाई गई कहानी...जिंदा इजेक्ट हुए, लेकिन पाक सेना ने पकड़ की थी बेहद क्रूरता
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समी सिद्दीकी
By: समी सिद्दीकी9 Mins Read

Updated on: 9 Aug 2026 2:00 PM IST

कभी-कभी युद्ध की कुछ कहानियां सिर्फ गोलियों, मिसाइलों और जीत-हार तक सीमित नहीं रहतीं. उनमें एक सैनिक का साहस, उसके परिवार का इंतजार और आखिरी सांस तक निभाया गया कर्तव्य भी दर्ज होता है. स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की कहानी भी ऐसी ही है, जिन्होंने अपने साथी पायलट को बचाने के लिए अपनी जान की परवाह नहीं की और कारगिल की जंग में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दिया. यह कारगिल जंग में पहली शहादत थी.

आज नेटफ्लिक्स पर आई सीरीज ऑपरेशन सफेद सागर’ के जरिए उनकी कहानी एक बार फिर चर्चा में है. जिसमें, अभिनेता सिद्धार्थ ने स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की भूमिका निभाई है. यह कहानी सिर्फ 1999 के कारगिल युद्ध के एक मिशन की नहीं, बल्कि उस अधिकारी की है जिसने आखिरी समय तक अपना फर्ज निभाया.

कोटा के उस लड़के से भारतीय वायुसेना के जांबाज अधिकारी तक...

22 मई 1963 को राजस्थान के कोटा में अजय आहूजा का जन्म हुआ था. बचपन से लेकर आगे की जिंदगी तक उनका सफर उन्हें भारतीय वायुसेना तक ले गया. उन्होंने नेशनल डिफेंस अकादमी से प्रशिक्षण लिया और 1985 में भारतीय वायुसेना में शामिल हुए.

अगले 14 साल उन्होंने आसमान में देश की सेवा करते हुए बिताए. उन्होंने मिग-21 और मिग-23 जैसे लड़ाकू विमान उड़ाए. वह फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर भी रहे और उनके पास 1,000 घंटे से ज्यादा उड़ान का अनुभव था.

उनकी पत्नी अलका आहूजा के मुताबिक, अजय अपने काम को सिर्फ नौकरी नहीं मानते थे. वह खुद को किस्मत वाला समझते थे कि उन्हें आसमान से देश की जमीन की रक्षा करने का मौका मिला. उनके पीछे पत्नी और एक छोटा बच्चा था. लेकिन अजय के लिए देश की सेवा सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी.

कारगिल में शुरू हुआ सबसे मुश्किल दौर....

1999 में जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ, तब अजय आहूजा भारतीय वायुसेना की नंबर 17 स्क्वाड्रन ‘गोल्डन एरोज’ में फ्लाइट कमांडर थे. इस यूनिट की जिम्मेदारी में दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखना और खुफिया जानकारी जुटाना भी शामिल था. ऑपरेशन सफेद सागर के तहत भारतीय वायुसेना लगातार ऐसे मिशन कर रही थी, जिनसे दुश्मन की स्थिति और उसकी गतिविधियों का पता लगाया जा सके. अजय भी इसी अभियान का हिस्सा थे. लेकिन 27 मई 1999 का दिन उनकी जिंदगी का आखिरी मिशन साबित होने वाला था.

27 मई 1999... जब एक साथी पायलट मुसीबत में फंसा....

उस दिन अजय आहूजा बटालिक सेक्टर में फोटो रिकॉनिसेंस मिशन का नेतृत्व कर रहे थे. इसी दौरान फ्लाइट लेफ्टिनेंट के. नचिकेता का मिग-27 दुश्मन की फायरिंग के बीच तकनीकी खराबी का शिकार हो गया. नचिकेता को विमान से इजेक्ट करना पड़ा और वह दुश्मन के कब्जे वाले इलाके में जा गिरे. अब अजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी- अपने साथी पायलट का पता लगाना और उसके बचाव अभियान में मदद करना.

अजय जानते थे कि जिस इलाके में वह उड़ान भर रहे हैं, वहां पाकिस्तान ने स्टिंगर जैसी सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें तैनात कर रखी थीं. खतरा सामने था. लेकिन अजय ने उड़ान जारी रखी. वह अपने साथी पायलट की तलाश में उस इलाके के ऊपर चक्कर लगाते रहे. और फिर वही हुआ, जिसका खतरा उन्हें पहले से पता था.

पाकिस्तान ने कैसे किया था हमला?

अजय आहूजा का मिग-21 स्टिंगर मिसाइल की चपेट में आ गया. विमान को नुकसान पहुंचा और अजय को इजेक्ट करना पड़ा. वह पैराशूट के जरिए नीचे उतरे, लेकिन उनका उतरना नियंत्रण रेखा के पार पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हुआ. भारतीय अधिकारियों के अनुसार, इजेक्ट करने के बाद अजय जीवित थे. लेकिन जमीन पर उतरने के बाद उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं. उन्हें पाकिस्तानी सेना ने बंदी बना लिया.

पत्नी को नहीं थी किसी भी बात की खबर...

उधर भारत में उनके परिवार को अभी तक पूरी सच्चाई नहीं पता थी. पत्नी को नहीं पता था कि अजय के साथ क्या हुआ है अजय की पत्नी अलका आहूजा के लिए वह वक्त किसी डरावने इंतजार से कम नहीं था. शहादत से कुछ दिन पहले ही उनकी अजय से फोन पर बात हुई थी. अजय ने उनसे कहा था कि वह श्रीनगर आ जाएं और टिकट के लिए पैसे भेज दें. अलका ने पैसे भेज दिए.

लेकिन अगले दिन से श्रीनगर जाने वाली सभी फ्लाइट कैंसिल हो गईं. उस समय उन्हें समझ नहीं आया कि अचानक ऐसा क्यों हो रहा है. फिर 26 मई को एयर स्ट्राइक शुरू हुई. तभी उन्हें अंदाजा हुआ कि हालात सामान्य नहीं हैं. 27 मई की शाम करीब 4 बजे अलका अपने बेटे के साथ घर पर थीं. तभी स्टेशन कमांडर उनके घर पहुंचे. वह यूनिफॉर्म में थे.

शहादत के बाद अलका ने अधिकारियों से क्या पूछा?

अलका के लिए यह दृश्य अपने आप में चिंता पैदा करने वाला था. उन्होंने पूछा कि क्या हुआ है. उन्हें बताया गया कि अजय ने इजेक्ट किया है और वह लापता हैं. बस इतना ही पता था. अजय कहां हैं? जिंदा हैं या नहीं? उनके साथ क्या हुआ? इन सवालों के जवाब परिवार के पास नहीं थे.

अलका अपने पति की सलामती की उम्मीद कर रही थीं. बाद में उन्हें पता चला कि फ्लाइट लेफ्टिनेंट के. नचिकेता को भी पाकिस्तान ने पकड़ लिया है. उन्हें यह भी बताया गया कि अजय सुरक्षित तरीके से नीचे उतरे थे, लेकिन पाकिस्तानी सेना ने उन्हें पकड़ लिया. नचिकेता आठ दिन तक पाकिस्तान की हिरासत में रहे और बाद में सुरक्षित भारत लौट आए. लेकिन अजय आहूजा वापस नहीं लौटे.

अगले दिन आया पार्थिव शरीर...

अजय आहूजा का पार्थिव शरीर अगले दिन भारत को सौंपा गया. भारतीय अधिकारियों के अनुसार, वह विमान से इजेक्ट करने के बाद जीवित थे और बाद में पाकिस्तानी सेना ने उन्हें बंदी बनाया था. उनकी मौत के बाद पोस्टमार्टम में गोली लगने के निशान मिले. भारत ने पाकिस्तान पर जिनेवा कन्वेंशन के उल्लंघन का आरोप लगाया, जबकि पाकिस्तान ने इन आरोपों से इनकार किया.

अजय की पत्नी ने बताया कि जब उन्हें उनके पति का पार्थिव शरीर मिला तो उस पर गोली के निशान थे. उन्होंने खुद शव नहीं देखा था, लेकिन उन्हें बताया गया कि अजय को बहुत प्रताड़ित किया गया था.

कैसे किया गया था टॉर्चर?

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अजय आहूजा के शरीर पर कई गंभीर चोटें थीं. उनके सिर में दाहिने कान के पास से गोली घुसने और बाएं कान की तरफ से निकलने का उल्लेख किया गया. छाती पर भी गोली लगी थी. इन चोटों के आधार पर यह दावा किया गया कि उन्हें नजदीक से गोली मारी गई थी. उनकी दोनों जांघों पर कई पंचर घाव बताए गए. फेफड़ों और गर्दन की नसों को नुकसान पहुंचने की बात सामने आई. उनके आंतरिक अंग भी बुरी तरह घायल बताए गए. पैराशूट से नीचे उतरते समय उनके बाएं घुटने में फ्रैक्चर होने की जानकारी भी सामने आई.

इस शहादत पर अधिकारियों ने क्या कहा?

कारगिल युद्ध के दौरान अजय आहूजा के कमांडिंग ऑफिसर रहे पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल बी.एस. धनोआ ने उनकी बहादुरी को याद किया था. उन्होंने कहा था कि अजय ने अपने साथी फ्लाइट लेफ्टिनेंट के. नचिकेता की जान बचाने के लिए अपने कर्तव्य से कहीं आगे जाकर काम किया.

अजय को पता था कि जिस इलाके में वह उड़ान भर रहे हैं, वहां दुश्मन की मिसाइलें मौजूद हैं. इसके बावजूद उन्होंने नचिकेता का पता लगाने और बचाव अभियान में मदद करने के लिए उड़ान जारी रखी. आखिरकार इसी मिशन के दौरान उनकी जान चली गई.

कब सौंपा गया अजय अहूजा का शव?

एक सैनिक चला गया, लेकिन पत्नी को जीने का तरीका सिखा गया अजय की पत्नी अलका ने बाद में अपने पति की शहादत के बारे में लिखा. 30 मई 1999 को अजय का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा हुआ उनके सामने आया. पूरे सैन्य सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई.

पति के बारे में क्या बोलीं अलका?

अलका ने बताया कि अजय खुशमिजाज स्वभाव के थे. उनसे मिलने वाला व्यक्ति उन्हें आसानी से भूल नहीं पाता था. वह अपने सीनियर्स और जूनियर्स के बीच भी काफी लोकप्रिय थे. अजय अपनी पत्नी को हमेशा अपने पैरों पर खड़े रहने के लिए प्रेरित करते थे. वह चाहते थे कि अलका जिंदगी में कुछ न कुछ करती रहें और किसी पर निर्भर न रहें. अजय के जाने के बाद यही सीख अलका के लिए जिंदगी का सहारा बनी.

वीर चक्र से सम्मानित हुए अजय आहूजा

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा कारगिल युद्ध में शहीद होने वाले भारतीय वायुसेना के पहले अधिकारी बने. उनके साहस, कर्तव्यनिष्ठा और बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया. वीर चक्र भारत का तीसरा सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है.

कारगिल युद्ध को कई साल बीत चुके हैं. लेकिन 27 मई 1999 का वह मिशन आज भी अजय आहूजा की पहचान का हिस्सा है. एक तरफ आसमान में उड़ता वह पायलट था, जिसे पता था कि दुश्मन की मिसाइलें उसका इंतजार कर रही हैं. दूसरी तरफ उसका साथी था, जो दुश्मन के इलाके में फंस चुका था.

स्वतंत्रता दिवसस्टेट मिरर स्पेशल
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