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आवारा कुत्तों पर बयान को लेकर मेनका गांधी पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, बॉडी लैंग्वेज तक पर उठाए सवाल

आवारा कुत्तों के हमलों से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पशु अधिकार कार्यकर्ता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मनेका गांधी को कड़ी फटकार लगाई. कोर्ट ने एक पॉडकास्ट में अदालत की टिप्पणियों पर उनकी प्रतिक्रिया, भाषा और “बॉडी लैंग्वेज” पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह उसकी “मैग्नैनिमिटी” है कि अवमानना की कार्रवाई नहीं की गई.

आवारा कुत्तों पर बयान को लेकर मेनका गांधी पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, बॉडी लैंग्वेज तक पर उठाए सवाल
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( Image Source:  Sora AI )
प्रवीण सिंह
Edited By: प्रवीण सिंह

Published on: 20 Jan 2026 4:12 PM

देश में आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों और उससे जुड़ी जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री और पशु अधिकार कार्यकर्ता मनेका गांधी को कड़ी फटकार लगाई. कोर्ट ने न सिर्फ उनके बयानों पर नाराज़गी जताई, बल्कि एक पॉडकास्ट में अदालत की टिप्पणियों पर उनकी प्रतिक्रिया और “बॉडी लैंग्वेज” तक को सवालों के घेरे में ले लिया.

तीन जजों की बेंच ने साफ कहा कि यह अदालत की “मैग्नैनिमिटी (उदारता)” है कि इस मामले में अवमानना (Contempt) की कार्यवाही नहीं की गई. जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने मनेका गांधी के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन से तीखे शब्दों में पूछा, “क्या आपने देखा है कि आपकी मुवक्किल किस तरह की टिप्पणियां कर रही हैं? अदालत को संयम बरतने की सलाह दी जा रही है, लेकिन आपकी क्लाइंट किसी पर भी, किसी भी तरह की टिप्पणी कर रही हैं.”

कोर्ट का सख्त रुख

कोर्ट ने कहा कि मनेका गांधी के बयानों में न सिर्फ अदालत की टिप्पणियों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया, बल्कि जिस अंदाज़ में वह बोल रही थीं, वह भी आपत्तिजनक है. बेंच ने यहां तक कहा, “हम अवमानना का संज्ञान नहीं ले रहे हैं, यही हमारी उदारता है. आपने उनका पॉडकास्ट सुना है? उनकी बॉडी लैंग्वेज देखी है? वह क्या कह रही हैं और कैसे कह रही हैं - यह भी मायने रखता है.”

‘कुत्तों को घर क्यों नहीं ले जातीं?’ बयान पर विवाद

दरअसल, पिछले हफ्ते हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के हमलों पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए कहा था कि अगर बच्चों या बुजुर्गों पर कुत्तों के हमले में मौत या गंभीर चोट होती है, तो राज्य सरकारों से भारी मुआवजा वसूला जाएगा. कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि जो लोग आवारा कुत्तों को खुले में खाना खिलाते हैं, उनकी जवाबदेही और जिम्मेदारी तय की जा सकती है. बेंच ने उस वक्त तीखा सवाल किया था, “अगर आप इन जानवरों से इतना प्यार करते हैं, तो इन्हें अपने घर क्यों नहीं ले जाते? ये कुत्ते सड़कों पर घूमकर लोगों को क्यों काटें और डराएं?” इसी टिप्पणी को लेकर मनेका गांधी ने एक पॉडकास्ट में अदालत पर सवाल उठाए थे, जिसे लेकर अब कोर्ट ने कड़ा ऐतराज़ जताया.

“यह व्यंग्य नहीं था, हम गंभीर थे”

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि कोर्ट की टिप्पणियों को कभी-कभी व्यंग्यात्मक समझ लिया जाता है और इसके “दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम” हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि कुत्तों को खाना खिलाने वाले लोगों पर हमले हो रहे हैं और हमलावर कोर्ट की टिप्पणियों का हवाला दे रहे हैं. इस पर जस्टिस विक्रम नाथ ने दो टूक कहा, “हम व्यंग्य नहीं कर रहे थे. हमने यह बात पूरी गंभीरता से कही थी.” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां सुनवाई के दौरान मौखिक बातचीत का हिस्सा थीं, लेकिन चूंकि अब अदालत की कार्यवाही का प्रसारण होता है, इसलिए बात सार्वजनिक हो जाती है.

वकील का 26/11 वाला संदर्भ, कोर्ट की तीखी प्रतिक्रिया

बहस के दौरान राजू रामचंद्रन ने कहा कि उन्होंने 26/11 के आतंकी अजमल कसाब का भी केस लड़ा था. इस पर जस्टिस नाथ ने तुरंत जवाब दिया, “कसाब ने अदालत की अवमानना नहीं की थी.” यह टिप्पणी साफ तौर पर यह संकेत थी कि कोर्ट मनेका गांधी के बयानों को बेहद गंभीरता से ले रहा है.

कोर्ट का सवाल: मनेका गांधी का योगदान क्या?

जब वकील ने रेबीज कंट्रोल, वैक्सीनेशन और प्रोफेशनल कैपेसिटी बिल्डिंग की बात की, तो बेंच ने पलटकर पूछा - “आपकी क्लाइंट एक एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट रही हैं, कैबिनेट मंत्री भी रही हैं. बताइए, इन योजनाओं के लिए बजट अलोकेशन में उनका क्या योगदान रहा?” यह सवाल सीधे तौर पर मनेका गांधी की भूमिका और जिम्मेदारी पर था - कि सिर्फ बयानबाज़ी नहीं, बल्कि नीतिगत और प्रशासनिक योगदान भी जरूरी है.

नसबंदी पर बहस

प्रशांत भूषण ने कहा कि आवारा कुत्तों की नसबंदी (स्टेरिलाइजेशन) से उनकी आक्रामकता कम होती है, लेकिन ज्यादातर शहरों में इसे प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा रहा. कोर्ट ने माना कि समस्या जटिल है, लेकिन साथ ही यह भी साफ किया कि आम नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है. सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी ने साफ कर दिया है कि आवारा कुत्तों के मुद्दे पर अब भावनात्मक तर्कों से ज्यादा जवाबदेही, नीति और ज़मीनी हकीकत पर बात होगी. अदालत ने यह भी संकेत दिया कि अगर जरूरत पड़ी, तो राज्य सरकारों के साथ-साथ उन लोगों की भी जिम्मेदारी तय की जा सकती है, जो बिना किसी व्यवस्था के सड़कों पर कुत्तों को खाना खिलाते हैं. मनेका गांधी के मामले में कोर्ट ने भले ही अवमानना की कार्रवाई नहीं की, लेकिन “मैग्नैनिमिटी” वाला शब्द अपने आप में एक कड़ा संदेश है - कि अगली बार अदालत इतनी उदार न भी रहे.

सुप्रीम कोर्ट
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