Exclusive: PM इंदिरा मानतीं थीं लोहा, तिहाड़ में तांत्रिक चंद्रास्वामी मांग गए पानी, तड़के जेल में पीपल के नीचे जाने की करते थे जिद...?
पीएम नरसिम्हा राव के करीबी तांत्रिक चंद्रास्वामी तिहाड़ जेल में क्यों परेशान थे? जानिए सुबह 4 बजे पीपल के नीचे साधना की जिद और जेल से जुड़ी अनसुनी कहानी.
तंत्र-मंत्र, आध्यात्मिक शक्तियों और सत्ता के गलियारों में रसूख की कहानियों के बीच चंद्रास्वामी का नाम 1990 के दशक में हमेशा सुर्खियों में रहा. देश के बड़े-बड़े नेता और कारोबारी उनसे सलाह लेते थे. पूर्व पीएम इंदिरा गांधी तो चंद्रास्वामी का लोहा मानती थीं. पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के साथ उनकी नजदीकियां भी जगजाहिर थीं. लेकिन वक्त ने ऐसी करवट ली कि जिस शख्स का राजनीतिक गलियारों में दबदबा माना जाता था, जिसके कहने पर पीएम आईएएस और आईपीएस व अन्य बड़े-बड़े ट्रांसफर पोस्टिंग हुआ करते थे, उसे तिहाड़ जेल की चारदीवारी के भीतर रहना पड़ा. स्टेट मिरर के एडिटटर क्राइम एंड इनवेस्टिगेशन संजीव चौहान से बातचीत में तिहाड़ जेल में एडिशनल सुपरिंटेंडेंट रहे अजय भाटिया उर्फ जिद्दी जेलर ने बताया कि जेल का माहौल चंद्रास्वामी के लिए मानसिक रूप से बेहद मुश्किल भरा साबित हुआ.
अधिकांश समय वह इतना घबरा जाते थे कि डॉक्टर बुलवाना पड़ता था. वह सुबह पीपल के पेड़ के नीचे साधना करने की अनुमति मांगते थे. आखिर कौन थे चंद्रास्वामी और किन विवादों ने उन्हें जेल की दहलीज तक पहुंचाया? जानें सबकुछ.
तिहाड़ में क्यों परेशान रहते थे चंद्रास्वामी?
तिहाड़ जेल के एडिशनल सुपरिंटेंडेंट रहे अजय भाटिया ने स्टेट मिरर को दिए इंटरव्यू में चंद्रास्वामी के जेल के दिनों से जुड़े कई अनुभव साझा किए थे. उनके मुताबिक, जेल आने के कुछ समय बाद ही चंद्रास्वामी असहज रहने लगे थे. वह ज्यादातर समय ध्यान में बिताते थे, लेकिन मानसिक बेचैनी कम नहीं हो रही थी. भाटिया के अनुसार, जिस दिन रात में उनका सेल जल्दी बंद कर दिया जाता, उस दिन उनकी घबराहट बढ़ जाती थी. कई बार रात 10 से 12 बजे के बीच डॉक्टरों को बुलाना पड़ता था. हालांकि, धीरे-धीरे जेल के माहौल में रहने की उन्हें आदत हो गई.
पीपल के पेड़ के नीचे साधना की क्यों मांगी इजाजत?
अजय भाटिया के मुताबिक, एक दिन बातचीत के दौरान चंद्रास्वामी ने उनसे कहा कि जेल में रहने के कारण उनकी तांत्रिक साधना प्रभावित हो रही है. उन्होंने सुबह चार बजे सेल से बाहर निकलने और पास के पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर साधना करने की अनुमति मांगी थी. ऐसा उन्होंने बार बार अनुरोध किया था. उनका कहना था कि दिल्ली आने के बाद से उनकी साधना लगभग छूट गई थी और जेल में भी नियमित साधना नहीं कर पा रहे थे. वह चाहते थे कि रोज सुबह उन्हें कुछ समय पेड़ के नीचे बैठने दिया जाए. भाटिया के मुताबिक, चंद्रास्वामी ने नेताओं की राजनीति पर टिप्पणी करते हुए यह भी कहा था कि 'नेताओं को नीति से कोई प्रीति नहीं होती.'
एक दिन उन्होंने कहा कि जेल में रहने की वजह से मैं तांत्रिक साधना नहीं कर पाता हूं. मुझे सुबह सेल से बाहर कर दिया करो. पास के पीपी पेड़ के बाहर जाने के इजाजत भी दे दो. मैं वहां पर रोज सुबह के समय साधना करना चाहता हूं. वैसे तो दिल्ली आने के बाद से ही साधना लगभग छूट गया है. अगर मेरा यह काम कर दोगो तो साधना फिर से शुरू हो जाएगा.
जेल में क्यों सूखने लगा हलक?
जेलर के मुताबिक उनकी इस असहजता और परेशानी से साफ था कि वो भी जेल के अंदर आकर पानी मांगने लगे थे. जबकि तत्कालीन पीएम नरसिम्हा राव उनसे मिलने खुद उनके ठिकाने पर जाते थे. अजय भाटिया ने कहा कि तिहाड़ जेल ही क्या, किसी भी जेल के अंदर जाते ही जिंदगी थम जाती है. इस बात का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि, 'जो पीएम का तांत्रिक रहा हो, उसका भी जेल में हलक सूखने लगा था.'
जेलर को बड़े नाम से क्यों नहीं पड़ता फर्क?
जेलर या जेल के अन्य कर्मियों में तांत्रिक चंद्रस्वामी या फिर अन्य किसी भी बड़े नामसे कोई फर्क नहीं पड़ता. फर्क केवल इससे पड़ता है कि आरोपी कैदी या सजायाफ्ता कैदी की उम्र क्या है? ऐसा इसलिए कि उम्रदराज कैदियों की देखभाल करना जेल में आसान काम नहीं होता. ऐसे कैदी बराबर बीमार पड़ते रहते हैं. साथ ही तरह तरह की मानसिक परेशानियों के शिकार भी होते हैं. ऐसे कैदियों के साथ न तो आप ज्यादा सख्ती कर सकते, ना ही जेल के नियमों परे जाकर सहानुभूति जताते हुए ज्यादा कुछ कर सकते हैं.
लाखूभाई पाठक धोखाधड़ी मामला क्या जिसमें गए जेल?
लंदन में रहने वाले भारतीय कारोबारी लाखूभाई पाठक ने आरोप लगाया था कि 1988–1996 के दौरान चंद्रास्वामी ने भारत में सरकारी ठेका दिलाने का भरोसा देकर उनसे 1 लाख अमेरिकी डॉलर लिए. आरोप था कि इस काम के लिए उन्होंने अपने राजनीतिक संपर्कों का इस्तेमाल करने का दावा किया. इस मामले में फरवरी 1988 में गिरफ्तारी हुई थी और जमानत मिल गई थी. 2 मई 1996 को दोबारा गिरफ्तार किया गया और उन्हें तिहाड़ जेल भेजा गया. दिसंबर 2003 में दिल्ली की अदालत ने चंद्रास्वामी, उनके सहयोगी और पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव को बरी कर दिया.
और किन किन मामलों में आया था नाम?
चंद्रास्वामी का नाम राजीव गांधी हत्याकांड (1991) की जांच में भी आया था, जहां उनके कथित संपर्कों और फंडिंग की पड़ताल हुई. इसके अलावा, इलाहाबाद के कस्टम अधिकारी एल.डी. अरोड़ा हत्याकांड (1993), विदेशी मुद्रा विनिमय कानून (FERA) के उल्लंघन, अंतरराष्ट्रीय हथियार कारोबारी अदनान खशोगी से संबंधों और 2014 में दिल्ली के एक कारोबारी द्वारा लगाए गए रत्न चोरी के आरोपों में भी उनका नाम सामने आया था. 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने FERA उल्लंघन के मामले में उन पर 9 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था.
चंद्रास्वामी कौन थे?
चंद्रास्वामी (नेमी चंद जैन) भारत के विवादास्पद तांत्रिक और स्वयंभू आध्यात्मिक गुरु थे. 1980 और 1990 के दशक में देश की राजनीति और सत्ता के गलियारों में उनका काफी प्रभाव माना जाता था. पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव से उनकी नजदीकी चर्चा में रही. अंतरराष्ट्रीय हथियार कारोबारी अदनान खशोगी और कई विदेशी हस्तियों से भी उनके संपर्क थे. उन पर धोखाधड़ी, जालसाजी और विदेशी मुद्रा कानून के उल्लंघन जैसे मामलों में आरोप लगे थे.
पूर्व पीएम नरसिम्हा राव से क्या था कनेक्शन?
चंद्रास्वामी और पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के बीच करीबी व्यक्तिगत और राजनीतिक संबंध थे. 1991 में राव के प्रधानमंत्री बनने के बाद चंद्रास्वामी की सत्ता के गलियारों में पहुँच और प्रभाव की काफी चर्चा हुई. उन्हें राव का आध्यात्मिक सलाहकार माना जाता था. सरकारी नियुक्तियों और राजनीतिक फैसलों में उनकी कथित दखलंदाजी की भी चर्चा होती थी. लाखूभाई पाठक धोखाधड़ी मामले में राव और चंद्रास्वामी दोनों आरोपी बनाए गए थे. हालांकि, दिसंबर 2003 में अदालत ने दोनों को बरी कर दिया था.
दरअसल, सत्ता के गलियारों में प्रभाव, तंत्र-साधना के दावे और लगातार कानूनी विवादों ने चंद्रास्वामी को लंबे समय तक सुर्खियों में बनाए रखा. तिहाड़ जेल में उनके अनुभवों से जुड़ा अजय भाटिया का बयान उनकी जिंदगी के उस दौर की तस्वीर पेश करता है, जब राजनीतिक रसूख और आध्यात्मिक पहचान जेल की सख्त दिनचर्या के सामने काम नहीं आ रही थी.




