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Explainer: मोदी से सोनिया गांधी का Mind Game, क्या कांग्रेस विदेश नीति को बना रही है चुनावी मुद्दा?

सोनिया गांधी के गाजा लेख, मोदी सरकार की विदेश नीति, कांग्रेस की चुनावी रणनीति, मिडिल ईस्ट संकट और बीजेपी के पलटवार का पूरा विश्लेषण पढ़ें.

Sonia Gandhis article on Gaza Modi government, Indias foreign policy
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कभी संसद के भीतर, कभी चुनावी मंचों से और कभी अखबारों के ओपिनियन पन्नों से- सोनिया गांधी ने समय-समय पर मोदी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए हैं. लेकिन उनके हालिया लेख ने बहस का दायरा घरेलू राजनीति से निकालकर विदेश नीति तक पहुंचा दिया है. गाजा युद्ध, इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष और मिडिल ईस्ट की बदलती राजनीति के बीच उन्होंने भारत के रुख पर सवाल उठाए हैं. दिलचस्प यह भी है कि यह पहला मौका नहीं है, जब सोनिया गांधी ने किसी अखबार के जरिए सरकार पर वैचारिक हमला बोला हो. पिछले एक दशक में उनके कई लेख लोकतंत्र, संविधान, अर्थव्यवस्था और अब विदेश नीति को लेकर सियासी विमर्श का केंद्र बन चुके हैं.

फिलहाल, गाजा युद्ध और बदलते मिडिल ईस्ट समीकरणों के बीच सोनिया गांधी की ओर से 27 जून 2026 को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक लेख ने भारत की विदेश नीति को लेकर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है. यह विवाद अब थमने का नाम नहीं ले रहा है. हालांकि, बीजेपी ने भी कांग्रेस के आरोपों का अपने तरीके से जवाब दिया है. ऐसे में सवाल सिर्फ इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष पर भारत के रुख का नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या विपक्ष अब विदेश नीति को घरेलू राजनीति के केंद्र में लाने की रणनीति बना रहा है?

क्या गाजा युद्ध बना भारत की विदेश नीति का नया मैदान?

सोनिया गांधी ने अपने लेख में गाजा में पैदा हुए मानवीय संकट को लेकर मोदी सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए. उन्होंने अक्टूबर 2023 में हमास के हमले को गलत और अस्वीकार्य बताया, लेकिन इसके बाद इजराइल की सैन्य कार्रवाई को बेहद कठोर और बर्बर बताते हुए कहा कि भारत को अपनी पारंपरिक विदेश नीति के अनुरूप अधिक स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए था.

उनका मुख्य तर्क यह है कि भारत की विदेश नीति लंबे समय तक फिलिस्तीन के अधिकारों, उपनिवेशवाद विरोध और वैश्विक शांति के सिद्धांतों पर आधारित रही है. सोनिया गांधी के अनुसार, इजराइल के साथ भारत की बढ़ती रणनीतिक नजदीकी ने फिलिस्तीन, ईरान और व्यापक मिडिल ईस्ट में भारत की पुरानी कूटनीतिक भूमिका को प्रभावित किया है.

गाजा संघर्ष ने पूरी दुनिया को अपने-अपने रुख स्पष्ट करने के लिए मजबूर किया है. एक तरफ इजराइल की सुरक्षा चिंताएं हैं, तो दूसरी तरफ गाजा में नागरिकों की मौत और मानवीय संकट का सवाल है. इसी संतुलन के बीच भारत की नीति भी लगातार चर्चा में रही है.

मोदी सरकार ने इजराइल के साथ रणनीतिक संबंधों को मजबूत किया है, लेकिन साथ ही फिलिस्तीन के लिए मानवीय सहायता और दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन की बात भी कही है. बीजेपी का कहना है कि भारत की विदेश नीति संतुलित है और कांग्रेस इसे राजनीतिक रंग दे रही है.

क्या कांग्रेस विदेश नीति को चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है?

परंपरागत रूप से भारत में विदेश नीति को दलगत राजनीति से ऊपर रखने की कोशिश रही है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में चीन सीमा विवाद, रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिका के साथ संबंध और अब गाजा युद्ध जैसे मुद्दों ने विदेश नीति को घरेलू बहस का हिस्सा बना दिया है.

कांग्रेस की रणनीति यह हो सकती है कि वह विदेश नीति को सिर्फ कूटनीति का विषय न रखकर नैतिकता, मानवाधिकार और भारत की वैश्विक छवि से जोड़कर जनता के बीच ले जाए. इसके जरिए वह मोदी सरकार की प्राथमिकताओं और फैसलों पर सवाल उठा रही है.

सोनिया गांधी का आरोप है कि भारत ने अपनी पुरानी संतुलन वाली भूमिका को कमजोर किया है. वहीं सरकार का तर्क है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत ने अपने रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए नए रिश्ते बनाए हैं.

मिडिल ईस्ट में भारत के हितों पर क्यों उठ रहे सवाल?

मिडिल ईस्ट भारत के लिए केवल कूटनीतिक क्षेत्र नहीं है. इस क्षेत्र से भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक रिश्ते और लाखों भारतीयों के रोजगार जुड़े हुए हैं. ऐसे में इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष पर भारत का हर बयान रणनीतिक असर रखता है.

सोनिया गांधी के अनुसार, इजराइल के साथ बढ़ती नजदीकी की कीमत भारत को अपने पुराने रिश्तों और क्षेत्रीय प्रभाव के रूप में चुकानी पड़ सकती है. उनका दावा है कि भारत ने फिलिस्तीन, ईरान और अरब देशों के साथ अपने पुराने संतुलन को कमजोर किया है.

राहुल गांधी घरेलू मुद्दों पर क्यों साध रहे निशाना?

यह मुद्दा उस समय और ज्यादा चर्चा में आ गया, जब राहुल गांधी ने सोनिया गांधी के लेख को वैचारिक आधार बताते हुए अपनी मां के विचारों का समर्थन किया. राहुल गांधी खुद भी मोदी सरकार को घरेलू मुद्दों पर लगातार घेर रहे हैं.

उनके निशाने पर महंगाई, बेरोजगारी, नीट परीक्षा पेपर लीक, किसानों के हित, दो समुदायों के बीच बढ़ता तनाव, एसआईआर, महिला आरक्षण जैसे मुद्दे रहे हैं.

यानी कांग्रेस की रणनीति सरकार को अंतरराष्ट्रीय और घरेलू मोर्चों पर घेरने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है. सोनिया गांधी जहां विदेश नीति के जरिए सरकार पर सवाल उठा रही हैं, वहीं राहुल गांधी घरेलू मुद्दों के जरिए राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

क्या यह माइंडगेम है या बड़ी राजनीतिक रणनीति?

सोनिया गांधी का लेख सिर्फ गाजा युद्ध पर टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह मोदी सरकार की विदेश नीति की दिशा पर राजनीतिक सवाल भी है. कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि राष्ट्रीय हित और नैतिक नेतृत्व दोनों जरूरी हैं.

विपक्ष के लिए विदेश नीति पर सवाल उठाना सरकार की उस जगह को चुनौती देना है, जिसे अक्सर राष्ट्रीय सहमति का क्षेत्र माना जाता रहा है.

बीजेपी का पलटवार क्या संकेत देता है?

भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि भारत की विदेश नीति संतुलित रही है. बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस विदेश नीति जैसे संवेदनशील मुद्दों को वोट बैंक और ध्रुवीकरण की राजनीति से जोड़ रही है.

बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस को गाजा की चिंता होती है, लेकिन ढाका (बांग्लादेश) में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर वह चुप रहती है.

सोनिया के लेखों का सियासी पैटर्न, कब कब बोला केंद्र पर हमला?

सोनिया गांधी ने मोदी सरकार पर कई मौकों पर अखबारों में ओपिनियन लेख लिखकर निशाना साधा है. उनके लेखों में सरकार की नीतियों, लोकतांत्रिक संस्थाओं, सामाजिक माहौल और अब विदेश नीति तक कई मुद्दे शामिल रहे हैं. साल 2015 में बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखे लेख “Will do anything to hold govt accountable” में उन्होंने मोदी सरकार पर जवाबदेही की कमी, भ्रष्टाचार के आरोपों और सरकार की चुप्पी को लेकर सवाल उठाए थे.

इसके बाद 2021 में द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख “Indian democracy needs to be repaired and revitalised” में उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार के दौर में लोकतांत्रिक संस्थाओं और मूल्यों को नुकसान पहुंचा है.

सितंबर 2022 में द इंडियन एक्सप्रेस में लिखे लेख “Bonds of social harmony deliberately stretched to keep voters polarised for electoral gains” में सोनिया गांधी ने सत्ता के केंद्रीकरण, संस्थाओं की कमजोरी और सामाजिक ध्रुवीकरण को लेकर सरकार पर हमला बोला.

फरवरी 2023 में बजट पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने इसे गरीबों पर “साइलेंट स्ट्राइक” बताया और सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए. अप्रैल 2023 में द हिंदू में प्रकाशित लेख “An enforced silence cannot solve India’s problems” में उन्होंने संसद, मीडिया, संस्थाओं और विपक्ष की भूमिका कमजोर होने का आरोप लगाया.

जून 2026 में द इंडियन एक्सप्रेस में गाजा-इजराइल युद्ध पर लिखे लेख में उन्होंने मोदी सरकार की विदेश नीति और गाजा संकट पर कथित चुप्पी को लेकर सवाल उठाए.

इन लेखों का ट्रेंड देखें तो सोनिया गांधी के हमलों के मुख्य विषय लोकतांत्रिक संस्थाएं, संविधान, सामाजिक सद्भाव, आर्थिक नीतियां, विपक्ष की भूमिका और अब विदेश नीति रहे हैं. इनमें 2022, 2023 और 2026 के लेख सबसे ज्यादा राजनीतिक विवाद और बहस का केंद्र बने.

अहम सवाल

आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या कांग्रेस की यह रणनीति आने वाले चुनावी माहौल में राजनीतिक लाभ दे पाएगी, या विदेश नीति का मुद्दा जनता के बीच उतना असर नहीं डाल पाएगा? यही तय करेगा कि सोनिया गांधी का यह दांव कितना सफल साबित होता है.

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