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क्या कांग्रेस और CJP में चल रहा शह-मात का खेल, INDIA गठबंधन के मार्च के बाद नई रणनीति बनाएंगे दीपके?

SIR विवाद पर कांग्रेस और CJP की रणनीति में क्या अंतर है? INDIA गठबंधन के मार्च, राहुल गांधी की बैठक और CJP के आंदोलन से विपक्षी राजनीति में नए समीकरणों पर नजर.

क्या कांग्रेस और CJP में चल रहा शह-मात का खेल, INDIA गठबंधन के मार्च के बाद नई रणनीति बनाएंगे दीपके?
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दिल्ली में चुनाव आयोग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ उठी आवाज अब सिर्फ इलेक्शन ट्रांसपरेंसी तक सीमित नहीं रही. इसमें अब विपक्षी राजनीति में नेतृत्व, जनसमर्थन और आंदोलन का चेहरा बनने की प्रतिस्पर्धा भी जुड़ती दिख रही है. एक तरफ राहुल गांधी कांग्रेस और INDIA गठबंधन के जरिए इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श , रैली व रोड शो और कानूनी लड़ाई तक ले जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) युवा आंदोलन की ताकत के सहारे अपनी अलग पहचान बनाने में जुटी है. पिछले कुछ महीनों खासकर अक्टूबर में विपक्षी दलों के सियासी अभियानों पर नजर डालें तो साफ है कि कांग्रेस और कॉकरोच जनता पार्टी एसआईआर के मसले पर लीड लेने की होड़ में जुटी है. इसमें कांग्रेस के पक्ष में प्लस प्वाइंट यह है कि उसके साथ विपक्षी पार्टियां भी हैं.

12 अक्टूबर को INDIA गठबंधन के नेताओं ने राहुल गांधी के नेतृत्व में दिल्ली में मार्च निकालकर सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त याचिका दाखिल की. इसके अगले दिन राहुल गांधी ने विपक्षी सांसदों, नागरिक समाज और छात्र संगठनों को हाई-टी पर आमंत्रित किया. वहीं, CJP के नेता भी जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जारी रखने की कोशिश की है. इसी क्रम में सीजेपी आशुतोष रांका और सौरभ दास गुपचुप तरीके से पुलिस बैरिकेड से जंप मारते हुए जंतर मंतर पहुंच गए. लेकिन पहुंचते ही सीजेपी के नेताओं को पुलिस ने फिर हिरासत में ले लिया.

ऐसे में सवाल सिर्फ SIR के विरोध का नहीं, बल्कि इस आंदोलन की दिशा तय करने का भी है. क्या कांग्रेस विपक्षी एकजुटता के जरिए नेतृत्व मजबूत करना चाहती है? क्या CJP अपनी स्वतंत्र आंदोलनकारी पहचान बचाने के लिए नई रणनीति बनाएगी? और क्या दोनों के बीच साझा मुद्दे पर सहयोग के साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है?

क्या कांग्रेस ने आंदोलन को गठबंधन की ताकत बनाया?

6 अक्टूबर को INDIA गठबंधन के सांसदों ने संसद से चुनाव आयोग की ओर मार्च किया. पुलिस ने मार्च को आगे बढ़ने से रोक दिया और राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत कई नेताओं को हिरासत में लिया गया. इसके बाद विपक्षी नेताओं की बैठकों, विरोध प्रदर्शनों और चुनाव आयोग के खिलाफ राजनीतिक लामबंदी का सिलसिला आगे बढ़ा.

अगले दिनों में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और दूसरे विपक्षी नेताओं की सक्रियता ने इस मुद्दे को गठबंधन के साझा एजेंडे में बनाए रखा. 12 अक्टूबर को निकाले गए मार्च में विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं ने भाग लिया. INDIA गठबंधन ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं और SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त याचिका भी दाखिल की. हालांकि, इन आरोपों पर चुनाव आयोग और संबंधित पक्षों का रुख भी महत्वपूर्ण है.

कांग्रेस के लिए इस अभियान का राजनीतिक महत्व यह है कि वह अलग-अलग विपक्षी दलों को एक साझा मुद्दे पर साथ लाने की कोशिश कर रही है. इससे उसे संसद से बाहर भी विपक्ष की आवाज को समन्वित करने का अवसर मिलता है.

क्या राहुल गांधी अब आंदोलन की कमान अपने हाथ में रखेंगे?

13 अक्टूबर को राहुल गांधी की ओर से INDIA गठबंधन के सांसदों, नागरिक समाज और छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों को हाई-टी पर आमंत्रित किया गया. बैठक में SIR के खिलाफ आगे की रणनीति और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर चर्चा होने की संभावना है.

यह कदम ऐसे समय आया है, जब विपक्षी दल एक दिन पहले ही मार्च और संयुक्त याचिका के जरिए अपनी एकजुटता दिखा चुके हैं. कांग्रेस की चुनौती अब इस एकजुटता को आगे बनाए रखने की है. गठबंधन में शामिल दलों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं, इसलिए किसी एक मुद्दे पर साथ आना और लंबे समय तक साझा रणनीति पर कायम रहना अलग-अलग बातें हैं.

राहुल गांधी के सामने यह भी चुनौती होगी कि आंदोलन को केवल राजनीतिक दलों तक सीमित न रहने दिया जाए, बल्कि छात्र संगठनों और नागरिक समाज की भागीदारी भी बनी रहे. हाई-टी बैठक का वास्तविक असर इस बात से तय होगा कि इसके बाद साझा कार्यक्रम, कानूनी पहल और सार्वजनिक संवाद किस रूप में आगे बढ़ते हैं.

टाइमलाइन: 6 से 13 अक्टूबर तक कांग्रेस ने क्या किया?

6 अक्टूबर: INDIA गठबंधन के सांसदों ने चुनाव आयोग तक मार्च किया; राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत कई नेताओं को हिरासत में लिया गया.

7 अक्टूबर: मल्लिकार्जुन खरगे ने विपक्षी सांसदों के लिए लंच आयोजित किया, जिसके बाद सांसदों ने जंतर-मंतर की ओर मार्च करने की कोशिश की.

8 अक्टूबर: राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के सांसदों ने राजघाट पर धरना दिया और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग दोहराई.

9 अक्टूबर: कथित वोट चोरी के मुद्दे पर राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपने और आगे की रणनीति पर चर्चा का कार्यक्रम सामने आया; तारीख और विवरण की पुष्टि जरूरी है.

11 अक्टूबर: राहुल गांधी ने CJP प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए और विरोध के प्रति समर्थन जताया.

12 अक्टूबर: INDIA गठबंधन के नेताओं ने मार्च फॉर डेमोक्रेसी निकाला और सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त याचिका दाखिल की.

13 अक्टूबर: राहुल गांधी ने INDIA गठबंधन के सांसदों, नागरिक समाज और छात्र संगठनों को आगे की रणनीति पर चर्चा के लिए हाई-टी पर आमंत्रित किया.

क्या CJP कांग्रेस से अलग पहचान बनाना चाहती है?

कॉकरोच जनता पार्टी ने पहले NEET विवाद और छात्र समस्याओं को लेकर प्रदर्शनों के जरिए अपनी पहचान बनाई. अब यह संगठन SIR और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहा है. जबकि इस मुद्दे को कांग्रेस ने सबसे पहले उठाया था. CJP के नेताओं अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास ने इस मुद्दे पर आंदोलन जारी रखने का रुख अपनाया है.

10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई और इन नेताओं की हिरासत ने CJP के आंदोलन को चर्चा में ला दिया. 12 अक्टूबर को संगठन के नेताओं ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की कोशिश की. 13 अक्टूबर को भी CJP नेताओं और समर्थकों ने वहां पहुंचकर विरोध दर्ज कराने का प्रयास किया, जिस दौरान कुछ नेताओं को हिरासत में लिया गया.

CJP की राजनीतिक शैली कांग्रेस से अलग है. कांग्रेस के पास संसदीय प्रतिनिधित्व, स्थापित संगठन और INDIA गठबंधन का मंच है. दूसरी ओर, CJP अपनी आंदोलनकारी पहचान और युवाओं से जुड़े मुद्दों के जरिए समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है. दोनों की संगठनात्मक ताकत और राजनीतिक भूमिका एक जैसी नहीं है, लेकिन एक ही मुद्दे पर सक्रियता उनके बीच सार्वजनिक ध्यान हासिल करने की प्रतिस्पर्धा पैदा कर सकती है.

CJP की टाइमलाइन: छात्र आंदोलन से चुनावी मुद्दे तक

6 जून: CJP ने NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं और छात्रों की समस्याओं को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया तथा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की.

20 जून: CJP ने NEET विवाद को लेकर धरना आगे बढ़ाने का ऐलान किया; अनिश्चितकालीन धरने की शुरुआत की तारीख की पुष्टि जरूरी है.

20 जुलाई: CJP से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने परीक्षा व्यवस्था में कथित अनियमितताओं के विरोध में संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की.

2 अक्टूबर: पुलिस से अनुमति नहीं मिलने के कारण CJP ने जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन टाल दिया. जबकि मुंबई के शिवाजी पार्क में सीजेपी ने एसआईआर के खिलाफ. प्रदर्शन किया.

10 अक्टूबर: CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन किया, जिसके दौरान संगठन से जुड़े कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया. हालांकि, अभिषेक दीपके, आशुतोष रांका और सौरभ दास सहित कई नेताओं को पुलिस ने प्रदर्शन स्थल पहुंचने से पहले हिरासत में ले लिया.

13 अक्टूबर: CJP के नेताओं और समर्थकों ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की कोशिश की. पुलिस ने मौके से आशुतोष रांका और सौरव दास को हिरासत में ले लिया.

क्या दोनों के बीच क्रेडिट वॉर जारी है?

SIR के खिलाफ कांग्रेस और CJP की सक्रियता में एक साझा मुद्दा जरूर है, लेकिन उनकी रणनीति और राजनीतिक लक्ष्य को एक मान लेना जल्दबाजी होगी. कांग्रेस इस मुद्दे को विपक्षी दलों की एकजुटता, संसदीय राजनीति और न्यायिक प्रक्रिया से जोड़ रही है. CJP इसे अपने आंदोलन के विस्तार और युवा भागीदारी के नजरिए से उठा रही है. ऐसे में प्रतिस्पर्धा का सवाल तीन स्तरों पर उभरता है.

  • पहला, आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर कौन लगातार चर्चा में बनाए रखता है?
  • दूसरा, छात्रों और नागरिक समाज के बीच किसकी अपील व्यापक होती है?
  • तीसरा, विरोध को आगे की राजनीतिक और संस्थागत कार्रवाई में बदलने की क्षमता किसके पास कितनी है?

हालांकि, इन सवालों के आधार पर किसी एक पक्ष को आगे या पीछे कहना आसान नहीं हैं. कांग्रेस के मार्च में विपक्षी दलों की भागीदारी उसकी गठबंधन क्षमता दिखाती है, जबकि CJP के लगातार विरोध की कोशिश उसकी स्वतंत्र आंदोलनकारी भूमिका को सामने लाती है. दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा की संभावना है, लेकिन इसे स्थापित तथ्य मानने के बजाय बदलते घटनाक्रम के रूप में देखना अधिक उचित होगा.

क्या 12 अक्टूबर के मार्च ने CJP की रणनीति बदली?

INDIA गठबंधन का मार्च और सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त याचिका कांग्रेस के अभियान को राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर आगे ले जाने की कोशिश है. इसके बाद CJP नेताओं की जंतर-मंतर पर सक्रियता को भी उसी व्यापक विरोध के संदर्भ में देखा जा सकता है. लेकिन केवल घटनाओं के क्रम से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कांग्रेस के मार्च के कारण CJP ने अपनी रणनीति बदली.

CJP के लिए अब अहम सवाल यह है कि वह विरोध को किस रूप में आगे बढ़ाती है- नए प्रदर्शन, सार्वजनिक संवाद, कानूनी पहल या छात्र संगठनों के साथ व्यापक समन्वय के जरिए. दूसरी ओर, कांग्रेस को यह दिखाना होगा कि INDIA गठबंधन की एकजुटता केवल बड़े मार्च और बैठकों तक सीमित नहीं है, बल्कि आगे भी साझा कार्यक्रमों में दिखाई देती है.

यहीं से दोनों की रणनीतियों का अंतर स्पष्ट होगा. कांग्रेस को गठबंधन के भीतर सहमति बनाए रखनी है, जबकि CJP को अपनी स्वतंत्र पहचान और आंदोलन की निरंतरता पर ध्यान देना है.

क्या विरोध की राजनीति में बनेगा नया समीकरण?

फिलहाल कांग्रेस और CJP के बीच सीधी राजनीतिक टक्कर से ज्यादा एक साझा मुद्दे पर अलग-अलग रणनीतियों का मामला दिखाई देता है. कांग्रेस के लिए SIR का विरोध विपक्षी एकजुटता को मजबूत करने का अवसर है, जबकि CJP के लिए यह अपने आंदोलन को छात्र मुद्दों से आगे ले जाने का मंच बन सकता है.

आगे की तस्वीर इस बात से स्पष्ट होगी कि राहुल गांधी की हाई-टी बैठक के बाद INDIA गठबंधन क्या साझा कार्यक्रम घोषित करता है और CJP अपने विरोध को किस दिशा में ले जाती है. क्या दोनों पक्ष किसी साझा मंच पर समन्वय करेंगे, या अपने-अपने तरीके से आंदोलन को आगे बढ़ाएंगे? क्या कांग्रेस गठबंधन के जरिए व्यापक राजनीतिक दबाव बनाने पर जोर देगी और CJP स्वतंत्र प्रदर्शन की राह चुनेगी?

इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों की विपक्ष के दोनों गुटों की सियासी गतिविधियों में मिलेंगे. फिलहाल इतना साफ है कि SIR के खिलाफ विरोध ने इलेक्शन ट्रांसपरेंसी की बहस के साथ विपक्षी राजनीति में नेतृत्व, जनभागीदारी और रणनीतिक समन्वय का सवाल भी खड़ा कर दिया है.

राहुल गांधीस्टेट मिरर स्पेशल
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