सोनिया गांधी को 'विदेशी' मानने वाले शरद पवार 27 साल बाद क्यों झुके? क्या करेंगे Congress में घर वापसी
सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़ने वाले शरद पवार 27 साल बाद कांग्रेस के करीब क्यों हैं? जानिए एनसीपी, राहुल गांधी और बदलती राजनीति का पूरा विश्लेषण.
1999 में शरद पवार ने कांग्रेस छोड़ते समय सोनिया गांधी के विदेशी मूल को राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बना दिया था. उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति में सवाल उठाया कि क्या इटली में जन्मी सोनिया गांधी भारत की प्रधानमंत्री बन सकती हैं. इसके बाद उन्हें, पी.ए. संगमा और तारिक अनवर को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया और 10 जून 1999 को एनसीपी का गठन हुआ. लेकिन राजनीति का पहिया ऐसा घूमा कि कुछ ही वर्षों बाद पवार की पार्टी कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए का हिस्सा बन गई और वे 2004 से 2014 तक केंद्र में शक्तिशाली कृषि मंत्री रहे.
अब, बंगाल चुनाव बाद बीजेपी का सत्ता में आती ही वहां ममता बनर्जी की टीएमसी टूट के कगार पर है. तो एनसीपी भी टूट चुकी है और महाराष्ट्र की राजनीति नए दौर में प्रवेश कर चुकी है. सवाल उठ रहा है कि क्या कभी सोनिया गांधी का विरोध करने वाले शरद पवार पूरी तरह कांग्रेस खेमे में लौट रहे हैं? और अगर ऐसा होता है तो राहुल गांधी का रुख क्या होगा?
1999 में क्यों छोड़ी थी कांग्रेस?
क्या आपको याद है कि शरद पवार कभी कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाते थे? कांग्रेस में रहते हुए वे 1978 में महाराष्ट्र के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने. 1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार में रक्षा मंत्री बने और राष्ट्रीय राजनीति में प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदारों में गिने जाने लगे. लेकिन 15 मई 1999 को उन्होंने पी.ए. संगमा और तारिक अनवर के साथ कांग्रेस कार्यसमिति को एक पत्र लिखकर सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाया. उनका तर्क था कि भारत का प्रधानमंत्री जन्म से भारतीय होना चाहिए. इसके बाद कांग्रेस नेतृत्व से टकराव बढ़ा और 10 जून 1999 को उन्होंने एनसीपी का गठन कर लिया.
क्या सोनिया गांधी का विरोध केवल राजनीतिक था?
इस पर वर्षों से बहस होती रही है. शरद पवार ने सार्वजनिक रूप से विदेशी मूल को मुद्दा बनाया, लेकिन कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मामला केवल इतना भर नहीं था. उस समय कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर भी संघर्ष चल रहा था. पवार राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहते थे और उन्हें लगता था कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में उनकी राजनीतिक संभावनाएं सीमित हो सकती हैं. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा में भी संकेत दिया है कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा इस विवाद का एक बड़ा कारण थी. इसलिए विदेशी मूल का मुद्दा वैचारिक होने के साथ-साथ राजनीतिक भी था.
फिर कैसे करीब आए पवार और कांग्रेस?
क्या राजनीति में स्थायी दुश्मनी संभव है? भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि ऐसा कम ही होता है. 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार बनी और एनसीपी उसका हिस्सा बन गई. शरद पवार को कृषि मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण विभाग मिला. वे लगातार दस वर्षों तक केंद्र सरकार में मंत्री रहे. महाराष्ट्र में भी कांग्रेस और एनसीपी ने 1999 से 2014 तक मिलकर सरकार चलाई. यानी जिस पार्टी से पवार विदेशी मूल के मुद्दे पर अलग हुए थे, उसी के साथ उन्होंने डेढ़ दशक तक सत्ता साझा की.
क्या बीजेपी का उभार बना नजदीकी की वजह?
2014 के बाद भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव आया. भाजपा ने लोकसभा और महाराष्ट्र दोनों जगह अपनी स्थिति मजबूत की. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. इसके बाद विपक्षी दलों के सामने भाजपा को चुनौती देने की रणनीति बनाने की जरूरत महसूस हुई. 2019 में महाविकास आघाड़ी का गठन इसी राजनीतिक सोच का परिणाम था, जिसमें कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) एक साथ आए. इससे कांग्रेस और पवार के रिश्ते पहले से ज्यादा मजबूत हुए.
महाराष्ट्र की राजनीति में क्या है पवार की मजबूरी?
क्या एनसीपी के विभाजन ने शरद पवार को कांग्रेस के और करीब ला दिया है? जुलाई 2023 में अजित पवार अपने समर्थक विधायकों के साथ अलग हो गए. चुनाव आयोग ने बाद में एनसीपी का नाम और चुनाव चिन्ह भी अजित पवार गुट को दे दिया. इससे शरद पवार की राजनीतिक ताकत को बड़ा झटका लगा. ऐसे में महाराष्ट्र में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए कांग्रेस के साथ सहयोग उनके लिए और महत्वपूर्ण हो गया. महाविकास आघाड़ी आज भी उनके राजनीतिक अस्तित्व का सबसे बड़ा आधार है.
क्या कांग्रेस में घर वापसी संभव है?
क्या शरद पवार अपनी अलग पार्टी का अस्तित्व खत्म कर कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं? फिलहाल इसकी संभावना कम दिखाई देती है. पवार ने 1999 में जिस एनसीपी की स्थापना की थी, वह उनकी राजनीतिक पहचान का हिस्सा है. हालांकि, उनकी पार्टी का प्रभाव पहले की तुलना में कम हुआ है, लेकिन वे अब भी स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व बनाए रखना चाहते हैं. इसलिए औपचारिक विलय की संभावना सीमित नजर आती है, लेकिन राजनीतिक सहयोग लगातार बढ़ सकता है.
कब उठाया था विदेशी मूल का मुद्दा?
मई 1999 में शरद पवार, पी.ए. संगमा और तारिक अनवर ने कांग्रेस नेतृत्व को पत्र लिखकर सोनिया गांधी के विदेशी मूल का सवाल उठाया था. उन्होंने कहा था कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र का नेतृत्व ऐसे व्यक्ति को मिलना चाहिए जिसका जन्म भारत में हुआ हो. इसके बाद कांग्रेस ने तीनों नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की. 10 जून 1999 को एनसीपी का गठन हुआ और विदेशी मूल का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति की बड़ी बहस बन गया.
2004 में सोनिया क्यों नहीं बन पाईं पीएम?
2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन को बहुमत मिला था. कांग्रेस संसदीय दल ने सोनिया गांधी को नेता चुन लिया था और उनके प्रधानमंत्री बनने की पूरी संभावना थी. लेकिन बीजेपी और कई विपक्षी नेताओं ने विदेशी मूल का मुद्दा फिर उठाया. हालांकि संविधान के अनुसार सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने में कोई कानूनी बाधा नहीं थी क्योंकि वह भारतीय नागरिक थीं. इस बीच सुब्रह्मण्यम स्वामी तत्कालीन राष्ट्रपति से मिले और सोनिया गांधी के पीएम बनने को लेकर कानूनी पेचीदगी का मुद्दा उठाया.
उसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने सोनिया गांधी को मुलाकात इस मसले को उनके सामने रखा. राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद सोनिया गांधी ने खुद पीएम बनने का फैसला टाल दिया. उन्होंने खुद की जगह डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का फैसला किया. उनके इस फैसले से प्रणब मुखर्जी नाराज हुए. बाद में उन्हें देश का राष्ट्रपति बनाया गया. इस घटना के बाद सोनिया को लेकर जारी विदेशी मूल का विवाद लगभग समाप्त हो गया.
अब क्या राहुल मान जाएंगे बात?
उसके बाद मोदी देश के पीएम बनेत्र. वह लगातार 12 साल से पीएम है. अब सवाल यह उठाता है, क्या राहुल गांधी बदले राजनीतिक माहौल में शरद पवार की किसी संभावित राजनीतिक पहल का समर्थन करेंगे? हाल के वर्षों में राहुल गांधी और शरद पवार कई विपक्षी बैठकों और इंडिया गठबंधन के मंचों पर साथ दिखाई दिए हैं. दोनों नेताओं का साझा लक्ष्य बीजेपी के खिलाफ मजबूत विपक्ष तैयार करने का रखा है.
कांग्रेस भी क्षेत्रीय सहयोगियों को साथ लेकर चलने की रणनीति पर काम कर रही है. ऐसे में यदि भविष्य में कांग्रेस और पवार खेमे के रिश्ते और मजबूत होते हैं तो राहुल गांधी की ओर से किसी बड़े विरोध की संभावना कम दिखाई देती है. हालांकि, पार्टी विलय या घर वापसी जैसे किसी भी फैसले का निर्धारण राजनीतिक परिस्थितियां ही करेंगी.
आखिर 27 साल बाद क्यों बदली तस्वीर?
क्या शरद पवार सचमुच झुक गए हैं? राजनीति के जानकार इसे झुकना नहीं बल्कि बदलती परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बदलना मानते हैं. 1999 में जिस विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस और पवार अलग हुए थे, वह आज राष्ट्रीय राजनीति का केंद्रीय मुद्दा नहीं है. अब विपक्षी एकता, बीजेपी को चुनौती देना और क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व बचाए रखना ज्यादा महत्वपूर्ण बन चुका है. यही कारण है कि कभी सोनिया गांधी के विदेशी मूल का विरोध करने वाले शरद पवार आज कांग्रेस के सबसे करीबी राजनीतिक सहयोगियों में गिने जाते हैं. टीएमसी टूट के कगार पर है. कांग्रेस के साथ अब क्षेत्रीय दल भी बीजेपी के निशाने पर हैं. ऐसे में इस बात की संभावना जताई जा रही है कि शरद पवार घर वापसी कर सकते हैं, लेकिन किसी भी पक्ष ने आधिकारिक तौर पर ऐसे संकेत नहीं दिए हैं.




