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अब यूं ही नहीं उठाएगी पुलिस! सुप्रीम कोर्ट की दो टूक, ‘सिर्फ पूछताछ के लिए नहीं कर सकते गिरफ्तार'

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 7 साल तक सजा वाले अपराधों में पुलिस को सीधे गिरफ्तारी नहीं करनी चाहिए. ऐसे मामलों में पहले आरोपी को BNSS धारा 35(3) के तहत नोटिस देना अनिवार्य होगा.

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( Image Source:  Create By AI Sora )
रूपाली राय
Edited By: रूपाली राय

Published on: 6 Feb 2026 8:46 AM

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक बहुत अहम फैसला सुनाया है, जो नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 35 से जुड़ा है. इस फैसले में कोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि पुलिस को हर बार किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने की जरूरत नहीं होती, खासकर तब जब अपराध में अधिकतम 7 साल तक की सजा हो सकती हो.

अगर अपराध ऐसा है जिसमें 7 साल या उससे कम सजा हो सकती है, तो पुलिस को पहले आरोपी व्यक्ति को धारा 35(3) के तहत एक नोटिस देना जरूरी है. इस नोटिस में कहा जाता है कि व्यक्ति को जांच के लिए पुलिस के सामने हाजिर होना है. नोटिस देना अनिवार्य है, यानी बिना नोटिस दिए सीधे गिरफ्तारी नहीं की जा सकती.

गिरफ्तारी अब अपवाद है, नियम नहीं

कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी पुलिस के लिए कोई अनिवार्य काम नहीं है. यह सिर्फ एक वैधानिक अधिकार है, जिसका इस्तेमाल तब किया जा सकता है जब जांच के लिए यह बिल्कुल जरूरी हो. पुलिस सिर्फ इसलिए गिरफ्तार नहीं कर सकती कि 'मुझे पूछताछ करनी है' या 'मुझे सुविधा होगी'. गिरफ्तारी को जांच में मदद के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन यह कोई रूटीन काम नहीं होना चाहिए.

पुलिस को खुद से सवाल पूछना होगा

जांच करते समय पुलिस अधिकारी को खुद से यह सोचना और तय करना होगा कि 'क्या इस व्यक्ति को गिरफ्तार करना सच में जरूरी है?'अगर जरूरी नहीं है, तो बिना गिरफ्तारी के भी जांच चल सकती है. आरोपी को नोटिस देकर बुलाया जा सकता है, और अगर वह आ जाता है और जांच में सहयोग करता है, तो गिरफ्तारी की कोई जरूरत नहीं पड़ती.

गिरफ्तारी की शक्ति का दुरुपयोग रोकना

कोर्ट ने जोर दिया कि भले ही धारा 35(1)(b) में बताई गई कुछ शर्तें पूरी हो रही हों (जैसे कि आरोपी ने अपराध किया हो और जांच में रुकावट डाल सकता हो), तब भी गिरफ्तारी तभी होनी चाहिए जब यह पूरी तरह से आवश्यक हो. पुलिस को गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे, और सिर्फ कारण लिख देने से नोटिस की जरूरत खत्म नहीं हो जाती.

वरिष्ठ वकील की राय

कोर्ट में एमिकस क्यूरी (अदालत की मदद करने वाले वकील) के रूप में सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि धारा 35(3) के तहत नोटिस देना पूरी तरह अनिवार्य है. इसे सिर्फ कारण लिखकर टाला नहीं जा सकता.

संक्षेप में कोर्ट का मुख्य संदेश:

-7 साल तक सजा वाले अपराधों में नोटिस देना नियम है

-गिरफ्तारी अपवाद है और केवल तब होनी चाहिए जब जांच के लिए यह बिल्कुल जरूरी हो

-पुलिस को मनमाने ढंग से गिरफ्तारी नहीं करनी चाहिए. व्यक्ति की आजादी बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए गिरफ्तारी को अंतिम उपाय की तरह इस्तेमाल करना चाहिए

यह फैसला आम लोगों के लिए राहत की बात है, क्योंकि इससे पुलिस की मनमानी कम होगी और जांच ज्यादा निष्पक्ष तरीके से चलेगी।. कोर्ट ने साफ कहा है कि जांच बिना गिरफ्तारी के भी अच्छी तरह चल सकती है.

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