Notebandi याद है... SIR को लेकर यूं ही नहीं घिरा है चुनाव आयोग, योगेंद्र यादव ने इसे क्यों बताया Votebandi, कहा- सरकार चुन रही वोटर
SIR पर योगेंद्र यादव ने इसे ‘Votebandi’ बताया. उनका सवाल है कि वोटर सरकार चुनता है या सरकार तय करती है कि कौन वोटर रहेगा. जानिए वोटर लिस्ट, नाम हटाने की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर उठे सवाल.
क्या भारत का लोकतंत्र एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है? क्या इलेक्शन अब सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गए हैं? क्या एसआईआर की प्रक्रिया तय योजनाओं के तहत मतदाताओं का एक्सक्लूजन है? स्टेट मिरर के जीतेंद्र चौहान के साथ इस मुद्दे पर बातचीत में योगेंद्र यादव का दिल्ली एसआईआर विवाद के बीच इस प्रक्रिया पर तल्ख और विस्तार से अपना पक्ष रखा. साथ ही कहा कि कैसे देश की मौजूदा राजनीति और चुनावी व्यवस्था की वजह से देश में तय फार्मूले के तहत बड़े बदलाव आए हैं.
क्या SIR सिर्फ वोटर लिस्ट रिवीजन है?
इस सवाल के जवाब में सैफोलॉजिस्ट (पसेफोलॉजिस्ट) योगेंद्र यादव ने SIR को लेकर कहा कि सबसे बुनियादी सवाल यही है कि क्या यह सामान्य वोटर लिस्ट रिवीजन की प्रक्रिया है या इसकी प्रकृति उससे अलग है. चुनावी मामलों के कार्यकर्ता और SIR के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने वाले योगेंद्र यादव का कहना है कि SIR को महज वोटर लिस्ट के संशोधन के रूप में देखना सही नहीं है. उनके मुताबिक, यह मौजूदा वोटर लिस्ट में नामों की सामान्य जांच-पड़ताल नहीं, बल्कि नए सिरे से वोटर लिस्ट तैयार करने जैसी प्रक्रिया है.
योगेंद्र यादव के मुताबिक, अब तक वोटर लिस्ट में दर्ज व्यक्ति के नाम के बने रहने की स्वतः गारंटी नहीं है. उनका दावा है कि व्यक्ति को दोबारा यह साबित करने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है कि वह वोटर लिस्ट में शामिल होने का पात्र है. उनके शब्दों में, यदि तय समय में आवेदन नहीं पहुंचा तो वोटर का नाम प्रभावित हो सकता है.
SIR में बदला क्या है?
योगेंद्र यादव इस बदलाव को वोटर लिस्ट की प्रक्रिया में एक बड़े परिवर्तन के रूप में देखते हैं. उनका तर्क है कि पहले सामान्य व्यवस्था यह थी कि व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में दर्ज है तो उसके नाम को हटाने के लिए कोई आधार या आपत्ति सामने आनी चाहिए. इसके बाद जांच की प्रक्रिया होती थी.
यादव के मुताबिक SIR में प्रक्रिया का तौर तरीका ही उलट दिया गया है. उनका कहना है कि अब पहले से सूची में मौजूद मतदाता को भी अपनी पात्रता साबित करने के लिए नए सिरे से प्रक्रिया पूरी करनी पड़ रही है.
उन्होंने इसे समझाने के लिए कहा कि क्या आपको नोटबंदी याद है?
एसआईआर भी ठीक उसी तरीके से ‘वोटबंदी’ है. आगे कहा कि सामान्य लोकतांत्रिक व्यवस्था में वोटर सरकार चुनता है, जबकि उनकी नजर में SIR के जरिए यह सवाल पैदा हो रहा है कि कौन वोटर सूची में रहेगा और कौन नहीं. जब वोटर लिस्ट में उन्हीं के पसंद के होंगे तो जब भी चुनाव होगा उन्हीं की सरकार सत्ता में आएगी.
इतने नाम क्यों हट रहे हैं?
SIR को लेकर सबसे बड़ा सवाल हटाए गए नामों की संख्या को लेकर है. योगेंद्र यादव ने दावा किया कि अब तक देश में करीब 6 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं और प्रक्रिया पूरी होने तक यह संख्या 9 से 10 करोड़ तक पहुंच सकती है.
उन्होंने अपने अनुमान का आधार बताते हुए कहा कि उनके अनुसार देश के करीब 60 प्रतिशत हिस्से में SIR की प्रक्रिया हो चुकी है. यदि उस हिस्से में बड़ी संख्या में नाम हटे हैं, तो पूरे देश में प्रक्रिया पूरी होने के बाद संख्या और बढ़ सकती है.
हालांकि, यह आंकड़े यादव द्वारा दिए गए अनुमान हैं और इन्हें चुनाव आयोग के आधिकारिक अंतिम आंकड़े के रूप में नहीं पेश किया जाना चाहिए.
क्या इतनी बड़ी संख्या में नाम गलत थे?
यादव का अगला सवाल यही है कि अगर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं तो यह पता कैसे चलेगा कि वे नाम वास्तव में गलत या अपात्र थे. उनका कहना है कि इसका एक स्वतंत्र तरीके से आकलन देश की वयस्क आबादी और वोटर लिस्ट के आंकड़ों की तुलना करके किया जा सकता है. उन्होंने इंटरव्यू में दावा किया कि भारत की 18 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी करीब 101 करोड़ के आसपास है, जबकि SIR से पहले वोटर लिस्ट में लगभग 99 करोड़ नाम थे.
यादव के मुताबिक यदि SIR के बाद मतदाताओं की संख्या करीब 90 करोड़ रह जाती है तो लगभग 10 करोड़ लोगों के नाम कम होने का सवाल उठेगा. उनका सवाल है कि यदि ये लोग वास्तव में अपात्र थे तो उनकी संख्या और स्थिति का स्वतंत्र आधार क्या है?
घुसपैठियों का सवाल कितना बड़ा है?
उन्होंने ये भी कहा कि SIR के समर्थन में अक्सर अवैध विदेशी नागरिकों को वोटर लिस्ट से बाहर करने की जरूरत का तर्क दिया जाता है. योगेंद्र यादव भी मानते हैं कि किसी विदेशी नागरिक का भारतीय वोटर लिस्ट में होना उचित नहीं है. लेकिन उनका सवाल यह है कि हटाए गए नामों में वास्तव में कितने लोग विदेशी या घुसपैठिए पाए गए.
उन्होंने बिहार का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां शुरुआत में 65 लाख और बाद में करीब 44 लाख नाम हटाए जाने की बात सामने आई. यादव का दावा है कि उन्होंने चुनाव आयोग से यह जानने की कोशिश की कि इन हटाए गए नामों में कितने विदेशी नागरिक थे, लेकिन उन्हें इसका स्पष्ट आंकड़ा नहीं मिला. इसी तरह उन्होंने पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में नाम हटने का जिक्र करते हुए पूछा कि उनमें से कितने लोग वास्तव में विदेशी नागरिक पाए गए.
यहां उनके बयान का केंद्रीय सवाल यह है कि अगर SIR का एक प्रमुख उद्देश्य अवैध विदेशी नागरिकों की पहचान करना है, तो हटाए गए नामों की श्रेणीवार जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती.
बिहार के आंकड़ों पर क्या सवाल?
सैफोलॉजिस्ट योगेंद्र यादव ने बिहार में विदेशी नागरिकों की पहचान से जुड़े एक आंकड़े का भी उल्लेख किया. उन्होंने इंटरव्यू में दावा किया कि करीब 5,700 लोगों की पहचान विदेशी के रूप में हुई और इनमें बड़ी संख्या नेपाल की महिलाओं की थी.
इस दावे को उन्होंने इस सवाल से जोड़ा कि यदि SIR में लाखों नाम हटाए गए तो विदेशी नागरिकों की संख्या उसकी तुलना में कितनी है. उनके अनुसार इस अंतर को सार्वजनिक आंकड़ों के जरिए स्पष्ट किया जाना चाहिए.
असम में SIR क्यों नहीं?
योगेंद्र यादव के तर्क का अगला हिस्सा असम को लेकर है. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि अवैध विदेशी नागरिकों की पहचान SIR के प्रमुख उद्देश्यों में है तो असम जैसे राज्य में यही प्रक्रिया क्यों नहीं कराई?
SIR पर असली बहस क्या है?
योगेंद्र यादव के पूरे तर्क को देखें तो उनकी आपत्ति केवल SIR से हटाए गए नामों की संख्या तक सीमित नहीं है. उनका मुख्य सवाल प्रक्रिया की प्रकृति, नाम हटाने के आधार और पारदर्शिता से जुड़ा है.
उनके अनुसार यदि बड़ी संख्या में नाम हटाए जा रहे हैं तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि नाम किस आधार पर हटे, कितने लोग मृत पाए गए, कितने स्थानांतरित हो चुके थे, कितने दोहरी प्रविष्टि वाले थे और कितने विदेशी नागरिक पाए गए.
यही वह बिंदु है जहां SIR की बहस राजनीतिक आरोपों से आगे बढ़कर आंकड़ों और प्रक्रिया की पारदर्शिता का सवाल बनती है. यादव का तर्क है कि किसी भी बड़े चुनावी पुनरीक्षण की भरोसा इस बात से तय होगी कि उसके तहत हटाए गए नामों के कारण और आंकड़े कितने स्पष्ट रूप से सार्वजनिक किए जाते हैं.




