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Delhi SIR में कहां फंसा सिस्टम? Bengal से कितना मिलता-जुलता है मामला, BLO की भूमिका पर सवाल

Delhi SIR में voter list से बड़े पैमाने पर नाम हटने, Logical Discrepancy, BLO verification और Supreme Court में उठे सवालों ने नई बहस छेड़ दी है. Bengal SIR से तुलना के बीच समझिए पूरी प्रक्रिया, आंकड़े और विवाद.

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Delhi SIR News: दिल्ली SIR में मतदाता सूची से लाखों नाम बाहर होने और ‘Logical Discrepancy’ के आधार पर नोटिस जारी होने के बाद अब तुलना पश्चिम बंगाल SIR से हो रही है. सवाल सिर्फ इतने नाम हटने का नहीं, बल्कि उस एसआईआर प्रोसेस का है जिसके तहत किसी मतदाता के रिकॉर्ड में कमियां को नोट की गई हैं. बंगाल SIR में भी पुराने चुनावी रिकॉर्ड की mapping के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के डेटा में mismatch सामने आया था. वहां लाखों लोगों ने नाम बहाल कराने के लिए अपील की और कई मामलों में बाद में नाम वापस जोड़े गए. ऐसे में दिल्ली में BLO की भूमिका, रिकॉर्ड सत्यापन और मतदाताओं को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के अवसर पर बहस और कानूनी जंग का विषय बन गया है.

दरअसल, फरवरी 2025 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय चुनाव आयोग की मतदाता सूची में करीब 1.56 करोड़ मतदाता थे. इनमें से 94.9 लाख लोगों ने मतदान किया था. अब SIR के बाद तैयार ड्राफ्ट मतदाता सूची में करीब 97.5 लाख मतदाता ही बचे हैं.

डेटा मिसमैच कैसे?

बाकी बचे 47.7 लाख मतदाताओं को एबसेंट, ट्रांसफर, डेड, डुप्लिकेट और अन्य (ASDDO) श्रेणियों में क्लासीफाइड किया गया था. परिणामस्वरूप उनके नाम मसौदा मतदाता सूची फिलहाल शामिल नहीं हैं.

यानी 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद मतदाता सूची में दर्ज करीब 58.5 लाख नाम अब ड्राफ्ट सूची में नहीं हैं. बताया जा रहा है कि 11 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही रिविजन के दौरान हट गए थे.

यहीं से दिल्ली SIR का पहला बड़ा सवाल पैदा होता है. क्या पिछले विधानसभा चुनाव के बाद इतनी बड़ी संख्या में लोग दिल्ली से बाहर चले गए? या फिर ऐसे मतदाता भी ड्राफ्ट सूची से बाहर हो गए जो अभी भी दिल्ली के सामान्य निवासी हैं?

इतना ही नहीं, 70 में से 24 विधानसभा सीटों में मतदाताओं का नया गणित और ज्यादा अहम हो गया है. दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 24 ऐसी हैं, जहां SIR के बाद तैयार ड्राफ्ट मतदाता सूची में मतदाताओं की संख्या फरवरी 2025 के विधानसभा चुनाव में वास्तव में मतदान करने वाले मतदाताओं से भी कम है.

इसका मतलब क्या?

इसका मतलब यह नहीं है कि इन 24 सीटों के सभी पुराने मतदाता हट गए हैं या सभी हटाए गए नाम गलत हैं. लेकिन आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि इन सीटों पर ड्राफ्ट रोल और पिछले चुनाव के वास्तविक मतदान के बीच असामान्य रूप से कम अंतर है.

इस गणित को जहां दिल्ली के मतदाताओं के लिए समझना जरूरी है, वहीं चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वो आंकड़ों को सही तरीके से सामने रखा जाए. 2025 के चुनाव में 94.9 लाख लोगों ने वोट डाला था. इनमें से किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में था, तभी वह मतदान कर सका. इसलिए SIR के बाद किसी विधानसभा क्षेत्र की पूरी ड्राफ्ट सूची का आकार पिछले चुनाव में हुए मतदान से नीचे जाना अपने आप में यह सवाल पैदा करता है कि इतनी बड़ी संख्या में मतदाता आखिर कहां गए.

दिल्ली एसआईआर ड्राफ्ट केवल इन आंकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि गलत तरीके से नाम काटे गए हैं. मतदाता सूची और मतदान करने वालों की संख्या दो अलग-अलग चीजें हैं. हर पंजीकृत मतदाता मतदान नहीं करता. इसी तरह SIR के दौरान मृतक, स्थायी रूप से स्थानांतरित, डुप्लीकेट या दूसरे स्थान पर पंजीकृत मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं. इसलिए असली सवाल हटाए गए नामों की कुल संख्या से ज्यादा यह है कि प्रत्येक नाम हटाने के पीछे सत्यापन क्या था?

BLO की भूमिका पर सवाल कैसे?

SIR के दौरान Booth Level Officers यानी BLOs को घर-घर जाकर मतदाताओं की जानकारी जुटाने, Enumeration Form की प्रक्रिया पूरी कराने और मतदाता के वर्तमान निवास तथा पुराने रिकॉर्ड का मिलान करने का काम करना था. अगर किसी मतदाता का घर बंद मिला, वह अस्थायी रूप से बाहर था, फॉर्म जमा नहीं हुआ या पुराने रिकॉर्ड से उसका mapping नहीं हो पाया, तो उसके रिकॉर्ड की आगे जांच जरूरी हो जाती है.

इसलिए दिल्ली SIR में सवाल यह नहीं है कि BLO ने नाम काट दिए. BLO अंतिम रूप से मतदाता का नाम हटाने वाला अधिकारी नहीं है. लेकिन BLO द्वारा जुटाई गई जमीनी जानकारी पूरी प्रक्रिया की शुरुआती कड़ी जरूर है. ऐसे में सवाल उठता है कि कितने मतदाता वास्तव में घर पर नहीं मिले, कितने दूसरे पते पर चले गए और कितने मामलों में केवल रिकॉर्ड mismatch के कारण अतिरिक्त सत्यापन की जरूरत पड़ी.

दिल्ली SIR में इसी प्रक्रिया से जुड़ा दूसरा बड़ा विवाद 'No Mapping' और 'Logical Discrepancy' का है. ड्राफ्ट सूची के बाद लाखों मतदाताओं के रिकॉर्ड में इन श्रेणियों के आधार पर सवाल उठे.

यहां सबसे अहम बात यह है कि किसी मतदाता के रिकॉर्ड में discrepancy मिलना अपने आप में उसे अपात्र साबित नहीं करता. उसे यह जानने का अधिकार है कि उसके रिकॉर्ड में कौन-सी जानकारी मेल नहीं खा रही है और उसे अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए क्या दस्तावेज या जानकारी देनी होगी. यही मुद्दा दिल्ली SIR को पश्चिम बंगाल के SIR से जोड़ता है.

दिल्ली SIR बंगाल से कनेक्शन क्या?

बंगाल में भी SIR के दौरान पुराने मतदाता रिकॉर्ड से mapping, No Mapping और Logical Discrepancy जैसी श्रेणियों के आधार पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच हुई. वहां भी सवाल उठा कि रिकॉर्ड में विसंगति मिलने और किसी व्यक्ति को मतदाता सूची से बाहर करने के बीच सत्यापन और सुनवाई की प्रक्रिया कितनी स्पष्ट और पारदर्शी है.

लेकिन दिल्ली और बंगाल को पूरी तरह एक जैसा मामला मानना सही नहीं होगा. दोनों राज्यों की आबादी, मतदाता संख्या, पुराने चुनावी रिकॉर्ड और SIR की परिस्थितियां अलग हैं. समानता मुख्य रूप से प्रक्रिया में है- पुराने रिकॉर्ड से mapping, घर-घर verification, discrepancy की पहचान, नोटिस और उसके बाद claims तथा objections की प्रक्रिया.

बंगाल SIR में Logical Discrepancy के कितने मामले?

बंगाल SIR में शुरुआती चरण में करीब 1.36 करोड़ मतदाताओं को “Logical Discrepancy” के तहत चिन्हित किया गया था. बाद की जांच के बाद यह संख्या घटकर करीब 91.46 लाख रह गई. हालांकि इन सभी को अपात्र मतदाता नहीं माना गया. SIR के बाद करीब 27.16 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, जिनमें से 22.21 लाख ने नाम बहाल कराने के लिए अपील की.

चुनाव से पहले सिर्फ 1,607 नाम ही बहाल हो पाए, क्योंकि बड़ी संख्या में अपील पर फैसला लंबित था. इसका सीधा असर 2026 के विधानसभा चुनाव पर पड़ा और लंबित मामलों वाले कई मतदाता मतदान नहीं कर सके.

बाद में 7 अगस्त 2026 तक जिन अपीलों पर फैसला हुआ, उनमें 75,443 लोगों के नाम मतदाता सूची में बहाल किए गए, जबकि 7,339 अपीलें खारिज हुईं. यानी जिन मामलों पर फैसला हुआ, उनमें करीब 91% नाम बहाल किए गए. बावजूद इसके इसे पूरे 91.46 लाख Logical Discrepancy मामलों का परिणाम नहीं माना जा सकता, ऐसा इसलिए कि अन्य मामलों में अभी फैसला सामने नहीं आया है.

चुनाव आयोग की ओर से जारी आंकड़े क्या?

  • फरवरी 2025 में दिल्ली के रोल में 1,56,26,736 मतदाता थे.
  • इनमें 94,88,376 लोगों ने वोट डाला, यानी मतदान प्रतिशत 60.72% था.
  • 31 अगस्त 2026 के SIR ड्राफ्ट में 97,53,577 मतदाता हैं.
  • यानी अभी ड्राफ्ट रोल में 2025 के वास्तविक मतदान से सिर्फ 2,65,201 अधिक नाम हैं.
  • SIR से पहले सामान्य revision में 11,16,437 नाम हटे थे और SIR ड्राफ्ट में इसके बाद 47,56,722 नाम बाहर हुए. दोनों को मिलाकर 2025 की सूची से करीब 58.73 लाख नाम कम हैं.
  • 47,56,722 excluded electors को ASDD यानी Absent, Shifted, Dead, Duplicate श्रेणी में रखा गया.
  • ड्राफ्ट में रहते हुए 33,12,919 मतदाताओं को नोटिस के लिए चिह्नित किया गया है. इनमें 13,79,785 No Mapping और 19,33,134 Logical Discrepancy से जुड़े हैं.

SC तक क्यों पहुंचा दिल्ली SIR का मामला?

दिल्ली का मामला सुप्रीम कोर्ट तक इसलिए पहुंचा क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने खास तौर पर नोटिस और discrepancy की जानकारी को लेकर सवाल उठाए. उनका कहना है कि अगर लाखों मतदाताओं को नोटिस दिया जा रहा है तो उन्हें यह स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि उनके रिकॉर्ड में समस्या क्या मिली है और उसे दूर करने के लिए उन्हें क्या करना है? यानी दिल्ली SIR की पूरी कहानी को केवल '58.5 लाख नाम कट गए' के आंकड़े से समझना अधूरा होगा. असली सवाल चार स्तरों पर है-

  • पहला, इतने बड़े पैमाने पर नाम हटने का कारण क्या है?
  • दूसरा, 24 विधानसभा सीटों में ड्राफ्ट मतदाता संख्या पिछले चुनाव के वास्तविक मतदान से भी कम क्यों हो गई?
  • तीसरा, BLO स्तर पर घर-घर सत्यापन कितना सटीक रह?
  • चौथा, जिन मतदाताओं के रिकॉर्ड में No Mapping या Logical Discrepancy मिली, उन्हें अपना पक्ष स्पष्ट करने का पर्याप्त और स्पष्ट अवसर कैसे दिया जा रहा है.

यही वह बिंदु है जहां दिल्ली SIR का गणित, प्रशासनिक प्रक्रिया और कानूनी विवाद एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं.

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