Begin typing your search...

लोकतंत्र की हीरो-नोबेल प्राइज भी जीता, वो विदेशी नेता जिसका 24 Akbar Road से है गहरा कनेक्शन

Aung San Suu Kyi दिल्ली विश्वविद्यालय की स्टूडेंट रही हैं. उनकी मां नई दिल्ली में म्यांमार की राजदूत थीं. नोबेल विजेता आंग सान सू की का 24 अकबर रोड से क्या कनेक्शन है? जानिए म्यांमार की लोकतंत्र की हीरो के संघर्ष, भारत से रिश्ते और विवादों की पूरी कहानी.

लोकतंत्र की हीरो-नोबेल प्राइज भी जीता, वो विदेशी नेता जिसका 24 Akbar Road से है गहरा कनेक्शन
X
( Image Source:  Aung San Suu Ky Facebook )

हाल ही में केंद्र सरकार ने मुख्य Congress को उसके 24 अकबर रोड स्थित दफ्तर को 28 मार्च तक खाली करने के लिए कहा है. यह बंगला पिछले 48 सालों से कांग्रेस का मुख्यालय रहा है. पिछले साल पार्टी ने कोटला मार्ग पर अपना नया मुख्यालय 'इंदिरा भवन' शुरू किया था, लेकिन इसके बावजूद अकबर रोड स्थित परिसर अभी तक खाली नहीं किया गया है और वहां पार्टी की गतिविधियां जारी हैं. कांग्रेस को 5, रायसीना रोड स्थित इंडियन यूथ कांग्रेस के दफ्तर को भी खाली करने के लिए कहा गया है. इस मामले में राहत पाने के लिए कांग्रेस कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है. इस बीच नोबेल पुरस्कार विजेता Aung San Suu Kyi भी चर्चा में आ गई है. वर्तमान में वह म्यामांर के एक जेल में हैं.

फरवरी 2021 में म्यांमार सैन्य तख्तापलट 2021 के बाद सेना (Junta) ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था और तब से वे लगातार जेल में हैं. बाद में उन पर कई मामलों (भ्रष्टाचार, चुनावी गड़बड़ी, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून आदि) में मुकदमे चलाए गए और उन्हें लंबी सजा सुनाई गई.

दअअसल, दुनिया की राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो संघर्ष, उम्मीद और विवाद का प्रतीक बन जाते हैं. आंग सान सू की (Aung San Suu Kyi) ऐसा ही एक नाम है. उन्हें कभी “लोकतंत्र की वैश्विक हीरो” कहा गया, उन्होंने नोबेल शांति पुरस्कार जीता, लेकिन बाद के वर्षों में उनका राजनीतिक सफर विवादों में भी घिर गया. दिलचस्प बात यह है कि उनका एक गहरा कनेक्शन भारत की राजनीति के केंद्र - 24 अकबर रोड (कांग्रेस मुख्यालय) से भी जुड़ा रहा है.

म्यांमार की ‘लोकतंत्र की बेटी’ कैसे बनीं वैश्विक चेहरा?

आंग सान सू की का जन्म 1945 में हुआ. उनके पिता आंग सान म्यांमार (तब बर्मा) के स्वतंत्रता सेनानी थे. बचपन से ही राजनीतिक माहौल में पली-बढ़ीं सू की ने पढ़ाई के लिए भारत और बाद में ब्रिटेन का रुख किया.

1988 में जब म्यांमार में सैन्य शासन के खिलाफ बड़ा जनआंदोलन हुआ, तब सू की देश लौटीं और लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवाज बनकर उभरीं. उन्होंने नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) का नेतृत्व संभाला और सेना के खिलाफ अहिंसक आंदोलन शुरू किया.

नोबेल शांति पुरस्कार : संघर्ष को कैसे मिला वैश्विक सम्मान?

सू की के शांतिपूर्ण आंदोलन और लोकतंत्र की लड़ाई को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया. 1991 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उस समय वे नजरबंद थीं, इसलिए पुरस्कार उनके परिवार ने उनकी ओर से लिया. दुनिया ने उन्हें महात्मा गांधी की राह पर चलने वाली नेता के रूप में देखा - एक ऐसी महिला, जिसने बिना हिंसा के तानाशाही को चुनौती दी.

24 अकबर रोड कनेक्शन और भारत से गहरे रिश्ते कैसे?

आंग सान सू की का भारत से रिश्ता सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर भी गहरा रहा. उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय में हासिल की.

भारत में रहते हुए उनका संपर्क कांग्रेस के कई नेताओं से रहा. खासकर इंदिरा गांधी के दौर में. यही वजह है कि उनका नाम अक्सर 24 अकबर रोड (जो कांग्रेस पार्टी का मुख्यालय है) से जोड़ा जाता है. फिर, भारत ने लंबे समय तक उनके लोकतांत्रिक संघर्ष का समर्थन किया और उन्हें एक नैतिक व राजनीतिक सहयोगी के रूप में देखा.

24 अकबर रोड 1960 के दशक की शुरुआत में यह बंगला म्यांमार की भारत में राजदूत डॉ खिन क्यी का घर था. उन्हीं बेटी हैं, Aung San Suu Kyi, जिन्हें बाद में नोबेल शांति पुरस्कार मिला, ने भी इस घर में कई साल बिताए.

सत्ता में आने के बाद बदली छवि

साल 2015 में उनकी पार्टी NLD ने चुनाव जीता और सू की म्यांमार की वास्तविक सत्ता में आईं. लेकिन यहीं से उनकी छवि बदलने लगी. रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हुई हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों पर उनकी चुप्पी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को निराश किया. संयुक्त राष्ट्र समेत कई संस्थाओं ने म्यांमार की सेना की आलोचना की, लेकिन सू की का रुख विवादित रहा. कभी लोकतंत्र की प्रतीक मानी जाने वाली नेता अब आलोचनाओं के घेरे में आ गईं.

सैन्य तख्तापलट, क्यों कमजोर हुई सियासी पकड़?

2021 में म्यांमार की सेना ने फिर तख्तापलट कर दिया और सू की को गिरफ्तार कर लिया. उन पर कई आरोप लगाए गए और उन्हें सजा भी सुनाई गई. आज उनका राजनीतिक भविष्य अनिश्चित है. एक समय की “लोकतंत्र की आइकन” अब फिर से सैन्य शासन के शिकंजे में हैं.

हीरो से विवाद तक का सफर क्यों?

आंग सान सू की का जीवन एक जटिल कहानी है, जहां एक तरफ वे लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवाज बनीं, नोबेल पुरस्कार जीता और दुनिया भर में सम्मान पाया, वहीं दूसरी तरफ सत्ता में आने के बाद उनकी छवि पर सवाल भी उठे. भारत से उनका जुड़ाव, खासकर 24 अकबर रोड से वैचारिक और राजनीतिक संबंध, इस कहानी को और दिलचस्प बनाता है. उनका सफर हमें यह सिखाता है कि राजनीति में हीरो और विवाद के बीच की दूरी बहुत कम होती है और इतिहास किसी को भी एक ही फ्रेम में हमेशा नहीं बांधता.

अगला लेख