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कोई इस्तीफा नहीं होगा, ये UPA नहीं NDA सरकार है, क्या 12 साल बाद भी उतनी मजबूत है मोदी सरकार या धर्मेंद्र प्रधान पर पड़ जाएगा झुकना?

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के बीच मोदी सरकार का सख्त संदेश- 'कोई इस्तीफा नहीं होगा'. जानिए 12 साल में कब-कब विपक्ष ने मंत्रियों को घेरा और सरकार का क्या रहा रुख.

कोई इस्तीफा नहीं होगा, ये UPA नहीं NDA सरकार है, क्या 12 साल बाद भी उतनी मजबूत है मोदी सरकार या धर्मेंद्र प्रधान पर पड़ जाएगा झुकना?
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लोकसभा चुनाव 2024 के बाद पहली बार केंद्र सरकार किसी मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर इतने तीखे राजनीतिक टकराव का सामना कर रही है. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लेकर संसद से सड़क तक विपक्ष का हमला जारी है, जबकि सरकार साफ कह चुकी है कि विपक्ष के दबाव में कोई इस्तीफा नहीं होगा. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या मोदी सरकार अब भी 2014 और 2019 जैसी राजनीतिक मजबूती के साथ फैसले ले रही है, या गठबंधन की नई राजनीति में उसे अपने रुख पर उसे फिर से करना पड़ेगा? इसी बहस के बीच सत्ता और विपक्ष आमने-सामने हैं.

इससे पहले केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था, "कोई इस्तीफा नहीं होगा, ये UPA नहीं, NDA सरकार है." संसद के मानसून सत्र 2015 के दौरान राजनाथ की ओर से दिया गया यह संदेश साफ संकेत देता है कि विपक्ष के लगातार हमलों के बावजूद केंद्र सरकार अपने मंत्रियों के बचाव की रणनीति पर न केवल तब बल्कि आज भी कायम है.

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या करीब 12 साल के शासन के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार उतनी ही राजनीतिक रूप से मजबूत है, जितनी पहले थी? और क्या शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर बढ़ते राजनीतिक दबाव के बावजूद सरकार झुकने को तैयार होगी?

दरअसल, विपक्ष की ओर से केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के बीच एक बार फिर मोदी सरकार का वही पुराना रुख सामने आया है, "सिर्फ विपक्ष के दबाव में कोई इस्तीफा नहीं होगा." यह पहली बार नहीं है जब किसी केंद्रीय मंत्री को लेकर संसद से लेकर सड़क तक इस्तीफे की मांग उठी हो. 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कई ऐसे मौके आए, जब विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की, लेकिन सरकार ने साफ कर दिया कि केवल राजनीतिक आरोप या विरोध के आधार पर किसी मंत्री को नहीं हटाया जाएगा. आइए जानते हैं कि पिछले 12 वर्षों में ऐसे कौन-कौन से बड़े मामले सामने आए.

ललित मोदी विवाद में भी उठी थी इस्तीफे की मांग?

साल 2015 में आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी से जुड़े विवाद ने केंद्र सरकार को घेर लिया था. आरोप लगा कि तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ब्रिटेन में ललित मोदी को यात्रा संबंधी दस्तावेज हासिल करने में मानवीय आधार पर मदद की थी, जबकि ललित मोदी भारत में जांच एजेंसियों के रडार पर थे. इसी दौरान तत्कालीन राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के ललित मोदी से कथित संबंधों को लेकर भी विवाद बढ़ा. कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने संसद के भीतर और बाहर सुषमा स्वराज के इस्तीफे की मांग की. हालांकि नरेंद्र मोदी सरकार ने उनका बचाव किया और कहा कि उन्होंने केवल मानवीय आधार पर सहायता की थी, इसलिए इस्तीफे का कोई सवाल नहीं उठता.

वेमुला और JNU विवाद के बाद ईरानी पर इस्तीफे का था दबाव?

साल 2016 में हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या और उसके बाद जेएनयू विवाद को लेकर तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी विपक्ष के निशाने पर थीं. कांग्रेस, वाम दलों और अन्य विपक्षी पार्टियों ने संसद के भीतर और बाहर उनके इस्तीफे की जोरदार मांग की. संसद में इस मुद्दे पर लंबी बहस हुई, लेकिन सरकार ने स्मृति ईरानी का मजबूती से बचाव किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी नेतृत्व ने स्पष्ट संदेश दिया कि विपक्ष के दबाव में कोई फैसला नहीं लिया जाएगा और स्मृति ईरानी अपने पद पर बनी रहीं.

राफेल विवाद में सीतारमण को हटाने की मांग उठी थी?

2018 और 2019 के दौरान राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर कांग्रेस ने तत्कालीन रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण पर कई सवाल उठाए. तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लगातार सरकार और रक्षा मंत्री को घेरा तथा इस्तीफे की मांग की. हालांकि केंद्र सरकार ने सभी आरोपों को निराधार बताया और कहा कि रक्षा खरीद प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रही है. सरकार अपने रुख पर कायम रही और निर्मला सीतारमण के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई.

रविशंकर प्रसाद पर क्या आरोप लगे थे?

साल 2021 में पेगासस स्पाइवेयर विवाद सामने आने के बाद विपक्ष ने केंद्र सरकार पर नागरिकों और नेताओं की जासूसी कराने के आरोप लगाए. उस समय तत्कालीन आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद विपक्ष के निशाने पर थे. संसद का पूरा मानसून सत्र इस मुद्दे पर हंगामे की भेंट चढ़ गया और विपक्ष ने मंत्री के इस्तीफे की मांग भी उठाई. लेकिन सरकार ने इन आरोपों से इनकार करते हुए किसी भी तरह के इस्तीफे से साफ इनकार कर दिया.

अश्विनी वैष्णव से इस्तीफा क्यों मांगा गया?

जून 2023 में ओडिशा के बालासोर में हुए भीषण रेल हादसे में लगभग 300 लोगों की मौत हो गई थी. इसे भारत के सबसे बड़े रेल हादसों में से एक माना गया. विपक्ष ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव की नैतिक जिम्मेदारी तय करते हुए उनके इस्तीफे की मांग की. हालांकि सरकार ने कहा कि हादसे की जांच कराई जा रही है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी, लेकिन केवल दुर्घटना के आधार पर मंत्री को हटाने का सवाल नहीं उठता. अश्विनी वैष्णव अपने पद पर बने रहे.

अजय मिश्रा 'टेनी' को लेकर सरकार का रुख क्या था?

अक्टूबर 2021 में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में किसानों की मौत के मामले में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा 'टेनी' के बेटे का नाम सामने आने के बाद विपक्ष ने अजय मिश्रा के इस्तीफे की मांग तेज कर दी. संसद से लेकर राष्ट्रपति भवन तक विपक्ष ने इस मुद्दे को उठाया, लेकिन सरकार ने उन्हें तत्काल नहीं हटाया. सरकार का कहना था कि मामला न्यायिक प्रक्रिया में है और जांच पूरी होने से पहले कोई राजनीतिक फैसला नहीं लिया जाएगा.

क्या धर्मेंद्र प्रधान के मामले में भी वही रणनीति?

संसद के मौजूदा सत्र में शिक्षा से जुड़े विवाद को लेकर विपक्ष केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहा है. कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल सरकार पर जवाबदेही तय करने का दबाव बना रहे हैं. लेकिन सरकार का रुख अब भी वही है जो पिछले कई वर्षों से रहा है. बीजेपी का कहना है कि विपक्ष के राजनीतिक दबाव के आगे झुककर किसी मंत्री को हटाने की परंपरा नहीं बनाई जाएगी. जब तक किसी मामले में ठोस कानूनी या संवैधानिक आधार नहीं बनता, तब तक इस्तीफे का सवाल नहीं उठता.

क्या मंत्रियों ने कभी इस्तीफा दिया भी है?

  • मोदी सरकार में इस्तीफे हुए हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में उनकी वजह विपक्ष का दबाव नहीं रहा.
  • 2020 में कृषि कानूनों के विरोध में शिरोमणि अकाली दल के NDA से अलग होने के बाद हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया था.
  • अरुण जेटली ने 2019 में स्वास्थ्य कारणों से नई सरकार में मंत्री पद स्वीकार नहीं किया. सुरेश प्रभु ने रेल दुर्घटनाओं के बाद इस्तीफे की पेशकश की थी, लेकिन बाद में मंत्रिमंडल फेरबदल में उनका विभाग बदल दिया गया.
  • कुछ मंत्री राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने या संगठनात्मक कारणों से मंत्रिमंडल से बाहर हुए, लेकिन यह विपक्ष के दबाव का परिणाम नहीं था.

क्या यही मोदी की राजनीतिक कार्यशैली बन चुकी है?

पिछले 12 वर्षों के घटनाक्रम को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि मोदी सरकार ने एक राजनीतिक सिद्धांत अपनाया है— विपक्ष के आरोप या संसद में हंगामे के आधार पर मंत्री नहीं हटाए जाएंगे. सरकार का तर्क रहा है कि किसी भी मामले में जांच, न्यायिक प्रक्रिया और तथ्य सामने आने से पहले केवल राजनीतिक दबाव के कारण इस्तीफा लेना उचित नहीं है. यही वजह है कि धर्मेंद्र प्रधान के मामले में भी सरकार का रुख पहले की तरह सख्त दिखाई दे रहा है. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि संसद के भीतर विपक्ष का दबाव कितना बढ़ता है और क्या सरकार अपनी इसी नीति पर आगे भी कायम रहती है.

मीडिया का नैरेटिव, सरकार ने कार्रवाई की

बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आरपी सिंह का कहना है कि बीजेपी पहले से ज्यादा मजबूत है या नहीं, यह पार्टी के लिए कोई मुद्दा नहीं है. उनके मुताबिक, यह चर्चा मीडिया का नैरेटिव हो सकती है, लेकिन पार्टी का ध्यान अपने कामकाज और शासन पर है. उन्होंने कहा कि नीट पेपर लीक मामले में सरकार ने समय रहते आवश्यक कदम उठाए. जांच एजेंसियों ने मामले की पड़ताल की, दोषियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की गई और व्यवस्था में जरूरी सुधार भी किए गए. आरपी सिंह ने कहा कि इसके बाद सरकार ने सफलतापूर्वक NEET 2026 परीक्षा आयोजित कराई और परिणाम भी घोषित हो चुके हैं. ऐसे में सरकार की नजर में यह मुद्दा अब समाप्त हो चुका है. उन्होंने कहा कि चाहे विपक्षी दल हों या अन्य आलोचक, उनके आरोपों से सरकार की कार्यशैली प्रभावित नहीं होने वाली.

सियासी मजबूती नहीं फॉल्स Ego?

राजनीति विश्लेषक राजेश भारती के अनुसार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के मुद्दे पर बीजेपी अहम की लड़ाई लड़ रही है. उनका आरोप है कि पार्टी का मौजूदा रुख उसके "फॉल्स ईगो" को दर्शाता है और वह बदलते राजनीतिक माहौल को स्वीकार नहीं कर रही. उन्होंने कहा कि लगातार पेपर लीक की घटनाओं ने छात्रों और युवाओं में गहरा आक्रोश पैदा किया है, इसलिए धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग लगातार तेज हो रही है. उनके मुताबिक जनता अब जवाबदेही चाहती है और उसे भविष्य में ऐसे राजनीतिक दलों को मौका देना चाहिए जो सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित कर सकें.

नरेंद्र मोदीस्टेट मिरर स्पेशल
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