12 साल में मोदी सरकार के खिलाफ कई बार सड़क पर उतरे लोग, लेकिन चुनाव में नहीं दिखा असर; क्या CJP का प्रोटेस्ट बाकी आंदोलनों से अलग है?
मोदी सरकार के खिलाफ किसान आंदोलन, CAA विरोध, बेरोजगारी और अन्य मुद्दों पर प्रदर्शन हुए, लेकिन चुनाव में असर सीमित रहा. जानिए CJP प्रोटेस्ट क्यों अलग माना जा रहा है.
पिछले 12 साल से नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं. सरकार के खिलाफ कई बड़े जन आंदोलन हुए. कभी भ्रष्टाचार, कभी नागरिक अधिकार, कभी किसान, कभी रोजगार तो कभी सामाजिक मुद्दों को लेकर लाखों लोग सड़क पर उतरे. इन आंदोलनों ने सरकार पर दबाव बनाया, कई फैसलों को वापस लेने और कान पकड़ने तक के लिए मजबूर किया. लेकिन चुनावी राजनीति में इनका असर हर बार उम्मीद के मुताबिक नहीं दिखा. विपक्ष को इन आंदोलनों का लाभ नहीं मिला. अब CJP के प्रोटेस्ट को लेकर सवाल है कि क्या यह भी पुराने आंदोलनों की तरह केवल विरोध तक सीमित रहेगा या फिर कोई बड़ा राजनीतिक संदेश देने में सफल होगा.
अन्ना आंदोलन मोदी का हुआ था उभार
2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में शुरू हुआ जन लोकपाल आंदोलन स्वतंत्र भारत के सबसे चर्चित आंदोलनों में शामिल रहा. दिल्ली के रामलीला मैदान में हुए अनशन ने पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्से को आवाज दी.
इस आंदोलन में बड़ी संख्या में युवा, मध्यम वर्ग और शहरी लोग जुड़े. सोशल मीडिया ने आंदोलन को तेजी से देशभर में फैलाने में बड़ी भूमिका निभाई. तत्कालीन यूपीए सरकार पर लोकपाल कानून को लेकर दबाव बढ़ा.
इस आंदोलन की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि यह रही कि इससे आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ. 2013 दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 28 सीटें जीतीं और 2015 में 67 सीटों के साथ सरकार बनाई. लेकिन 2014 लोकसभा चुनाव में भ्रष्टाचार विरोधी भावना का सीधा फायदा मोदी के नेतृत्व नरेंद्र मोदी और बीजेपी को मिला और केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ.
CAA-NRC विरोध: लंबा आंदोलन, लेकिन असर जीरो
2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) पारित होने के बाद देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए. दिल्ली का शाहीन बाग आंदोलन इसका सबसे बड़ा चेहरा बना.
करीब 100 दिनों तक चले इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी रही. संविधान, नागरिक अधिकार और धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दे आंदोलन के केंद्र में रहे.
दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 में यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना, लेकिन चुनाव परिणामों में इसका असर सीमित रहा. आम आदमी पार्टी ने भारी बहुमत से सरकार बनाई.
किसान आंदोलन: सरकार को झुकाया, सत्ता नहीं बदली
2020 में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ शुरू हुआ किसान आंदोलन मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक था.
पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हजारों किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर 13 महीने से ज्यादा समय तक प्रदर्शन किया. सिंघु, टिकरी और गाजीपुर बॉर्डर आंदोलन के प्रमुख केंद्र बने.
लगभग एक साल चले आंदोलन के बाद नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की.
हालांकि, सरकार को फैसला बदलना पड़ा, लेकिन राष्ट्रीय चुनावी राजनीति में इसका असर सीमित रहा. कुछ राज्यों और किसान बहुल क्षेत्रों में इसका प्रभाव जरूर दिखाई दिया.
मोदी सरकार की अग्निपथ स्कीम को भी राष्ट्रीय स्तर पर विरोध हुआ. विपक्षी दलों से इसे बड़ा मुद्दा बनाया. युवाओं का गुस्सा भी सामने आया, लेकिन बड़ा राजनीतिक आंदोलन नहीं बन सका.
अग्निवीर स्कीम प्रोटेस्ट
2022 में केंद्र सरकार की अग्निवीर सैन्य भर्ती योजना के खिलाफ कई राज्यों में युवाओं ने प्रदर्शन किए. इसका बिहार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में विरोध सबसे ज्यादा देखने को मिला. कई जगह रेलवे संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं हुईं. सरकार ने योजना में कुछ बदलाव किए, लेकिन आंदोलन लंबे समय तक राजनीतिक अभियान में बदल नहीं पाया.
मणिपुर हिंसा: विपक्ष का बड़ा हमला, लेकिन असर राज्यों तक सीमित
2023 में मणिपुर हिंसा को लेकर विपक्ष ने केंद्र सरकार पर लगातार हमला किया. संसद में अविश्वास प्रस्ताव तक लाया गया. विपक्षी दलों ने इसे कानून व्यवस्था और मानवाधिकार का मुद्दा बनाया, जबकि सरकार ने अपने स्तर पर स्थिति संभालने की बात कही. 2024 लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाया, लेकिन इसका असर पूरे देश में समान नहीं रहा.
भारत जोड़ो यात्रा: सड़क की राजनीति को चुनाव से जोड़ने की कोशिश
भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी का सबसे प्रमुख और लोकप्रिय नारा था: "नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोलने आया हूं". कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा 2022-23 में करीब 4,000 किलोमीटर से ज्यादा चली. इसका उद्देश्य महंगाई, बेरोजगारी और सामाजिक विभाजन जैसे मुद्दों को उठाना था.
यात्रा ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ाया और राजनीतिक बहस को प्रभावित किया. 2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन में सुधार हुआ, हालांकि इसका पूरा श्रेय केवल यात्रा को नहीं दिया गया.
क्यों कई आंदोलन चुनाव में असर नहीं दिखा पाए?
भारत में सियासी स्ट्रीट फाइट और चुनावी परिणाम हमेशा एक जैसे नहीं होते. किसी आंदोलन को वोट में बदलने के लिए कई चीजें जरूरी होती हैं. इनमें:
- पहला, मुद्दा कितना व्यापक है. केवल किसी एक वर्ग का मुद्दा लंबे समय तक चुनावी प्रभाव नहीं बना पाता.
- दूसरा, संगठन और नेतृत्व. किसान आंदोलन के पास मजबूत जमीनी नेटवर्क था, जबकि अन्ना आंदोलन से राजनीतिक विकल्प पैदा हुआ.
- तीसरा, जनता मतदान के समय कई अन्य मुद्दों को भी ध्यान में रखती है. स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, सरकारी योजनाएं, राष्ट्रीय सुरक्षा और नेतृत्व जैसे विषय भी चुनाव को प्रभावित करते हैं.
क्या CJP का प्रोटेस्ट अलग साबित होगा?
CJP प्रोटेस्ट के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि क्या यह केवल सरकार विरोधी नाराजगी तक सीमित रहेगा या व्यापक जनसमर्थन हासिल कर पाएगा.
पिछले आंदोलनों का अनुभव बताता है कि किसी भी आंदोलन को राजनीतिक असर पैदा करने के लिए लगातार जमीन पर सक्रिय रहना पड़ता है. मुद्दे की व्यापकता, संगठन की ताकत और जनता के बीच विश्वास ही तय करेगा कि CJP का आंदोलन इतिहास के पुराने आंदोलनों से अलग पहचान बना पाता है या नहीं.
इस बार भी सरकार के खिलाफ शुरू हुई मुहिम में विपक्ष में एकता का अभाव है. सभी सड़कों पर तो दिखाई दिए हैं, पर अलग-अलग गुटों में. यही वजह है कि आंदोलन का असर चुनाव से पहले ही समाप्त हो जाता है.
कॉकरोज जनता पार्टी के इस सियासी मुहिम को इन सभी मोर्चों पर काम करना होगा. अगर सीजेपी यह कर पाई तभी कुछ होने की संभावना है. अन्यथा इसका भी असर न के बराबर होगा.




