मंदिर तोड़कर, मस्जिदें बनीं, मुगलों के खिलाफ Resistance और देवी की तलवार से जंग...9th क्लास की नई NCERT सोशल साइंस बुक में क्या बदला?
NCERT की कक्षा 9 की नई सोशल साइंस किताब में 1000 से 1700 ईस्वी के इतिहास को ‘Resistance and Resilience’ के तौर पर पेश किया गया है. जानें इस नई किताब में क्या-क्या बदला?
NCERT की कक्षा 9 की नई सोशल साइंस किताब में 1000 से 1700 ईस्वी तक की मेडिवल इंडियन हिस्ट्री को “Resistance and Resilience” यानी “प्रतिरोध और दृढ़ता” के दौर के रूप में बताया गया है. यह नई किताब मंगलवार को जारी की गई. किताब के मुताबिक, इस दौर में भारतीय समाज ने न सिर्फ बाहरी खतरों का सामना किया, बल्कि अपनी परंपराओं और मूल विचारों को भी सुरक्षित रखा.
कक्षा 9 की सोशल साइंस की नई किताब का नाम “Understanding Society: India and Beyond” है. इसका पार्ट-1 जून में पेश किया गया था. इसमें इतिहास, राजनीति विज्ञान, भूगोल और अर्थशास्त्र जैसे अलग-अलग विषयों से जुड़े विषय शामिल थे. किताब में “संघर्ष और सहयोग” दोनों का जिक्र किया गया था, लेकिन इतिहास वाले हिस्से में सहयोग या मिली-जुली संस्कृति के विकास के बजाय प्रतिरोध की घटनाओं पर ज्यादा जोर दिया गया है. ये ऐसे विषय हैं, जो पांच दशक से ज्यादा समय तक भारतीय इतिहास का अहम हिस्सा रहे रहें.
प्रतिरोध के बारे में किताब में क्या लिखा है?
नई किताब में इंडियन सबकोन्टिनेन्ट पर हुए लगातार हमलों का जिक्र किया गया है. इसमें युद्धों में धार्मिक परंपराओं की भूमिका और अलग-अलग समय में भारतीय शासकों की ओर से तुर्कों, मुगलों और यूरोपीय शक्तियों के खिलाफ किए गए प्रतिरोध को बताया गया है. किताब में राजपूतों, असम के अहोम साम्राज्य, विजयनगर साम्राज्य, मराठों, सिखों, जाटों और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के प्रतिरोध का उल्लेख किया गया है.
किताब के “Resistance and Resilience” चैप्टपर के “Bhakti Tradition: affirmation of the spirit of resilience” हिस्से में एक खास जानकारी दी गई है. इसमें बताया गया है कि भारत में दवी पूजा की परंपरा बहुत पुरानी रही है. सातवीं सदी के बाद से कई राजा और राजकुमार संघर्ष के समय काली, दुर्गा, भवानी और शक्ति के दूसरे रूपों को रक्षक के रूप में मानते और उनका आह्वान करते थे.
देवी से मिलने वाली तलवार के बारे में क्या जिक्र?
किताब के एक हिस्से में कहा गया है कि बस्तर के शासक अन्नमाराजा को माणिक्यदेवी यानी दंतेश्वरी से तलवार मिलने की मान्यता है. इसी तरह विजयनगर के कुमार कंपना के बारे में माना जाता है कि उन्होंने मदुरै में सल्तनत की सेनाओं के खिलाफ देवी से मिली तलवार का इस्तेमाल किया था. शिवाजी के बारे में भी पारंपरिक रूप से माना जाता है कि उन्हें देवी तुलजा भवानी से तलवार मिली थी.
क्या है इन बदलावों का मकसद?
NCERT के प्रमुख दिनेश सकलानी ने किताब की प्रस्तावना में लिखा है कि इस स्तर पर सोशल साइंस की पढ़ाई का उद्देश्य छात्रों में विश्लेषण और चर्चा की क्षमता विकसित करना, आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देना, अलग-अलग संस्कृतियों को समझने की क्षमता विकसित करना और छात्रों को नागरिक और सामाजिक जीवन में आत्मविश्वास और जिम्मेदारी के साथ भाग लेने में सक्षम बनाना है. उन्होंने लिखा कि इसी सोच के तहत कक्षा 9 के सेकेंडरी स्टेज के लिए “Understanding Society: India and Beyond” सोशल साइंस की किताब तैयार की गई है.
कैसे अलग है पुरानी किताबों से नई किताबें?
नई किताबों ने चार पुरानी किताबों की जगह ली है. इनमें “India and The Contemporary World” शामिल थी, जिसमें फ्रांसीसी क्रांति, यूरोप में समाजवाद, रूसी क्रांति और नाजीवाद के उदय जैसे विषय पढ़ाए जाते थे. इसके अलावा “Democratic Politics-1” भी पुरानी किताबों में शामिल थी, जिसमें राजनीतिक संस्थाओं, भूगोल और अर्थशास्त्र से जुड़े विषय थे. नई किताब में मध्यकालीन दौर को मुख्य रूप से विदेशी ताकतों के खिलाफ “प्रतिरोध” की कहानी के रूप में पेश किया गया है.
किताब में कहा गया है कि भारतीय उपमहाद्वीप में बार-बार आक्रमण और युद्ध हुए. इनके साथ धार्मिक भेदभाव और सामाजिक परेशानियां भी जुड़ी थीं. अलग-अलग क्षेत्रों की शक्तियों ने अपने इलाकों में घुसने वाले आक्रमणकारियों का अक्सर विरोध किया. यह प्रतिरोध सैन्य और सांस्कृतिक, दोनों रूपों में हुआ. किताब में यह भी कहा गया है कि इसके बावजूद इस दौर में भारतीय सभ्यता की दृढ़ता दिखाई दी. भारतीय सभ्यता ने अपने मूल विचारों और मूल्यों को सुरक्षित रखा. भारतीय समाज ने न सिर्फ बाहरी खतरों से अपना बचाव किया, बल्कि अपनी परंपराओं को भी बनाए रखा.
दिल्ली सल्तनत के बारे में क्या?
नई किताब में दिल्ली सल्तनत के दौर को करीब एक पेज में बताया गया है. इसमें स्थानीय राजाओं की ओर से किए गए प्रतिरोध का उल्लेख किया गया है. मुगल काल को दिल्ली सल्तनत की तुलना में ज्यादा विस्तार से बताया गया है, लेकिन इसमें भी मुगलों के साथ सहयोग की तुलना में प्रतिरोध पर ज्यादा ध्यान दिया गया है.
मुगलों का सहयोग करने के बारे में क्या?
किताब में अंबर के कछवाहा शासकों और मुगलों के बीच साथ देने वाले रिश्तों के बारे में कम शब्दों में जिक्र किया गया है. इसमें कहा गया है कि मुगलों के पास भी राजपूतों के साथ सहयोग करने की मजबूत वजह थी. किताब का एक हिस्सा मेवाड़ और मुगल सम्राट अकबर के खिलाफ महाराणा प्रताप के प्रतिरोध पर फोकस है.
इसके बाद असम के अहोम साम्राज्य की चर्चा की गई है. किताब में बताया गया है कि अहोम साम्राज्य ने करीब छह शताब्दियों तक अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखी और मुगलों से अपने इलाकों की सफलतापूर्वक रक्षा की. इसमें सरायघाट की लड़ाई का भी खास तौर पर जिक्र किया गया है. किताब के मुताबिक, इस युद्ध में अहोम सेनापति लाचित बरफुकन ने मुगल बेड़े को हरा दिया था.
विजयनगर साम्राज्य के बारे में क्या?
इसके बाद विजयनगर साम्राज्य के प्रतिरोध की चर्चा की गई है. इसमें जोर दिया गया है कि विदेशी आक्रमणों का प्रतिरोध केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं था. इसके बाद किताब मराठों और उनके “स्वराज्य” के विचार की ओर बढ़ती है. इसमें स्वराज्य को बाहरी नियंत्रण से मुक्त स्वतंत्र और खुद शासन करने वाले क्षेत्र के विचार के रूप में समझाया गया है.
किताब में सिखों के बारे में क्या?
किताब में सिखों के “आध्यात्मिक और राजनीतिक दृढ़ता के संघर्ष” की भी चर्चा की गई है. इसमें सिख गुरुओं की शहादत और मुगलों की “कठोर धार्मिक और भेदभावपूर्ण प्रथाओं” का जिक्र किया गया है. सिखों के बाद किताब मुगलों के खिलाफ जाटों के प्रतिरोध की चर्चा करती है. इसमें इसके पीछे आर्थिक परेशानियों और औरंगजेब की धार्मिक नीतियों का उल्लेख किया गया है.
एनसीईआरटी की नई किताब में मंदिर तोड़े जाने का जिक्र?
नई किताब में मंदिरों को तोड़े जाने और उनके स्थान पर मस्जिदों के निर्माण की कई घटनाओं का भी जिक्र है. इसमें काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का भी उल्लेख किया गया है. किताब के मुताबिक, टोडरमल और मान सिंह ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था. बाद में औरंगजेब ने इसे नष्ट कर दिया और इसके बाद अहिल्याबाई होलकर ने इसका पुनर्निर्माण कराया.
किताब में भक्ति आंदोलन को भी इस दौर की परिस्थितियों से जोड़ा गया है. इसमें कहा गया है कि जब मंदिरों का निर्माण सीमित था या मंदिरों को नष्ट किया जा सकता था, तब भक्ति परंपरा ने श्रद्धालुओं को पूजा के गैर-भौतिक तरीके उपलब्ध कराए.
किताब में चैतन्य महाप्रभु का भी जिक्र है. इसमें कहा गया है कि उन्होंने एक बार बंगाल में सार्वजनिक संकीर्तन का नेतृत्व किया था. यह संकीर्तन एक काजी की ओर से भक्ति से जुड़ी गतिविधियों पर लगाए गए प्रतिबंधों के खिलाफ था. वहीं, सूफी परंपरा को इस्लाम के अपेक्षाकृत उदार रूप के तौर पर बताया गया है. किताब में कहा गया है कि सूफी परंपरा ने भी भारत में इस्लाम के प्रसार में योगदान दिया.




