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कभी पाकिस्तानी तो कभी बांग्लादेशी, अब राष्ट्रवाद के नाम पर बॉलीवुड और क्रिकेटर्स फिर क्यों बने सॉफ्ट टारगेट?

पाकिस्तान या बांग्लादेश के नाम पर भारतीय सेलिब्रिटी को घेरना आसान है, लेकिन इससे न तो विदेश नीति सुधरती है और न ही राष्ट्रीय सुरक्षा. राष्ट्रवाद अगर सोच-समझ और नीति की जगह भावनात्मक भीड़ में बदल जाए, तो असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं. सवाल यह नहीं कि एक्टर या क्रिकेटर क्या बोले, सवाल यह है कि हम किस तरह का राष्ट्रवाद चाहते हैं.

कभी पाकिस्तानी तो कभी बांग्लादेशी, अब राष्ट्रवाद के नाम पर बॉलीवुड और क्रिकेटर्स फिर क्यों बने सॉफ्ट टारगेट?
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भारत में जब भी पाकिस्तान या बांग्लादेश से जुड़ा कोई राजनीतिक या कूटनीतिक तनाव बढ़ता है, उसका पहला असर अक्सर बॉलीवुड और क्रिकेट की दुनिया पर दिखता है. कभी किसी एक्टर की पुरानी तस्वीर वायरल कर दी जाती है, तो कभी किसी क्रिकेटर के बयान को 'राष्ट्रविरोधी' बताकर ट्रायल शुरू हो जाता है. सवाल यह है कि क्या राष्ट्रवाद अब सिर्फ सेलिब्रिटी को घेरने का औजार बन गया है? या असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए क्या जानबूझकर ‘सॉफ्ट टारगेट’ चुने जाते हैं?

बॉलीवुड और क्रिकेटर्स ही निशाने पर क्यों?

बॉलीवुड सितारे और क्रिकेटर्स जनता में सबसे ज्यादा पहचाने जाने वाले चेहरे होते हैं. उनकी एक लाइन या तस्वीर तुरंत वायरल नैरेटिव बन जाती है. वे सरकारी पद पर नहीं होते, इसलिए जवाबी कार्रवाई आसान मानी जाती है. यही वजह है कि गुस्से का पहला निशाना वही बनते हैं.

पाकिस्तान-बांग्लादेश एंगल कैसे जुड़ता है?

जब भी पाकिस्तान से तनाव, बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल या अल्पसंख्यकों से जुड़ा कोई मुद्दा उभरता है, तब सोशल मीडिया पर अचानक सवाल उठने लगते हैं. आप चुप क्यों हैं? आप किस देश के साथ खड़े हैं? यह दबाव अक्सर सलेक्टिव नेशनलिज्म को जन्म देता है.

सोशल मीडिया ट्रायल की राजनीति

पिछले कुछ सालों से सोशल मीडिया राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुका है. पुराने ट्वीट्स निकाल लिए जाते हैं. संदर्भ से काटकर बयान फैलाए जाते हैं. ट्रेंड चलाकर माफी या बायकॉट की मांग होती है. यह एक तरह का डिजिटल भीड़ न्याय (Mob Justice) बन चुका है.

असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की रणनीति?

विशेषज्ञ मानते हैं कि बेरोजगारी, महंगाई, सीमा सुरक्षा, कूटनीति जैसे जटिल मुद्दों पर बहस मुश्किल होती है, लेकिन किसी एक्टर या क्रिकेटर पर हमला आसान और ज्यादा वायरल होता है. इससे जनता का ध्यान भावनात्मक मुद्दों पर शिफ्ट हो जाता है.

राष्ट्रवाद बनाम पेशेवर पहचान

एक्टर का काम अभिनय है, क्रिकेटर का काम देश के लिए खेलना है, लेकिन उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे हर राजनीतिक मुद्दे पर बोलें. हर संकट पर एक ही स्वीकार्य राय रखें, जो इससे अलग होता है, उसे तुरंत देशद्रोही, चुप्पी समर्थक और दूसरे देश का एजेंट कहा जाने लगता है.

क्या यह ट्रेंड खतरनाक है?

इस तरह के ट्रेंड से से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सिकुड़ती है. राष्ट्रवाद संवेदनशील विमर्श से हटकर हथियार बन जाता है. समाज में ध्रुवीकरण बढ़ता है. लंबे समय में इसका नुकसान लोकतांत्रिक संवाद को होता है.

दरअसल, विराट कोहली को फैन्स ‘किंग कोहली' कहते हैं तो रोहित शर्मा को उनके फैन्स‘मुंबई चा राजा' कहते हैं. मगर ये मैच में कम रन बनाकर आउट हुए नहीं कि गलियों, चौराहों से लेकर एसी -दफ्तरों और फाइव स्टार होटल में इन्हें सलाह देने वालों का तांता लग जाता है. पिछले ही साल भारत के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर ना जाने कितने आलोचक, पीआर एजेन्ट्स और फैंस रोहित शर्मा और विराट कोहली की अंतिम पारियों का मर्सिया गाते दिख रहे थे.

ऑस्ट्रेलियाई वनडे सीरीज में रोहित शर्मा ‘मैन ऑफ द सीरीज' बने और भारत-दक्षिण अफ्रीका सीरीज में विराट कोहली ‘मैन ऑफ द सीरीज बने' तो लोगों ने अपनी बंदूकें कोच गौतम गंभीर और मुख्य चयनकर्ता अजीत आगरकर पर तान दीं. मतलब पिछले चार महीने कोई ना कोई क्रिकेटर सबके निशाने पर जरूर रहा. अपनी फ़्रस्ट्रेशन निकालने का इससे बढ़िया जरिया और क्या हो सकता है? बाबा, यूट्यूबर, पत्रकार और आम फैन्स से लेकर राजनेताओं के लिए अपनी रोटियां सेंकने का ये शानदार मौक़ा होता है.

निशाने पर कैसे आये शाहरुख?

बॉलीवुड स्टार्स और क्रिकेटर्स को भी भारत में जितना प्यार मिलता है उतनी ही आसानी से फ़ैन्स या खेल प्रशंकों की वेश में छिपे खुंदकी फैंस अपनी भड़ास निकालने का तरीका ढूंढ ही लेते हैं. IPL 2026 का आयोजन मार्च 26 से 31 मई तक होगा. इसकी टीमों की नीलामी 16 दिसंबर को हो गई, लेकिन अब 15 दिनों बाद अचानक किसी ने अलख लगाकर सबको जगा दिया. नये साल की शुरुआत से शाहरुख निशाने पर आ गए.

दरअसल, कोलकाता नाइट राइडर्स ने बांग्लादेशी क्रिकेटर मुस्ताफिजुर रहमान को खरीदा और अब टीम के मालिक शाहरुख खान विवादों में घिर गए हैं. इतना ही नहीं सोशल मीडिया पर नेता से लेकर धर्मगुरु आग उगल रहे हैं. कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने चिंता जताई और फिर विवादों ने तूल पकड़ लिया. फिर धीरेंद्र शास्त्री और स्वामी रामभद्राचार्य ने भी शाहरुख खान पर दिए बयान को लेकर देवकीनंदन ठाकुर के पक्ष में आ गए.

अब भारतीय जनता पार्टी के नेता संगीत सोम ने बयान दिया कि आज बांग्लादेश में हिंदुओं का नरसंहार हो रहा है. वहां महिलाओं और बेटियों के साथ बलात्कार हो रहा है. जबकि शाहरुख खान बांग्लादेशी खिलाड़ियों को 9 करोड़ में खरीद रहा है. यह पैसे शाहरुख खान के नहीं हैं. यह पैसा देश की जनता का है. देश की जनता ने शाहरुख खान को बनाया है. जनता ने उसे समझ लिया है, जनता उसे देशद्रोही मानती है, जनता ऐसे देशद्रोहियों को पहचानती है.

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