पैसा, पावर और अधिकार की लड़ाई... मानसून सत्र में केंद्र बनाम राज्यों के बीच 5 मुद्दों पर क्यों बढ़ सकता है टकराव?
मानसून सत्र में GST, राज्यपाल, ED, परिसीमन, वन नेशन-वन इलेक्शन और राज्यों के अधिकार जैसे मुद्दों पर केंद्र और विपक्षी राज्यों के बीच टकराव क्यों बढ़ सकता है, पढ़ें पूरी रिपोर्ट.
संसद के मानसून सत्र से पहले केंद्र और विपक्षी राज्यों के बीच राजनीतिक तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है. GST, राज्यपाल की भूमिका, ED-CBI की कार्रवाई, परिसीमन, वन नेशन-वन इलेक्शन और राज्यों के अधिकार जैसे मुद्दों पर दोनों पक्ष आमने-सामने हैं. जानिए इन पांच बड़े विवादों की पूरी पड़ताल और समझिए कि ये भारत के संघीय ढांचे और राष्ट्रीय राजनीति को कैसे प्रभावित कर सकते हैं.
पैसा किसका होगा? कानून किसका चलेगा? और राज्यों की सीमाएं आखिर कौन तय करेगा? संसद के मानसून सत्र से पहले यही सवाल केंद्र और विपक्षी राज्यों के बीच सबसे बड़े राजनीतिक टकराव की वजह बन चुके हैं. एक ओर मोदी सरकार 'मजबूत केंद्र' और 'वन नेशन, वन पॉलिसी' की पैरवी कर रही है, तो दूसरी ओर तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, पंजाब और अन्य विपक्षी राज्य इसे संघीय ढांचे पर दबाव बताते हैं. GST के पैसे से लेकर राज्यपाल की भूमिका, ED-CBI की कार्रवाई, राज्यों के अधिकार और भाषा नीति तक, पांच ऐसे मुद्दे हैं जो सिर्फ संसद ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट और देश की राजनीति में भी केंद्र बन चुके हैं.
तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और पंजाब जैसे राज्यों के साथ केंद्र के रिश्तों में कई मुद्दों पर टकराव देखने को मिल रहा है. अब यह मामला सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है. सवाल है कि आखिर कौन से ऐसे मुद्दे हैं जहां केंद्र और राज्यों के बीच टकराव सबसे ज्यादा बढ़ा है?
1. हिंदी, NEET और शिक्षा नीति व टकराव क्यों?
केंद्र और दक्षिण भारतीय राज्यों के बीच भाषा और शिक्षा सबसे संवेदनशील मुद्दे हैं. तमिलनाडु लंबे समय से हिंदी को बढ़ावा देने वाली नीतियों का विरोध करता रहा है. नई शिक्षा नीति 2020 में तीन भाषा फॉर्मूले को लेकर राज्य सरकार ने आपत्ति जताई.
प्रदेश सरकार का तर्क है कि भाषा का फैसला राज्यों और छात्रों की पसंद पर होना चाहिए. वहीं, केंद्र का तर्क कि बहुभाषी शिक्षा भारतीय भाषाओं को मजबूत करेगी. इसी तरह तमिलनाडु NEET परीक्षा से छूट की मांग करता रहा है. राज्य सरकार का कहना है कि इससे ग्रामीण और सरकारी स्कूलों के छात्रों को नुकसान होता है.
2. वन नेशन, वन इलेक्शन: लोकतंत्र की नई बहस कैसे?
वन नेशन, वन इलेक्शन को लेकर केंद्र और कई विपक्षी राज्यों के बीच टकराव इसलिए है क्योंकि यह सिर्फ चुनाव सुधार का नहीं, बल्कि संघीय ढांचे और राज्यों की स्वायत्तता का भी सवाल बन गया है. केंद्र सरकार का तर्क है कि एक साथ चुनाव कराने से सरकारी खर्च कम होगा, प्रशासनिक मशीनरी बार-बार चुनाव में नहीं लगेगी और नीतिगत फैसलों में तेजी आएगी.
वहीं विपक्षी राज्यों का कहना है कि इससे विधानसभा का कार्यकाल केंद्र के चुनावी चक्र पर निर्भर हो जाएगा, जिससे राज्यों की संवैधानिक स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है. राज्यों को यह भी आशंका है कि लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव होने पर राष्ट्रीय मुद्दे हावी होंगे और क्षेत्रीय दलों व स्थानीय जनादेश को नुकसान पहुंचेगा. इसलिए यह मुद्दा चुनावी सुधार से आगे बढ़कर केंद्र बनाम राज्य के अधिकारों की बहस का हिस्सा बन गया है.
3. डिलिमिटेशन या सियासी संतुलन?
परिसीमन (Delimitation) को लेकर केंद्र और कई दक्षिणी राज्यों के बीच विवाद लगातार गहराता जा रहा है. केंद्र का कहना है कि अगली जनगणना के बाद संविधान के प्रावधानों के अनुसार लोकसभा और विधानसभा सीटों का परिसीमन लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित बनाएगा.
वहीं तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के बावजूद उनकी लोकसभा सीटों का अनुपात घट सकता है, जबकि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ जाएगा.
विपक्षी दल इसे "जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों के साथ अन्याय" बताते हैं, जबकि केंद्र का कहना है कि अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है और सभी पक्षों से चर्चा के बाद ही आगे की प्रक्रिया तय होगी.
4. केंद्र कानून बना रहा या अधिकार में दखल?
संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्यों के अधिकार तय हैं, लेकिन कई मुद्दों पर राज्यों ने केंद्र पर अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप का आरोप लगाया. 2020 में केंद्र सरकार तीन कृषि कानून लेकर आई. पंजाब और हरियाणा समेत कई राज्यों में इसका विरोध हुआ.
राज्यों और किसानों का तर्क था कि कृषि राज्य सूची का विषय है और केंद्र ने राज्यों से पर्याप्त बातचीत नहीं की. एक साल चले आंदोलन के बाद नवंबर 2021 में केंद्र ने तीनों कानून वापस ले लिए.
दिल्ली में अधिकारियों के नियंत्रण को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच लंबे समय से विवाद है. 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार के पक्ष में फैसला दिया, लेकिन केंद्र सरकार ने बाद में GNCTD संशोधन कानून लाकर नया विवाद खड़ा कर दिया.
5. क्या पैसा रोक रहा केंद्र?
केंद्र और राज्यों के बीच सबसे बड़ी लड़ाई आर्थिक अधिकारों को लेकर है. 2017 में लागू GST व्यवस्था ने देश में एक समान टैक्स सिस्टम बनाया, लेकिन राज्यों का कहना है कि इसके बाद उनके अपने टैक्स लगाने के अधिकार सीमित हो गए. स्टालिन और ममता बनर्जी के बाद अब पंजाब के सीएम भगवंत मान भी जीएसटी कलेक्शन में हिस्सेदारी को लेकर केंद्र के खिलाफ आवाज बुलंद कर दिए हैं.
कोरोना काल के दौरान GST मुआवजे को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच बड़ा विवाद हुआ. राज्यों का आरोप था कि आर्थिक संकट के समय केंद्र ने GST क्षतिपूर्ति देने में देरी की. एक और बड़ा विवाद सेस और सरचार्ज को लेकर है. राज्यों का कहना है कि केंद्र ऐसे टैक्स के जरिए ज्यादा राजस्व जुटाता है, लेकिन यह पैसा राज्यों के साथ साझा नहीं होता.
केरल बनाम केंद्र: कर्ज सीमा पर सुप्रीम कोर्ट पहुंची लड़ाई
2024 में केरल सरकार ने केंद्र पर आरोप लगाया कि उसने राज्य की उधारी सीमा कम करके उसकी आर्थिक स्वतंत्रता को प्रभावित किया. केरल ने संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया. इस मामले में तत्कालीन विजयन सरकार ने कहा था कि केंद्र राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता खत्म कर रहा है. इसके उलट केंद्र का कहना था कि राज्यों की वित्तीय स्थिति नियंत्रित रखना जरूरी है. ताकि आर्थिक अनुशासन बना रहे.
इसी तरह पिछले कुछ वर्षों में राज्यपाल का पद केंद्र और राज्यों के बीच सबसे बड़ा राजनीतिक विवाद बन गया है. विपक्षी राज्यों का आरोप है कि केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल निर्वाचित सरकारों के फैसलों में हस्तक्षेप करते हैं. सबसे ज्यादा विवाद विधानसभा से पारित विधेयकों को मंजूरी देने को लेकर हुआ.
केंद्रीय जांच एजेंसियां भी केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक टकराव का बड़ा कारण बन गई हैं.विपक्षी दलों का आरोप है कि मोदी सरकार ED, CBI और आयकर विभाग का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने के लिए करती है. केंद्र सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कहती है कि एजेंसियां भ्रष्टाचार के खिलाफ स्वतंत्र कार्रवाई कर रही हैं.
दरअसल, केंद्र और राज्यों के बीच जारी विवाद अब सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है. वित्तीय अधिकार, राज्यपाल की भूमिका, जांच एजेंसियां, कानून बनाने की शक्ति और भाषा नीति जैसे मुद्दे देश के संघीय ढांचे की परीक्षा ले रहे हैं. विपक्ष इसे "राज्यों के अधिकारों की लड़ाई" बता रहा है, जबकि केंद्र इसे "सहकारी संघवाद और राष्ट्रीय नीति के लिए जरूरी कदम" बता रहा है.




