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'मराठी सीखो वरना...', मुंबई की सड़कों पर शुरू हुई चेकिंग, कब-कब इस मामले ने पकड़ा तूल?

Mumbai में Marathi language को लेकर विवाद फिर गरमा गया है. Auto Taxi Drivers की जांच से लेकर Marathi Manoos, MNS और North Indian migrants से जुड़े पुराने विवादों तक, जानिए इस मुद्दे का पूरा इतिहास.

मराठी सीखो वरना..., मुंबई की सड़कों पर शुरू हुई चेकिंग, कब-कब इस मामले ने पकड़ा तूल?
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मुंबई में ऑटो-टैक्सी ड्राइवरों के लिए मराठी की अनिवार्यता का मामला अब सिर्फ भाषा का मुद्दा नहीं रह गया है. अब इसके केंद्र में प्रवासी ड्राइवरों की रोजी-रोटी, महाराष्ट्र की भाषाई अस्मिता और सियासत आ गए हैं. महाराष्ट्र सरकार ने सार्वजनिक परिवहन से जुड़े ड्राइवरों के लिए मराठी की working knowledge को जरूरी किया है. अब RTO सड़क पर ड्राइवरों की भाषा क्षमता जांच रहा है. जो ड्राइवर जरूरी स्तर की मराठी नहीं बता पा रहे हैं, उन्हें नोटिस दिया जा रहा है और सुधार के लिए समय दिया जा रहा है.

मौजूदा कार्रवाई क्या है?

20 अगस्त 2026 से महाराष्ट्र में इस नियम की जमीन पर जांच तेज हुई. RTO की flying squads ने ऑटो, टैक्सी और अन्य commercial passenger vehicle drivers की practical Marathi जांच शुरू की. मुंबई में 1,430 ड्राइवरों की जांच की गई, जिनमें 422 को पर्याप्त मराठी न आने पर नोटिस दिया गया. राज्य स्तर पर 1,268 ड्राइवरों को नोटिस दिए जाने की जानकारी सामने आई है. नोटिस पाने वालों को मराठी सुधारने के लिए एक महीने का समय दिया गया है और अनुपालन न करने पर driving badge को तीन महीने के लिए suspend किए जाने की बात कही गई है. यह statewide drive 30 सितंबर तक चलने वाली है.

नियमों का पालन नहीं करने वाले ड्राइवरों को नोटिस और आगे बैज निलंबन जैसी कार्रवाई का प्रावधान सामने आया. इस फैसले के बाद ऑटो-टैक्सी यूनियनों, विपक्षी दलों और प्रवासी समुदायों ने सवाल उठाए, जबकि सरकार ने इसे यात्रियों और ड्राइवरों के बीच बेहतर संवाद के लिए जरूरी कदम बताया.

टेस्ट में क्या पूछा जा रहा है?

ड्राइवरों की working knowledge जांचने के लिए 16 सवालों का टेस्ट रखा गया है. इसका मकसद यह देखना है कि ड्राइवर यात्री से मराठी में सामान्य बातचीत कर सकता है या नहीं. सरकार का कहना है कि यह साहित्य या कठिन व्याकरण की परीक्षा नहीं है, बल्कि रोजमर्रा के काम में इस्तेमाल होने वाली भाषा की समझ जांची जा रही है. पहले दिन मुंबई महानगर क्षेत्र में करीब 85 फीसदी ड्राइवर टेस्ट में पास हुए.

नए ड्राइवरों के लिए नियम और सख्त है. 20 अगस्त से नए ऑटो-टैक्सी बैज के लिए मराठी भाषा सत्यापन की प्रक्रिया की वीडियोग्राफी शुरू की गई है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जांच वास्तविक रूप से हुई है.

कहां से शुरू हुआ पूरा विवाद?

इस विवाद की मौजूदा शुरुआत अप्रैल 2026 में हुई. महाराष्ट्र सरकार ने ऑटो और टैक्सी ड्राइवरों के लिए मराठी की जानकारी अनिवार्य करने की दिशा में कदम उठाया. परिवहन विभाग ने Maharashtra Motor Vehicles Rules, 1989 में बदलाव की तैयारी की और public service vehicle drivers के लिए स्थानीय भाषा की जानकारी जरूरी करने की बात कही. इसमें ऑटो, काली-पीली टैक्सी और aggregator cabs तक शामिल थे.

11 अप्रैल को इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग पकड़ लिया. शिवसेना नेता शाइना एनसी ने सरकार के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि राज्य में काम करने वाले service providers को स्थानीय भाषा में संवाद करने में सक्षम होना चाहिए. वहीं कांग्रेस, NCP-SP और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने इसे विभाजनकारी कदम बताते हुए विरोध किया.

27 अप्रैल को ऑटो-टैक्सी यूनियनों ने सरकार के खिलाफ विरोध की तैयारी शुरू कर दी. यूनियनों का आरोप था कि यह नियम migrant workers को परेशान कर सकता है. इसके बाद परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने यूनियनों से बातचीत की. सरकार ने ड्राइवरों को अतिरिक्त समय देने की बात कही और कहा कि किसी की रोजी-रोटी प्रभावित नहीं होने दी जाएगी.

1 मई से क्या हुआ?

1 मई से महाराष्ट्र परिवहन विभाग ने 100 दिन की statewide verification drive शुरू की. इसका उद्देश्य केवल भाषा जांच नहीं था, बल्कि परमिट और लाइसेंस की नियमित जांच के साथ ड्राइवरों की मराठी की working knowledge को भी verify करना था. शुरुआत में कार्रवाई सीमित रही, लेकिन इसके बाद व्यवस्था को चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया.

अगस्त में मामला फिर क्यों गरमाया?

15 अगस्त तक मराठी training programme के तहत बड़ी संख्या में ड्राइवरों ने प्रशिक्षण और परीक्षा पूरी कर ली थी. करीब 1.65 लाख आवेदन आए थे और 1,40,423 ड्राइवर training और proficiency test पूरा कर चुके थे. हालांकि 7,750 ड्राइवर टेस्ट में फेल हुए और करीब 17,427 अभी training पूरी नहीं कर पाए थे. मुंबई में सबसे ज्यादा 9,196 ड्राइवरों का training/certification pending था.

इसके बाद 20 अगस्त से सड़क पर actual verification शुरू हुई. यहीं से “मराठी सीखो वरना...” वाला सवाल ज्यादा तेज हुआ, क्योंकि अब मामला सिर्फ training centre या certificate तक सीमित नहीं रहा, बल्कि RTO की टीम सीधे ड्राइवरों की जांच कर रही है.

यूपी-बिहार के लोगों पर असर क्या?

मुंबई की ऑटो-टैक्सी और cab economy में दूसरे राज्यों से आए लोगों की बड़ी मौजूदगी है. इसलिए नियम का सबसे ज्यादा असर उन ड्राइवरों पर पड़ने की आशंका है जिनकी मातृभाषा मराठी नहीं है. कई यूनियनों का कहना है कि स्थानीय भाषा सीखना गलत नहीं है, लेकिन भाषा के आधार पर रोजी-रोटी पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए. इसी वजह से unions ने सरकार से ज्यादा समय और training support की मांग की थी.

दूसरी तरफ सरकार का तर्क है कि मुंबई में ऑटो-टैक्सी ड्राइवर सीधे जनता से जुड़े service providers हैं. यात्री और ड्राइवर के बीच बुनियादी संवाद के लिए स्थानीय भाषा की जानकारी जरूरी है. सरकार इसे किसी समुदाय के खिलाफ कार्रवाई नहीं, बल्कि public transport service की requirement के रूप में पेश कर रही है.

विरोधी दलों का रुख क्या?

कांग्रेस, NCP-SP और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने अप्रैल में ही सरकार के फैसले का विरोध किया था. उनका कहना था कि महाराष्ट्र की पहचान मराठी है, लेकिन इसके नाम पर दूसरे राज्यों से आए लोगों को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए. NCP-SP के फहद अहमद और समाजवादी पार्टी के रईस शेख ने भी अनिवार्यता के खिलाफ आवाज उठाई थी. सरकार और सत्तारूढ़ खेमे का कहना है कि मराठी सीखना महाराष्ट्र में काम करने वाले लोगों के लिए स्वाभाविक जरूरत है. शिवसेना की शाइना एनसी ने भी इस नीति का समर्थन किया था.

यह विवाद पहली बार नहीं है

महाराष्ट्र में “मराठी बनाम गैर-मराठी” की राजनीति पुरानी है. 2008 में राज ठाकरे की MNS की उत्तर भारतीयों के खिलाफ मुहिम ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस बना दिया था. रेलवे भर्ती परीक्षा देने आए उत्तर भारतीय उम्मीदवारों पर हमले और उसके बाद हुई राजनीतिक बयानबाजी ने यूपी-बिहार बनाम महाराष्ट्र की बहस को काफी तेज किया.

2025 में भी भाषा का विवाद फिर उभरा. महाराष्ट्र में स्कूलों में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में लागू करने की सरकार की नीति के खिलाफ राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे एक मंच पर आए. दोनों ने हिंदी थोपे जाने का विरोध किया और आंदोलन किया. बाद में सरकार ने विवादित नीति को वापस लिया.

अब 2026 में विवाद का नया चेहरा ऑटो-टैक्सी ड्राइवरों की मराठी जांच है. फर्क इतना है कि इस बार सवाल सिर्फ राजनीतिक नारों का नहीं, बल्कि लाइसेंस, बैज और रोजी-रोटी से जुड़ी कार्रवाई का है. यही वजह है कि यूपी-बिहार के प्रवासी ड्राइवरों, यूनियनों, विपक्ष और मराठी संगठनों सभी की नजर इस कार्रवाई पर है.

मराठी को लेकर कब-कब बड़ा विवाद हुआ?

महाराष्ट्र में मराठी भाषा और स्थानीय अस्मिता का मुद्दा कई दशकों से राजनीति के केंद्र में रहा है. इसकी शुरुआत अलग महाराष्ट्र राज्य की मांग से हुई और बाद में यह स्थानीय रोजगार, प्रवासियों और भाषा से जुड़े विवादों तक पहुंचा.

  • 1956–1960: संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के दौरान मराठी भाषियों के लिए अलग राज्य और मुंबई को महाराष्ट्र में शामिल करने की मांग ने जोर पकड़ा. आंदोलन में बड़े प्रदर्शन और झड़पें हुईं.
  • 1 मई 1960: बॉम्बे राज्य का विभाजन हुआ और महाराष्ट्र तथा गुजरात दो अलग राज्य बने. मुंबई को महाराष्ट्र की राजधानी बनाया गया.
  • 1966: बाल ठाकरे ने शिवसेना बनाई और ‘मराठी मानूस’ को राजनीतिक मुद्दा बनाया. मुंबई में स्थानीय लोगों के रोजगार और अधिकारों को लेकर दक्षिण भारतीय समुदाय के खिलाफ अभियान भी चला.
  • 2006: राज ठाकरे ने शिवसेना से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) बनाई. इसके बाद मराठी अस्मिता और स्थानीय युवाओं के रोजगार का मुद्दा फिर आक्रामक राजनीति का केंद्र बना.
  • 2008: रेलवे भर्ती परीक्षा को लेकर MNS के आंदोलन ने उत्तर भारतीयों को निशाने पर ला दिया. यूपी-बिहार से आए उम्मीदवारों, ऑटो चालकों और दुकानदारों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं के बाद विवाद राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गया.
  • 2022–2024: महाराष्ट्र में दुकानों और प्रतिष्ठानों के साइनबोर्ड पर मराठी में लिखना अनिवार्य करने का मुद्दा गरमाया. नियम लागू कराने को लेकर कार्रवाई और जुर्माने की प्रक्रिया भी चली.
  • जुलाई 2025: मराठी भाषा को लेकर मुंबई, ठाणे और मीरा रोड में कथित मारपीट और विवादों ने फिर तूल पकड़ा. इसी दौरान राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे मराठी अस्मिता के मुद्दे पर एक मंच पर आए.
  • अप्रैल 2026: ऑटो-टैक्सी ड्राइवरों के लिए मराठी की जानकारी अनिवार्य करने का फैसला सामने आया. सरकार ने इसे यात्रियों से बेहतर संवाद और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था से जोड़ा, जबकि विपक्ष और यूनियनों ने रोजी-रोटी पर असर की आशंका जताई.
  • अगस्त 2026: RTO ने ऑटो-टैक्सी ड्राइवरों की मराठी की working knowledge की सड़क पर जांच शुरू कर दी. टेस्ट में पर्याप्त प्रदर्शन नहीं करने वालों को नोटिस और आगे बैज निलंबन की कार्रवाई का प्रावधान रखा गया. इसके साथ मराठी भाषा बनाम रोजगार और प्रवासी अधिकारों की बहस फिर तेज हो गई.
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