बंगाल ही हाथ से नहीं गया, क्या ममता का मुर्शिदाबाद किला भी ढहा, हुमायूं कबीर ने कितनी दी चोट?
मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर नाओदा और रेजिनगर दोनों सीटों पर आगे, क्या ममता बनर्जी का किला टूट रहा है? जानिए उपचुनाव 2026 के ताजा हाल.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुर्शिदाबाद हमेशा से ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है. लेकिन 2026 के उपचुनाव के रुझानों ने इस ‘किले’ में दरार के संकेत दे दिए हैं. टीएमसी से निष्कासित नेता हुमायूं कबीर अपनी नई पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी के बैनर तले नाओदा और रेजिनगर सीट पर बढ़त बनाए हुए हैं. यह बढ़त न सिर्फ राजनीतिक समीकरण बदल रही है, बल्कि राज्य में टीएमसी के भविष्य को लेकर भी सवाल खड़े कर रही है.
दोनों सीटों पर कबीर की मजबूत बढ़त
रेजिनगर सीट पर शुरुआती रुझानों में ही हुमायूं कबीर ने बढ़त बना ली थी, जो हर राउंड के साथ मजबूत होती गई. 15 में से 8 राउंड की गिनती के बाद वे बीजेपी उम्मीदवार बापन घोष से 37,549 वोटों से आगे चल रहे हैं और 70,910 वोट हासिल कर चुके हैं.
वहीं, नाओदा सीट पर भी 20 में से 11 राउंड की गिनती के बाद हुमायूं कबीर, टीएमसी उम्मीदवार से 19 हजार से अधिक वोटों से आगे हैं और उन्हें अब तक 52,759 वोट मिल चुके हैं. दोनों सीटों पर यह बढ़त साफ संकेत देती है कि मुकाबला एकतरफा होता जा रहा है.
निलंबन से नई पार्टी तक का सफर
हुमायूं कबीर का राजनीतिक सफर हाल के महीनों में काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है. 6 दिसंबर 2025 को मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के मॉडल पर एक प्रतीकात्मक ढांचे की नींव रखने के बाद उन्हें टीएमसी से निलंबित कर दिया गया था. इसके बाद उन्होंने ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ (AJUP) का गठन किया और खुद को “स्थानीय आवाज” के तौर पर पेश किया. कबीर का कहना है कि उनका यह कदम धार्मिक नहीं, बल्कि “पहचान और सम्मान” की राजनीति का हिस्सा था.
ममता सरकार के खिलाफ असंतोष का असर?
कबीर ने अपनी चुनावी रैलियों में लगातार यह आरोप लगाया कि राज्य सरकार अल्पसंख्यकों के मुद्दों को लेकर संवेदनशील नहीं रही है. हालांकि, टीएमसी इन आरोपों को खारिज करती रही है, लेकिन मौजूदा रुझान यह दिखाते हैं कि जमीनी स्तर पर कुछ असंतोष जरूर मौजूद है. विशेषज्ञ मानते हैं कि स्थानीय नेतृत्व और उम्मीदवार की छवि इस चुनाव में बड़ी भूमिका निभा रही है, जहां कबीर ने खुद को “बाहरी राजनीति” के खिलाफ एक विकल्प के रूप में स्थापित किया.
क्या सच में हिल गया TMC का किला?
मुर्शिदाबाद को लंबे समय से टीएमसी का सुरक्षित क्षेत्र माना जाता रहा है, लेकिन इन नतीजों ने इस धारणा को चुनौती दी है. अगर यह रुझान नतीजों में बदलते हैं, तो यह सिर्फ दो सीटों की हार नहीं होगी, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जाएगा. यह संदेश यह होगा कि बंगाल में अब क्षेत्रीय स्तर पर नए खिलाड़ी भी प्रभाव डाल सकते हैं और स्थापित दलों के लिए चुनौती खड़ी कर सकते हैं.
हुमायूं कबीर की बढ़त सिर्फ एक चुनावी आंकड़ा नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत है. मुर्शिदाबाद में जो कभी अटूट किला माना जाता था, वहां अब मुकाबला खुला नजर आ रहा है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बदलाव अस्थायी है या बंगाल की राजनीति में किसी बड़े परिवर्तन की शुरुआत.




