ममता बनर्जी बोलीं- नहीं दूंगी इस्तीफा, तो कब तक रह सकती हैं CM, क्या कहते हैं कायदे-कानून?
ममता बनर्जी के इस्तीफा न देने पर उठे सवालों के बीच जानिए संविधान क्या कहता है, मुख्यमंत्री कब तक पद पर रह सकता है और कब देना पड़ता है इस्तीफा. जानें सबकुछ.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस वक्त नया विवाद खड़ा हो गया, जब ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने चुनावी हार के बाद भी साफ कर दिया कि वे इस्तीफा नहीं देंगी. इस बयान ने संवैधानिक और राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है. क्या कोई मुख्यमंत्री हार के बाद भी पद पर बना रह सकता है? क्या यह नियमों के खिलाफ है या संविधान इसकी अनुमति देता है? भारतीय लोकतंत्र में जनादेश और संवैधानिक प्रक्रिया के बीच संतुलन कैसे काम करता है, यह समझना यहां बेहद जरूरी हो जाता है. इसी बीच कानूनी विशेषज्ञ व वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि यह मुद्दा और ममता बनर्जी के नए रुख से दिलचस्प हो गया है.
क्या हार के बाद भी मुख्यमंत्री पद पर बने रह सकते हैं?
टीएमसी प्रमुख Mamata Banerjee का चुनावी हार के बावजूद यह कहना कि “इस्तीफा नहीं दूंगी” खुद ब खुद सवाल उठाता है कि क्या चुनावी हार के बावजूद कोई मुख्यमंत्री पद पर बना रह सकता है या नहीं. भारतीय व्यवस्था में मुख्यमंत्री सीधे जनता द्वारा नहीं चुना जाता, बल्कि वह विधानसभा में बहुमत रखने वाले दल या गठबंधन का नेता होता है. चूंकि नई विधानसभा और सरकार के गठन के लिए चुनाव कराए गए और उनके परिणाम सामने आ गए हैं, इसलिए उनका आगे भी सीएम बने रहना संभव नहीं है. जैसे ही विजेता दल या गठबंधन का नेता राज्यपाल के पास सरकार गठन के दावा पेश करेगा, प्रदेश के राज्यपाल उन्हें शपथ दिला देंगे.
संविधान क्या कहता है?
भारतीय संविधान के अनुसार मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, लेकिन उनका पद विधानसभा के विश्वास पर टिका होता है. संवैधानिक रूप से मुख्यमंत्री तब तक पद पर बने रहते हैं, जब तक उन्हें सदन का समर्थन प्राप्त है. “प्लेजर ऑफ गवर्नर” की बात जरूर कही जाती है, लेकिन व्यवहार में यह बहुमत के सिद्धांत से जुड़ी होती है. यहां पर बात अलग है. नई विधानसभा और सरकार के गठन के लिए चुनाव कराए गए हैं. ममता बनर्जी चुनाव हार गई है. यानी जनमत उनके पास नहीं है. यानि जनमत अब बीजेपी के पक्ष में है. ऐसे में वो कोई भी फैसला लें, उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है.
किन परिस्थितियों में देना पड़ता है इस्तीफा?
मुख्यमंत्री को इस्तीफा तब देना पड़ता है, जब वे विधानसभा में बहुमत खो देते हैं. यदि फ्लोर टेस्ट में हार हो जाए, गठबंधन टूट जाए या विधायक समर्थन वापस ले लें, तो मुख्यमंत्री के पास पद छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता. ऐसी स्थिति में राज्यपाल हस्तक्षेप कर सकते हैं और बहुमत साबित करने को कह सकते हैं. यहां पर मामला ही अलग है.
क्या तय होता है कार्यकाल?
मुख्यमंत्री का कार्यकाल सामान्यतः विधानसभा के पांच साल के कार्यकाल के बराबर माना जाता है. इस विधानसभा का कार्यकाल भी समाप्त होने वाला है. लेकिन यह पूरी तरह निश्चित नहीं है. यदि बीच में बहुमत खत्म हो जाता है, तो कार्यकाल तुरंत समाप्त हो सकता है. वहीं, अगर बहुमत बना रहता है, तो मुख्यमंत्री पूरा कार्यकाल पूरा कर सकते हैं.
यहां पर सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया है. पश्चिम बंगाल की 17वीं विधानसभा का कार्यकाल 7 मई 2026 को समाप्त होना है. वर्तमान विधानसभा (2021-2026) के लिए चुनाव 2021 में हुए थे और इसका 5 वर्षीय कार्यकाल मई 2026 में पूरा होगा, जिसके लिए नए चुनाव अप्रैल 2026 में चुनाव कराए और चार मई को चुनाव परिणाम भी आ गए हैं.
'ममता इस्तीफा दें या ना दें, सरकार के गठन में फर्क नहीं पड़ेगा'
ममता बनर्जी के रुख से उत्पन्न स्थिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट के चर्चित अधिवक्ता और बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि आजाद भारत के इतिहास में यह पहला मामला है. अभी तक किसी आउटगोइंग सीएम ने ऐसा रुख अख्तियार नहीं किया, जब किसी राज्य का आउटगोइंग सीएम चुनाव हार गया हो और सीएम पद से इस्तीाफ देने से इनकार कर दे. उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी नियम कानूनों को तोड़ने वाली नेता हैं. भारतीय राजनीति में उनकी पहचान यही है. इस्तीफा न देने का फैसला तुनकमिजाजी के अलावा कुछ नहीं है. इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा.
उन्होंने आगे कहा कि चुनावी हार के बाद सीएम का इस्तीफा देना नैतिकता का मामला होता है. वो इस्तीफा ना भी दें, जैसाकि उन्होंने कहा है, तो भी इस मामले में सीएम का डीम्ड इस्तीफा मान लिया जाएगा. जैसे ही चुनावी जीत हासिल करने वाले दल का नेता या गठबंधन का नेता सरकार बनाने का दावा करेगा, राज्यपाल नियमों के मुताबिक उन्हें शपथ दिलाएंगे.




