कभी कांग्रेस का हाथ तो कभी BJP का साथ, ऐसे बनीं बंगाल की धुरंधर; कहानी '29 साल' की ममता की जिसने लेफ्ट को पाताल में गाड़ दिया
ममता बनर्जी की कहानी संघर्ष, हमलों और जिद की मिसाल है. 1990 में जानलेवा हमले के बाद भी वह पीछे नहीं हटीं और सड़क से लेकर संसद तक अपनी पहचान बनाई. कांग्रेस से शुरुआत कर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस बनाई और 34 साल पुरानी वाम सरकार को उखाड़कर बंगाल की सत्ता हासिल की. ‘दीदी’ की राजनीति जमीनी आंदोलनों, आक्रामक तेवर और जनता से सीधे जुड़ाव पर टिकी रही. आज भी वह भारतीय राजनीति की सबसे मजबूत और जुझारू नेताओं में गिनी जाती हैं. आइए जानते हैं उनके चर्चित किस्से...
12 अगस्त 1990 दोपहर का वक्त दिल्ली की सियासत अपने रोज़मर्रा के काम में उलझी हुई थी. लेकिन उसी वक्त राजधानी दिल्ली के कांग्रेस दफ्तर से एक ऐसा फोन कोलकाता लगाया गया, जिसने आने वाले दिनों की राजनीति की दिशा ही बदल दी. फोन के दूसरी तरफ थीं ममता बनर्जी और फोन करने वाले थे Vincent George, जो उस समय राजीव गांधी के बेहद करीबी और भरोसेमंद सहयोगी माने जाते थे.
जैसे ही कॉल कनेक्ट हुआ, उधर से एक साफ अक्षरों में आ आई कि 'आपकी हत्या की साजिश रची जा रही है, तुरंत दिल्ली आ जाइए.' यह कोई अफवाह नहीं थी. यह सत्ता के सबसे ऊपरी गलियारों से आई एक वॉर्निंग थी. अगले ही दिन ममता बनर्जी दिल्ली पहुंचीं. उनकी मुलाकात खुद राजीव गांधी से हुई. और यहां जो बात कही गई, उसने खतरे को और भी साफ कर दिया.
राजीव गांधी ने ममता बनर्जी से कहा कि 'तुम्हें मारने की प्लानिंग हो चुकी है, कोलकाता मत जाओ यहीं ठहर जाओ लेकिन जवाब वहीं था जो आगे चलकर ममता की पहचान बना. मेरे लोग मेरा इंतजार कर रहे हैं… मुझे वापस जाना ही होगा.' और फिर सिर्फ 4 दिन बाद… 16 अगस्त 1990 को… वही ममता बनर्जी, सफेद सूती साड़ी और हवाई चप्पल में, कोलकाता की सड़कों पर हजारों लोगों के बीच खड़ी थीं.
ये दक्षिण कोलकाता का हाजरा इलाका था जहां भीड़ नारे में बिजी और माहौल पूरी तरह से गरम था तभी उस भीड में कुछ ऐसा हुआ जो कि जिससे सबकुछ बदल गया. आगे बताते चले कि भीड़ से निकले कुछ लोग ममता पर ही टूट पड़े और हमला कर दिया है यह कोई साधारण हमला नहीं था एक सोची समझी साजिश थी. जो ममता को खत्म कर देने की थी इस हमले में लालू आलम नाम के एक व्यक्ति ने ममता के सिर पर कई बार रॉड से वार कर दिया जिसके बाद ममता ने सिर बचाने के कोशिश की लेकिन बार -बार सिर पर वार करने से ममता सड़क पर ही बेहोश होकर गिर गई फिर क्या? कुछ ही देर में खबर पूरे पश्चिम बंगाल में फैल चुकी थी- 'ममता बनर्जी की हत्या हो गई…'
डॉक्टरों ने भी लगभग उम्मीद छोड़ दी थी. लेकिन किस्मत को कुछ ही और मंजूर था और फिर यहीं खत्म होने वाली चिंगारी ने शोले में तबदील हो गई कुछ दिनों बाद...उसी कोलकाता की सड़कों पर… सिर पर पट्टी बांधे… वहीं ममता बनर्जी फिर से खड़ी थीं… नारे लगा रही थीं… और लड़ाई जारी थी. यही वो पल था… जहां से एक नेता नहीं… बल्कि एक जिद पैदा हुई- 'टूट जाऊंगी… लेकिन झुकूंगी नहीं. किस्से नेताओं की इस कहानी में आज हम ममता बनर्जी की कुछ किस्से पेश करने जा रहे हैं तो आइए एक नजर डालते है...
आज की इस खास कहानी में हम आपको उस महिला की पूरी कहानी बताने जा रहे हैं, जिसने एक आम कार्यकर्ता से लेकर सत्ता के शिखर तक का सफर तय किया… और रास्ते में हर चुनौती को सीने से टकराकर पार किया. वो महिला… जो कभी कांग्रेस की कार्यकर्ता थी. फिर सांसद बनी… फिर उसी पार्टी से अलग होकर अपनी नई राजनीतिक पहचान बनाई और अंत में उसी राज्य की सत्ता पर काबिज हो गई, जहां कभी उसका कोई आधार नहीं माना जाता था. यह कहानी है- पश्चिम बंगाल की तीन बार मुख्यमंत्री रह चुकी ममता बनर्जी की है. एक ऐसी नेता, जिनकी राजनीति सिर्फ सत्ता नहीं… बल्कि संघर्ष, जिद और सड़कों से निकली ताकत की कहानी है.
बचपन और शुरुआती सफर
कोलकाता के पास एक साधारण से परिवार में जन्मी ममता बनर्जी का बचपन किसी राजनीतिक विरासत से नहीं, बल्कि संघर्ष से शुरू हुआ था. उनके पिता, प्रोमलेश्वर बनर्जी, स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े हुए थे. यही वजह थी कि घर में बचपन से ही देश, समाज और राजनीति की बातें होती थीं. लेकिन जिंदगी ने जल्दी ही उन्हें सख्त बना दिया. जब ममता महज 17 साल की थीं, तभी उनके पिता का निधन हो गया. परिवार पर आर्थिक संकट टूट पड़ा. छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी ली, घर का बोझ- सब कुछ एक साथ आ गया. उनके बड़े भाई ने पुश्तैनी जमीन बेचकर परिवार को संभाला और ममता ने पढ़ाई के साथ-साथ अपने सपनों को जिंदा रखा. उन्होंने कोलकाता के जोगो माया देवी कॉलेज से इतिहास में ग्रेजुएशन किया. फिर कोलकाता विश्वविद्यालय से इस्लामिक हिस्ट्री में पोस्ट ग्रेजुएशन किया और यहीं से उनके राजनीति की चिंगारी भड़क उठी.
छात्र राजनीति और बगावती अंदाज़
ममता का झुकाव शुरू से ही कांग्रेस की ओर था. इसका कारण था कि उनके पिता भी पुराने कांग्रेसी थे, और यही असर उन पर भी पड़ा. लेकिन उस समय पश्चिम बंगाल के कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में वामपंथी छात्र संगठनों का दबदबा था… खासकर DSO (डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन) का. ममता ने इस दबदबे को चुनौती दी. उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर ‘छात्र परिषद’ बनाई. एक ऐसा संगठन, जो सीधे कांग्रेस की विचारधारा से जुड़ा था. यह सिर्फ संगठन नहीं था. यह एक टक्कर थी. विचारधारा की. इसी दौरान देश में एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ.
Jayaprakash Narayan की 'संपूर्ण क्रांति'. जब जेपी कोलकाता यूनिवर्सिटी पहुंचे. तब ममता बनर्जी ने उनका विरोध करने के लिए जो किया, उसने सबको चौंका दिया. वो सीधे उनकी गाड़ी पर चढ़ गईं. फिर क्या अगले दिन अखबारों में तस्वीरें जिसके बाद ममता की हर तरह खूब चर्चा होने लगी की ये लड़की कौन है. एक नया चेहरा चर्चा में था- एक ऐसी लड़की, जो डरना नहीं जानती थी. बात करें ममता बनर्जी की राजनीतिक सफर की तो सिर्फ 21 साल की उम्र में… 1976 में… ममता बनर्जी को महिला कांग्रेस का महासचिव बना दिया गया. यह उनके राजनीतिक करियर की औपचारिक शुरुआत थी. लेकिन खास बात यह थी कि उन्होंने कभी पढ़ाई नहीं छोड़ी. ग्रेजुएशन… पोस्ट ग्रेजुएशन… बीएड… और फिर लॉ की पढ़ाई की सब कुछ साथ-साथ चलता रहा. यही लॉ की पढ़ाई… सालों बाद… देश की सबसे बड़ी अदालत में उनके काम भी आने वाली इस बात का शायद अंदाजा उन्हें भी नहीं रहा होगा.
सत्ता, संघर्ष और 'दीदी' का उभार- कहानी का वो मोड़ जिसने सब बदल दिया
साल 1977… भारतीय राजनीति का एक ऐसा साल, जिसने सत्ता के नक्शे को ही पलट कर रख दिया. देश में गुस्सा था, सड़कों पर उबाल था और उस उबाल की अगुवाई कर रहे थे जयप्रकाश नारायण. उनकी 'संपूर्ण क्रांति' सिर्फ एक नारा नहीं रही, बल्कि वो लहर बन गई जिसने पूरे देश में कांग्रेस की जड़ों को हिला दिया. उस दौर में इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के फैसले ने जनता के भीतर असंतोष भर दिया था. दिलचस्प बात ये थी कि वामपंथ भी उस समय दो हिस्सों में बंटा हुआ था. एक तरफ Communist Party of India, जो इमरजेंसी के साथ खड़ा था, और दूसरी तरफ Communist Party of India (Marxist), जिसने खुलकर विरोध किया.
देशभर में कांग्रेस का किला ढहने की कंगार पर आ चुका था. दिल्ली में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी और पश्चिम बंगाल में वामपंथी सत्ता का झंडा लहराया. यही वो शुरुआत थी, जिसने बंगाल में 34 साल तक चलने वाले लेफ्ट शासन की नींव रखी. लेकिन… उसी दौर में, कोलकाता की गलियों में एक और कहानी चुपचाप लिखी जा रही थी. एक लड़की… जो कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ दीवारों पर पोस्टर लगा रही थी और सीपीएम के खिलाफ नारे लगा रही थी जिसका नाम था ममता बनर्जी...
1984: जब ‘असंभव’ को ममता ने चुनौती दी
इस तरह समय धीरे-धीरे गुजर रहा था और अब वक्त आया साल 1984 का जिस सदमें में आज भी पूरा देश है ये वहीं साल है जिस वर्ष में इंदिरा गांधी की हत्या हो चुकी थी. सहानुभूति की लहर पूरे देश में कांग्रेस के पक्ष में थी और पार्टी की कमान अब राजीव गांधी के हाथों में थी. दिल्ली में एक कमरे के भीतर उम्मीदवारों की लिस्ट तैयार हो रही थी. राजीव गांधी अपने करीबी अरुण नेहरू के साथ बैठे थे. माहौल गंभीर था… तभी अचानक दरवाजा खुलता है. एक तेज आवाज… नारे… और एक लड़की बिना किसी डर के कमरे के अंदर दाखिल होती है. ये कोई और नहीं ममता बनर्जी थी.
उसकी बेबाकी अंदाज को देखकर राजीव गांधी भी हैरान रह गए. उन्होंने अरुण नेहरू से पूछा-ये कौन है? जवाब मिला-'हिम्मत देखिए इसकी… अगर ये यहां घुस सकती है, तो राजनीति में भी कुछ बड़ा कर सकती है.' यहीं से एक फैसला हुआ- ममता को जाधवपुर से चुनाव लड़ाया जाए… सामने होंगे सीपीएम के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी. के खिलाफ मैदान में उतार दिया था. सबको पता था… ये लड़ाई लगभग नामुमकिन है. लेकिन ममता के लिए 'नामुमकिन' शब्द शायद बना ही नहीं था.
जब 29 साल की लड़की ने 'लेफ्ट के किले' में सेंध लगा दी
चुनाव हुआ… और नतीजे ने सबको चौंका दिया. जिसे 'सिर्फ टक्कर देने' के लिए उतारा गया था, उसने इतिहास लिख दिया. ममता बनर्जी ने सोमनाथ चटर्जी को 19,660 वोटों से हरा दिया. पूरा देश हैरान था. कोलकाता से लेकर दिल्ली तक एक ही चर्चा 'क्या सच में एक 29 साल की लड़की ने लेफ्ट के सबसे मजबूत किले को हिला दिया? ममता पहली बार संसद पहुंची और इस दौरान उनका अंदाज अलग ही था.
लोकसभा में जब विपक्षी नेता उन्हें बीच-बीच में टोकते, तो ममता चुप नहीं बैठती थीं. एक बार तो उन्होंने अपनी कलाई से चूड़ी उतारकर मधु दंडवते के सामने रख दी और कहा कि 'अगर हिम्मत नहीं है, तो ये पहन कर बैठ जाइए.' ये सिर्फ जवाब नहीं था… ये उस तेवर का ऐलान था, जो आगे चलकर बंगाल की राजनीति को बदलने वाला था. अब बात करते हैं 1989 की जब कांग्रेस हार गई और ममता भी चुनाव हार गई लेकिन ममता ने हार नहीं मानी. बोफोर्स घोटाला ने सरकार की साख गिरा दी थी. खुद वीपी सिंह बगावत कर चुके थे. लेकिन फर्क यहां था. हार के बाद जहां कई नेता गायब हो जाते हैं, ममता और ज्यादा सड़कों पर दिखने लगीं.
- हाथ में तख्तियां…
- आवाज़ में गुस्सा…
- और टारगेट- सीपीएम.
ये वे समय था जब ममता का कद बढ़ रहा था और विरोधी भी देख नहीं पा रहे थे और फिर साल 1990 में ममता को मरने की साजिश हुई और दीदी का एक खतरनाक रोल सामने आया है. जैसे- जैसे ममता का असर बढ़ा वैसे-वैसे उन पर खतरा बढ़ने लगा. हालात ऐसे हो गए कि उनके खिलाफ साजिशें रची जाने लगीं. दिल्ली तक खबर पहुंची… और 12 अगस्त 1990 को राजीव गांधी के निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज ने ममता को फोन किया.
मैसेज साफ था 'आपकी हत्या की योजना बन रही है… तुरंत दिल्ली आ जाइए.' इस दौरान ममता बनर्जी दिल्ली आईं और राजीव गांधी से मुलाकात की. राजीव गांधी ने कहा कि कोलकाता मत जाओ यहीं रुक जाओं वहां तुम्हारे खिलाफ साजिश हो रही लेकिन ममता ने उनकी एक न सुनी है और सीधा जवाब दिया कि मेरा लोग मेरा इंतजार कर रहे हैं. इसके बाद फिर वो लौट गईं. फिर वहीं हुआ जिसका डर था. कोलकाता जल रहा था और ये बवाल बस किराए की बढ़ोतरी के खिलाफ सड़कों पर हल्ला बोल प्रदर्शन हो रहा था उसी आंदोलन की अगुवाई कर रही थी ममता बनर्जी हालांकि उन्हें पहले से ही बता था कि उन्हें खतरा है लेकिन वो नहीं रुकी जैसे की ममता हाजरा इलाके में पहुंचीं तो भीड़ में हलचल हुई और उन पर हमला हो गया. ममता पर लोहे की रॉड से लगातार कई बार हमला हुआ फिर खून अफरा -तफरी और फिर सन्नाटा पूरे बंगाल में हल्ला मच गया कि ममता बनर्जी की हत्या हो गई लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. यहीं से ममता का एक नया अध्याय शुरु हुआ जिसके बाद ममता ने ममता दीदी नाम से खूब चर्चा में आ गई.
जब ममता बनर्जी को होश आया तो उन्होंने खुद को किसी सड़क पर नहीं बल्कि अस्पताल के बिस्तर पर पाया, चारों तरह चेहरे पर चिंता और माहौल ऐसा जैसे किसी चमत्कार का इंतजार हो. ममता बनर्जी बाद में उस दिन को याद करते हुए लिखती हैं कि पहला वार इतना तेज था कि सब कुछ हिल गया. सिर पर लोहे की रॉड… खून से भीगा शरीर…और फिर एक के बाद एक वार. बचने की कोशिश में उन्होंने अपने सिर को हाथों से ढक लिया… लेकिन हमला तब तक चलता रहा, जब तक वो बेहोश नहीं हो गईं. जब आंख खुली, तो खुद को अलीपुर के वुड्सलैंड नर्सिंग होम में पाया. डॉक्टरों की भाषा साफ थी. हालत बेहद गंभीर है… बचना मुश्किल है. लेकिन… ये वही ममता थीं, जो हार मानना नहीं जानती थीं, और यहीं से उनकी कहानी एक नेता से बढ़कर ‘सर्वाइवर’ की कहानी बन गई.
ममता को बाल पकड़कर घसीटने वाले कड़ी पर एक नजर डालते हैं...
ममता बनर्जी के सिर के घाव अभी भरे नहीं थे कि ममता फिर सड़कों पर एक रेप पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए सीधे मुख्यमंत्री आवास पर धरना दे दिया यह सिर्फ विरोध ही नहीं बल्कि खुले आम धमकी थी और यह सत्ता को रास नहीं पुलिस को बुलाया गया और फिर जो हुआ उसे हर कोई देखकर सन्न रह गया आगे महिला सांसद और केंद्रीय मंत्री को बाल पकड़कर सड़क पर घसीटा गया. इस तस्वीर ने बंगाल की राजनीति को हिला कर रख दिया. देशभर में सवाल उठने लगा इसके बाद अब ममता का नाम सिर्फ बंगाल तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि पूरे देश में चर्चित हो गया.
1996: वापसी… और फिर से जीत
1996 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने एक बार फिर मैदान संभाला. कोलकाता दक्षिण से चुनाव लड़ा और सीपीएम की भारती मुखर्जी को हराकर साबित कर दिया. ये वापसी नहीं, चेतावनी है. उधर कांग्रेस खुद अस्थिरता के दौर से गुजर रही थी. पार्टी की कमान सीताराम केसरी के हाथों में थी, जबकि सोनिया गांधी का प्रभाव अभी पूरी तरह स्थापित नहीं हुआ था और यहीं से ममता के भीतर एक नई बेचैनी जन्म लेने लगी.
1997: जब ममता ने अपनी ही पार्टी को चुनौती दे दी
9 अगस्त 1997… कोलकाता का नेताजी इंडोर स्टेडियम… कांग्रेस का बड़ा सम्मेलन… मंच पर बड़े-बड़े चेहरे. लेकिन उसी दिन, उसी शहर में… एक और मंच तैयार हो रहा था. ममता बनर्जी ने फैसला कर लिया था. अब लड़ाई सिर्फ विपक्ष से नहीं… अपनी ही पार्टी से होगी. इसके बाद उन्होंने कांग्रेस से बगावत का बिगुल फूंक दिया. तृणमूल कार्यकर्ताओं की अलग सभा बुला ली. वजह साफ थी. टिकट वितरण में भेदभाव और जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी. वो ममता… जो सालों तक कांग्रेस के झंडे तले लेफ्ट से लड़ती रही अब उसी कांग्रेस के खिलाफ खड़ी हो गई हालांकि ममता को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी, यानी कांग्रेस ने एक्शन लेते हुए 22 दिसंबर 1997 में ममता को बाहर का रास्ता दिखा दिया.
तृणमूल का जन्म- एक नई राजनीति की शुरुआत
इस बगावत ने एक नई पार्टी को जन्म दिया- All India Trinamool कांग्रेस तृणमूल’… यानी जड़ों से जुड़ी राजनीति… ग्रासरूट की ताकत. ममता ने इस नाम के जरिए साफ मैसेज दिया कि यह पार्टी ऊपर से नहीं… नीचे से उठेगी. ममता बनर्जी ने 1 जनवरी 1998 में खुद की पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया जिसके बाद कांग्रेस ने मनाना शुरू किया लेकिन ममता ने उनकी एक न सुनी और अपने फैसले पर अडिंग रहीं.
ममता को पेटिंग का शौक है और वो एक कलाकार भी हैं
बात रहे TMC के सिंबल की तो ममता को पेटिंग का शौक है और वह एक कलाकार भी है. ममता के पेटिंग वाली कहानी की बात करें तो जब के फ्लाइट से कोलकाता आ रही थीं तो उन्होंने इस दौरान एक स्क्रेच बनाया घास पर उगते हुए फूल इसे ही आगे पार्टी का चुनाव चिन्ह बना दिया यानी ममता ने खुद TMC का लोगों बनाया था. ये सिंबल एक टीएमसी का सिंबल नहीं था ये उनकी सोच को आईना दिखाने और जड़ों से उठकर खिलने की एक स्क्रीप्ट थी जो कि चर्चा में खूब रही.
जब ममता ने बीजेपी को बनाया था साथी!
बात करें 1998 में ममता की पार्टी की तो नई पार्टी नया जोश और कई चुनौतियां इस दौरान टीएमसी ने 29 सीट पर चुनाव लड़ा और 7 सीटें जीती और यहीं से ममता ने बंगाल की राजनीति में मजबूत पकड़ बनानी शुरू कर दी. इसी के साथ ममता ने एक नया साथी चुन लिया. जैसा कि ये बात सालों से चलती आ रही है कि राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता. ठीक उसी तरह इस किरदार में ममता का ये दौर सटीक बैठता है. ममता की उस उभरती हुई ताकत में NDA का साथ मिला और अटल बिहारी वाजपेई की सरकार में वो रेल मंत्री बन गई. लेकिन अभी भी उनका बेबाक अंदाज नहीं बदला बल्कि और भी आक्रामक हो चुका थी. रेल मंत्री के दौरान उन्होंने सिस्टम की खामियों तक सदन में जमकर मुद्दा उठाया. वहीं तहलका कांड के दौरान तीन मंत्रियों ने इस्तीफा दिया था जिसके कुछ दिन बाद नैतिकता के आधार पर उन्होंने इस्तीफा दिया था.
साल 2006 में UPA के साथ वापसी
इसके बाद साल 2006 में बंगाल की राजनीति में 'खेला होबे' हो गया यानी ममता ने फिर से अपना पाला बदल लिया और फिर से कांग्रेस के साथ आ गई फर्क ये था कि कभी वो कांग्रेस की सांसद हुआ करती थीं और अब वो कांग्रेस के साथ गठबंधन का रास्ता चुन लिया था. यहीं से उनकी शुरू हुई सबसे बड़ी लड़ाई और विधानसभा चुनाव में एंट्री. ये लड़ाई में सिंगूर… नंदीग्राम… जमीन के खिलाफ थी. ये आंदोलन सिर्फ विरोध नहीं था. ये ममता को 'गरीबों की नेता' बनाने वाला मोड़ था.
ममता के जीत की सीढ़ियों की...
अब बात करते हैं ममता के जीत के सीढ़ियों की तो 2009 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 26 सीटों पर चुनाव लड़ा… और 19 जीत लीं. अब साफ हो चुका था- बंगाल में सत्ता का संतुलन बदल रहा है. 2011… वो साल जिसका इंतजार ममता को सालों से था. सीपीएम का 34 साल पुराना किला अब कमजोर पड़ चुका था. ममता ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया… और चुनाव में उतर गईं. नतीजा- 294 में से 184 सीटें अकेले दम पर बहुमत. 20 मई 2011 ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. बंगाल के इतिहास में पहली बार एक महिला मुख्यमंत्री बनी और इस तरह 'दीदी' ने लाल किले को गिराकर अपना राज कायम कर दिया लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती सत्ता मिल गई और लगातार तीन बार से सत्ता पर बनी हुई हैं और अब 23 और 29 अप्रैल को चुनाव है.
35 साल पहले की एक तस्वीर… सड़कों पर संघर्ष करती, लाठियां खाती, बालों से घसीटी जाती एक महिला और फिर वही कहानी अचानक 4 फरवरी 2026 की सुबह दिल्ली में एक नया मोड़ लेती है. सुबह का वक्त… देश की सबसे बड़ी अदालत, Supreme Court of India का गेट खुलता है. सुरक्षा कड़ी है, हलचल तेज है. तभी एक सफेद कार अंदर दाखिल होती है. यह कोई आम गाड़ी नहीं थी… न उसमें कोई जज था, न कोई बड़ा वकील. उस कार में बैठी थीं बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जो आज अदालत में खुद अपनी लड़ाई लड़ने आई थीं.
10 बजकर 5 मिनट… सफेद साड़ी और काली शॉल में लिपटी ममता जैसे ही सुप्रीम कोर्ट की सीढ़ियों पर कदम रखती हैं, वक्त जैसे ठहर जाता है. यह सिर्फ एक एंट्री नहीं थी… यह इतिहास का एक नया पन्ना था. भारतीय लोकतंत्र में ऐसे मौके बहुत कम आए हैं, जब कोई मुख्यमंत्री खुद अदालत में खड़ा होकर अपनी दलीलें रखे. लेकिन ममता बनर्जी सिर्फ राजनीति करने वाली नेता नहीं रहीं वो हमेशा अपनी लड़ाई खुद लड़ने वाली किरदार रही हैं. अदालत के भीतर माहौल गंभीर था. मुद्दा बड़ा था. देश की चुनाव प्रक्रिया संभालने वाली संस्था चुनाव आयोगी की मंशा पर सवाल.
ममता के शब्दों में आत्मविश्वास था, तर्कों में धार थी और अंदाज़ में वही पुराना जुझारूपन. 'विथ दिस परमिशन सर… ओनली वन थिंग सर… पॉइंट वेल टेकन…' उनकी आवाज़ कोर्टरूम में गूंज रही थी. यह सिर्फ कानूनी बहस नहीं थी, यह एक संदेश था कि सत्ता में बैठा व्यक्ति भी सिस्टम को चुनौती दे सकता है. बाहर मीडिया में हलचल थी, अंदर बहस जारी थी… और देश एक बार फिर देख रहा था कि ममता बनर्जी सिर्फ एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक फाइटर हैं- जो सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अपनी लड़ाई लड़ सकती हैं.
FAQ: ममता बनर्जी से जुड़े सवाल और उनके जवाब
ममता बनर्जी ने कांग्रेस पार्टी क्यों ज्वाइन की थी?
ममता ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस से की, क्योंकि उस समय यही सबसे बड़ा राष्ट्रीय मंच था. यहां उन्हें संगठन, चुनाव और जनसंपर्क की समझ मिली और सबसे बड़ी बात उनके पिता कांग्रेसी थे तो उनका झुकाव भी कांग्रेस की तरफ था.
ममता बनर्जी की हत्या कराने की कोशिश क्यों की गई?
1990 में ममता बनर्जी पर जानलेवा हमला हुआ था, जब वह वामपंथी सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रही थीं. उनकी बढ़ती लोकप्रियता और आक्रामक राजनीति विरोधियों को खटक रही थी. इस हमले ने उन्हें और मजबूत बनाया और जनता के बीच उनकी छवि एक जुझारू नेता के रूप में स्थापित की.
ममता को बाल पकड़ कर किसने घसीटा था?
हाजरा मोड़, कोलकाता में 1990 के हमले के दौरान ममता बनर्जी को सरेआम पीटा गया और बाल पकड़कर घसीटा गया. इस घटना में वामपंथी कार्यकर्ताओं पर आरोप लगे थे.
ममता ने कैसे अपनी अलग पार्टी बनाई?
कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने 1998 में All India Trinamool Congress बनाई. उनका मानना था कि कांग्रेस बंगाल में कमजोर हो चुकी है. उन्होंने “मां, माटी, मानुष” के नारे के साथ जनता को जोड़ा और धीरे-धीरे राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव लाया.
ममता बनर्जी ने एक समय बीजेपी से दोस्ती क्यों की थी?
ममता बनर्जी ने वाम मोर्चा को हराने के लिए रणनीतिक तौर पर भाजपा से हाथ मिलाया था. उन्होंने NDA सरकार में मंत्री के रूप में भी काम किया. उनका उद्देश्य बंगाल में लेफ्ट की पकड़ कमजोर करना था, बाद में उन्होंने दूरी बना ली.
क्या ममता बनर्जी की मुख्यमंत्री की कुर्सी इस बार जाने वाली है?
ममता बनर्जी अभी भी पश्चिम बंगाल की सबसे मजबूत नेताओं में हैं. उनका जमीनी नेटवर्क और महिला-गरीब वोट बैंक पर पकड़ मजबूत है. हालांकि बीजेपी से कड़ी टक्कर है, लेकिन उनकी स्थिति अभी भी मजबूत मानी जाती है. अंतिम फैसला चुनाव नतीजों पर निर्भर करेगा.
ममता के जन्म की तारीख को लेकर भी एक दिलचस्प किस्सा क्या है?
ममता बनर्जी की जन्मतिथि को लेकर अलग-अलग दस्तावेजों में अंतर मिलता है. आमतौर पर 5 जनवरी 1955 मानी जाती है, लेकिन कुछ रिकॉर्ड में अलग तारीख भी है. पुराने समय में जन्म रिकॉर्ड सही तरीके से दर्ज नहीं होते थे, इसलिए ऐसे अंतर देखने को मिलते हैं.
ममता ने पहले चुनाव में किसे हराया था?
ममता बनर्जी ने 1984 के लोकसभा चुनाव में जादवपुर सीट से CPI(M) के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को हराया था. यह जीत उनके करियर का टर्निंग पॉइंट बनी. इससे उन्हें राष्ट्रीय पहचान मिली और वह कांग्रेस की प्रमुख युवा नेता बनकर उभरीं.
क्या ममता को पेंटिंग का भी शौक है?
ममता बनर्जी को पेंटिंग का शौक है. उनकी बनाई पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लग चुकी है और कई पेंटिंग्स अच्छी कीमत पर बिकी हैं. इसके अलावा वह कविता और किताबें भी लिखती हैं. उनकी यह रचनात्मकता उनकी अलग और संवेदनशील छवि को दर्शाती है.




