LJP से शुरू हुआ ट्रेंड शिवसेना-NCP होता हुआ अब TMC तक पहुंचा... ऐसे छीना गया विपक्षी पार्टियों का नाम और चुनाव चिन्ह
LJP, Shiv Sena, NCP और TMC में पार्टी विवाद के दौरान EC ने नाम और चुनाव चिन्ह फ्रीज किए. जानिए कब, क्यों और किस गुट को मिला अधिकार.
सियासी पार्टियों में टूट, दो गुटों के दावे और उसके बाद चुनाव चिन्ह पर विवाद, पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में ऐसे कई मामले सामने आए हैं. मोदी सरकार के कार्यकाल में एलजेपी, शिवसेना, NCP और अब TMC जैसे बड़े क्षेत्रीय दलों में विभाजन के बाद चुनाव आयोग के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर फैसले खास तौर पर चर्चा में रहे हैं. हालांकि, चुनाव आयोग की यह प्रक्रिया किसी सरकार के निर्देश पर नहीं, बल्कि पार्टी में विभाजन की स्थिति में Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के तहत होती है.
लोक जनशक्ति पार्टी: 2 अक्टूबर 2021 को फ्रीज हुआ ‘बंगला’
इस सिलसिले में अहम मामला लोक जनशक्ति पार्टी यानी LJP का है. चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस गुटों के बीच पार्टी पर नियंत्रण को लेकर विवाद के बाद चुनाव आयोग ने 2 अक्टूबर 2021 को अंतरिम आदेश जारी किया. आयोग ने ‘Lok Janshakti Party’ नाम और ‘बंगला’ चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर दिया. दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह दिए गए.
शिवसेना: धनुष-बाण पर पहले रोक, फिर शिंदे गुट को नाम-चिन्ह
इसके बाद महाराष्ट्र की शिवसेना में उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुटों के बीच विवाद सामने आया. अक्टूबर 2022 में चुनाव आयोग ने ‘Shiv Sena’ नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह को अस्थायी रूप से फ्रीज कर दिया. दोनों गुटों को अंतरिम तौर पर अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह दिए गए.
17 फरवरी 2023 को चुनाव आयोग ने इस विवाद पर अंतिम फैसला सुनाया. आयोग ने ‘Shiv Sena’ नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को दिया. उद्धव ठाकरे गुट को ‘Shiv Sena (Uddhav Balasaheb Thackeray)’ नाम और ‘मशाल’ चुनाव चिन्ह मिला.
NCP: अजित पवार गुट को मिला नाम और घड़ी
इसके बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी NCP में शरद पवार और अजित पवार गुटों के बीच पार्टी पर नियंत्रण को लेकर विवाद हुआ. 6 फरवरी 2024 को चुनाव आयोग ने अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट को ‘NCP’ नाम और ‘घड़ी’ चुनाव चिन्ह दिया. शरद पवार गुट को अलग नाम और नया चुनाव चिन्ह दिया गया.
TMC: सितंबर 2026 में नाम और ‘फूल-घास’ चिन्ह फ्रीज
अब सितंबर 2026 में तृणमूल कांग्रेस यानी TMC का विवाद भी इसी कड़ी में सामने आया है. चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश में ‘All India Trinamool Congress’ नाम और उसके ‘Flowers & Grass’ यानी ‘फूल-घास’ चुनाव चिन्ह को फिलहाल फ्रीज कर दिया है.
दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को वैकल्पिक नाम और चुनाव चिन्ह के विकल्प देने को कहा गया है. हालांकि TMC के मामले में अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है. इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि TMC का नाम और चुनाव चिन्ह किसी एक गुट को स्थायी रूप से दे दिया गया है.
किस आधार पर EC करता है चुनाव चिन्ह फ्रीज?
पार्टी में विभाजन होने पर चुनाव आयोग Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत चुनाव चिन्ह से जुड़े विवाद पर फैसला करता है. आयोग दोनों गुटों के संगठनात्मक समर्थन, पार्टी के संविधान, राष्ट्रीय और राज्य कार्यकारिणी की स्थिति, सांसदों-विधायकों के समर्थन और उपलब्ध दस्तावेजों को देखता है. जब विवाद के दौरान तुरंत यह तय करना संभव न हो कि पार्टी का आधिकारिक गुट कौन है, तो आयोग अंतरिम तौर पर पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह फ्रीज कर सकता है. इसके बाद दोनों गुटों को अलग नाम और चिन्ह दिए जाते हैं.
अंतिम निर्णय में आयोग उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर तय करता है कि मान्यता प्राप्त पार्टी का नाम और आरक्षित चुनाव चिन्ह किस गुट को दिया जाए. इसलिए राजनीतिक भाषा में इसे भले ही ‘पार्टी का चुनाव चिन्ह छिनना’ कहा जाए, लेकिन कानूनी प्रक्रिया में यह किसी पार्टी को खत्म करने का फैसला नहीं, बल्कि विभाजित पार्टी के किस गुट को आधिकारिक मान्यता और आरक्षित चुनाव चिन्ह मिलेगा, इसका निर्धारण होता है.
पहले भी चुनाव चिन्ह को लेकर सामने आए कई विवाद
पार्टी विभाजन के बाद चुनाव चिन्ह फ्रीज होने का इतिहास शिवसेना से काफी पुराना है. 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद ‘दो बैलों की जोड़ी’ चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद हुआ. इसके बाद अलग-अलग गुटों को अलग चुनाव चिन्ह मिले. 1978 में कांग्रेस में एक और विभाजन के बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले गुट को ‘हाथ’ चुनाव चिन्ह मिला, जो आगे चलकर कांग्रेस का स्थायी चिन्ह बना.
1987-88 में AIADMK में एमजी रामचंद्रन के निधन के बाद जानकी रामचंद्रन और जयललिता गुट आमने-सामने आए. चुनाव आयोग ने ‘दो पत्तियां’ चुनाव चिन्ह फ्रीज कर दिया. दोनों गुटों को अलग-अलग चुनाव चिन्ह दिए गए. बाद में दोनों गुटों के एकीकरण के बाद ‘दो पत्तियां’ चिन्ह फिर AIADMK को मिल गया.
2017 में समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव गुटों के बीच विवाद हुआ. चुनाव आयोग ने संगठनात्मक और विधायी समर्थन से जुड़े दस्तावेजों पर विचार करने के बाद ‘समाजवादी पार्टी’ नाम और ‘साइकिल’ चुनाव चिन्ह अखिलेश यादव गुट के पास रहने दिया. इसी साल AIADMK और जनता दल यूनाइटेड में भी पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद सामने आया.
दरअसल, चुनाव चिन्ह फ्रीज करने की प्रक्रिया नई नहीं है. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में शिवसेना, NCP, LJP और अब TMC जैसे प्रमुख क्षेत्रीय दलों से जुड़े मामलों के कारण यह प्रक्रिया राजनीतिक बहस के केंद्र में जरूर आ गई है. TMC का मामला फिलहाल अंतरिम चरण में है और अंतिम फैसला अभी बाकी है.




